अब चलिए उद्यम की राह: पी. के. खुराना, राजनीतिक रणनीतिकार

पीके खुराना By: पी. के. खुराना, राजनीतिक रणनीतिकार Dec 3rd, 2020 12:12 am

पीके खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

अब सवाल यह है कि जब नौकरियों का अकाल हो और व्यवसाय का आसान विकल्प भी विकल्प न रह गया हो तो क्या किया जाए। यह खुशी की बात है कि देश में बहुत सी संस्थाओं ने जैसे गैर-पत्रकार लोगों के लिए व्यवसाय के नए विकल्प सुझाने के लिए वेबिनार किए या प्रशिक्षण देना आरंभ किया, वैसे ही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कई लोग ऐसा ही कर रहे हैं। अंबाला छावनी स्थित कहानी लेखन महाविद्यालय पत्राचार के माध्यम से कहानी, लेख और पत्रकारिता आदि सिखाने वाला प्रतिष्ठित संस्थान है और इसने पत्राचार के माध्यम से प्रशिक्षण देना तब से आरंभ कर दिया था जब भारत के किसी भी विश्वविद्यालय ने पत्राचार से शिक्षण की बात सोची भी नहीं थी…

समय के साथ-साथ देश बदल गया है, लोगों की सोच बदल गई है, व्यवसाय का तरीका बदल गया है और मीडिया भी बदल गया है। टाइम्स समूह में समीर जैन के आने के बाद मीडिया उद्योग में बड़े परिवर्तनों की शुरुआत हुई थी, लेकिन विद्वजनों को उनकी रणनीति की गहराई बहुत देर से समझ में आई। नब्बे के दशक के आसपास हैदराबाद में मुख्यालय वाले ईनाडु ने जिला संस्करणों की शुरुआत की। बाद में इंडियन एक्सप्रेस अपने चंडीगढ़ संस्करण से इसे टेस्ट मार्केटिंग के लिहाज से अपनाया, दिव्य हिमाचल ने जिला संस्करण को नीतिगत रूप में अपनाया और फिर जब दैनिक भास्कर ने भी उसे अपनाया तो पूरा मीडिया उद्योग इसकी नकल में उतर आया। सन् 2007 में मीडिया में एक नई विकृति आई और पेड न्यूज का सिलसिला शुरू हुआ। अब मीडिया में पेड न्यूज को अन्य सामाचारों से अलग दिखाने के लिए कई तरह के संकेतों का प्रयोग आरंभ हो गया है। ज्यादातर बड़े अखबार अब किसी न किसी रूप में पेड न्यूज को अन्य समाचारों से अलग दिखाना पसंद करते हैं। यह अलग बात है कि आम जनता में इन संकेतों को लेकर बहुत ज्यादा जागरूकता नहीं है। सन् 2014 में नरेंद्र मोदी का जलवा जब ठाठें मार रहा था तो मीडिया उद्योग में छोटे-छोटे बदलाव आने शुरू हुए, पर सन् 2014 के मध्य से सन् 2020 के अंत तक के साढ़े छह वर्ष के अंतराल में बहुत कुछ और भी बदल गया है।

विरोध के स्वरों को दबाने के लिए सरकारी दमन तंत्र ने अब शर्म करना बंद कर दिया है और सरकार चाहे ममता बनर्जी की हो, उद्धव ठाकरे की हो, योगी आदित्यनाथ की हो या नरेंद्र मोदी की, सबका हाल एक-सा ही है। पत्रकारों और मीडिया घरानों के खुलेआम दमन से भयभीत मीडिया अब सरकारों की यशोगाथा में लीन है। पहले जहां बहुत से पत्रकार अंबानी समूह से धन की सेवा स्वीकार करते थे, वहीं अब पत्रकारों के पास अंबानी समूह द्वारा अधिगृहीत मीडिया कंपनियों की नौकरी में जाना एक विकल्प बन गया है। मीडिया जो कभी जनता की आवाज होता था, आज सरकारी भोंपू बनने के लिए विवश है क्योंकि मीडिया उद्योग अब बड़े पूंजीपतियों के हाथ में है जिनके अपने निहित स्वार्थ हैं। इसके साथ ही वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में लिखने-बोलने की स्वतंत्रता के मामले में भारतीय मीडिया उद्योग कई पायदान नीचे खिसक गया है। लिखने-बोलने की स्वतंत्रता की बात करने वाले लोगों का मत नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गया है। यहां तक कि इसे अनुचित, अनैतिक और देशद्रोह तक का फतवा मिलने लग गया है। सोशल मीडिया मंचों की महत्ता एकदम से बढ़ी है और इसके साथ ही इनका उपयोग व दुरुपयोग भी बढ़ा है। ट्विटर अब राजनीतज्ञों, फिल्म स्टारों और सेलेब्रिटी लोगों का प्रिय मंच बन गया है तो यूट्यूब की पकड़ भी तेजी से बढ़ी है।

 सोशल मीडिया के उभार ने मीडिया उद्योग को नए ढंग से सोचने पर विवश किया है और अब पारंपरिक मीडिया उद्योग भी सोशल मीडिया पर निर्भर नजर आता है। यह सच है कि समाज के एक शक्तिशाली वर्ग ने सोशल मीडिया का दुरुपयोग करते हुए फेक न्यूज और अफवाहें फैलाना शुरू किया, पर सारी कमियों के बावजूद हम सोशल मीडिया से बच नहीं सकते और यह एक स्थापित तथ्य है कि सोशल मीडिया के विभिन्न मंच अब एक बड़ी ताकत हैं। इस वर्ष की भयानक वैश्विक महामारी कोरोना ने सारे संसार को घुटनों पर ला दिया। कई बिजनेस बंद हो गए, नौकरियां खलास हुईं और वेतन घट गए। इस महामारी से मीडिया उद्योग भी उससे अछूता नहीं रहा और बहुत से मीडिया घरानों के शटर गिर गए तो कई अखबारों के अलाभप्रद संस्करण बंद हो गए। यहां भी पत्रकारों और मीडिया उद्योग से जुड़े बहुत से कर्मियों का बड़ा वर्ग सड़क पर आ गया। जब तक लोग नौकरी में थे, सुखी थे, कंफर्ट ज़ोन में थे, कुछ और सोचने की जरूरत ही नहीं थी, बेरोज़गार हुए तो बहुत से लोगों ने विकल्पों के बारे में सोचना शुरू किया और कुछ लोगों ने अलग-अलग छोटी-छोटी नौकरियां पकड़ लीं, पर कुछ लोगों ने उद्यम की राह पकड़ी। इतिहास गवाह है कि जब-जब भी मंदी आती है या नौकरियों का अकाल पड़ता है तो उद्यम ज्यादा अच्छा विकल्प है और ज्यादा से ज्यादा लोग उद्यमी बनने के रास्ते तलाशते हैं। मीडिया उद्योग में पिछले कई सालों से यह हो रहा है कि रिटायर होने के बाद, नौकरी से इस्तीफा देने के बाद या नौकरी से निकाल दिए जाने के बाद बहुत से पत्रकारों ने न्यूज पोर्टल बना लिए। पत्रकार रह चुकने के कारण उन्हें शायद यह सबसे आसान विकल्प लगा। दिक्कत यह है कि ऐसे बहुत से लोग बहुत छोटे से दायरे में सिमट कर रह गए और लॉकडाउन के समय उनकी दिक्कतें और बढ़ गईं क्योंकि आय के साधन नहीं बचे।

अब सवाल यह है कि जब नौकरियों का अकाल हो और व्यवसाय का आसान विकल्प भी विकल्प न रह गया हो तो क्या किया जाए। यह खुशी की बात है कि देश में बहुत सी संस्थाओं ने जैसे गैर-पत्रकार लोगों के लिए व्यवसाय के नए विकल्प सुझाने के लिए वेबिनार किए या प्रशिक्षण देना आरंभ किया, वैसे ही पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कई लोग ऐसा ही कर रहे हैं। अंबाला छावनी स्थित कहानी लेखन महाविद्यालय पत्राचार के माध्यम से कहानी, लेख और पत्रकारिता आदि सिखाने वाला प्रतिष्ठित संस्थान है और कहानी लेखन महाविद्यालय ने पत्राचार के माध्यम से प्रशिक्षण देना तब से आरंभ कर दिया था जब भारत के किसी भी विश्वविद्यालय ने पत्राचार से शिक्षण की बात सोची भी नहीं थी। इसके संस्थापक स्व. डा. महाराज कृष्ण जैन की ख्याति भारत भर में थी और उनका घर साहित्यकारों का तीर्थ रहा है। कहानी लेखन महाविद्यालय ने अब पत्रकारिता के क्षेत्र में आने के इच्छुक लोगों के लिए वेबिनार शुरू किए हैं। इस कोर्स की सबसे बड़ी खासियत ही यह है कि यह पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता का ज्ञान रखने वाले लोगों को नौकरी के अलावा उद्यमी बनने के नए विकल्पों की बात भी करता है ताकि पत्रकारिता का ज्ञान रखने वाले लोग सिर्फ नौकरी के ही मोहताज न रहें। यह खुशी की बात है कि समाचार, मीडिया, स्कोर और दि ग्रोथ स्कूल जैसी अन्य संस्थाएं भी इस दिशा में कार्यरत हैं। मीडिया जगत इस समय गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। इस दौर में ऐसा हर प्रयास प्रशंसनीय है जो लोगों को आत्मनिर्भर होना सिखाए। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि मीडिया क्षेत्र से जुड़ी देश की बहुत सी अन्य संस्थाएं भी इससे प्रेरणा लेकर पत्रकार जगत के लिए नए विकल्प लेकर सामने आएंगी ताकि किसी को भी बेरोज़गारी की जि़ल्लत न सहनी पड़े और देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो।

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