बंगाल में राजनीतिक गर्मी: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

Prof. NK Singh By: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार Dec 18th, 2020 12:08 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

पार्टी अध्यक्ष पर हमले का मामला अब सुर्खियां बटोर रहा है, दूसरी ओर बंगाल में ममता के राज में हिंसा तथा अव्यवस्था की स्थिति उजागर हुई है। अब भाजपा के पास राज्य में अपनी शक्ति फैलाने के लिए यह दाव है कि वह अपने को पीडि़त के रूप में पेश करेगी। साथ ही वह राज्य में गरीबी व बेरोजगारी को मुद्दा बना सकती है। नड्डा राज्य में डोर टू डोर कैंपेन चलाकर टीएमसी को बड़े स्तर पर कमजोर करेंगे। यहां तक कि नागरिकता कानून ने ममता के पतन के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया है। इस तरह अब बंगाल में सियासी लड़ाई दो दलों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष मात्र नहीं है, बल्कि अब संघवाद का बड़ा मुद्दा भी इससे जुड़ गया है…

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के वाहन पर पश्चिम बंगाल में हमले के बाद राज्य में दो दलों के मध्य विवाद के बादल काले होते जा रहे हैं। सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष राज्य में अपना पार्टी कार्यालय खोलने के लिए गए थे, जब यह भिड़ंत हुई। राज्य में राजनीतिक ज्वार गर्म होता जा रहा है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। भाजपा ने राज्य में पहले ही लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है। अब वह विधानसभा चुनाव के लिए अपने आपको पूरी तरह तैयार कर रही है तथा अपना सियासी साम्राज्य फैलाना चाहती है। सभी को चिंता यह है कि अगर भाजपा अपने मिशन में कामयाब होती है, तो विपक्ष में कौन होगा? दरअसल देश को एक जवाबदेह विपक्ष की सख्त जरूरत है। जगत प्रकाश नड्डा भाजपा के नए-नवेले अध्यक्ष हैं जिन्होंने पार्टी के संजीदा उपक्रम शुरू कर दिए हैं।

भाजपा ने पहले बिहार में विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की, फिर हैदराबाद के स्थानीय निकाय चुनाव में भी जीत दर्ज की। हैदराबाद में उसके पास पहले मात्र चार सीटें थीं, जबकि अब उसके पास 44 सीटें हैं। महाराष्ट्र के उपचुनाव में भी भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया जहां उसने छह में से चार सीटें जीत ली। दूसरी ओर वहां कांग्रेस तथा शिवसेना को एक-एक सीट मिली। भाजपा ने राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन किया है। इससे पहले वह मध्यप्रदेश व गुजरात में भी जीत दर्ज कर चुकी है। ज्यादा से ज्यादा जीत दर्ज करने की भाजपा की उत्कंठा का कोई भी विरोध नहीं कर पाया है। वास्तव में अब नड्डा ‘दिल मांगे मोर एंड मोर’ की दौड़ में हैं। ऐसी स्थिति में अब भाजपा उन्हें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व कठिन राज्य बंगाल में जीत के लिए प्रोत्साहित कर रही है। यह भाजपा के ‘टनल विजन’ की मिसाल है क्योंकि वह पार्टी के विस्तार व विकास के लिए बड़ा दृष्टिकोण रखती है। बिहार व हैदराबाद में बेहतर प्रदर्शन के बाद अब बंगाल में नड्डा के लिए निर्णायक मिशन है।

पार्टी नेतृत्व का नए अध्यक्ष में विश्वास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस नारे में देखा जा सकता है, जब उन्होंने बिहार में जीत के जश्न में आयोजित समारोह में कहा कि, ‘नड्डा जी तुम आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ यह नड्डा के उपजीवी के लिए एक नेता के पूरे विश्वास व समर्थन को दर्शाता है। ममता बैनर्जी ने बंगाल में अपनी पार्टी को उस वक्त जीत दिलाई थी, जब वाम दल का राज प्रायः अपराजेय लग रहा था। एक समय था जब इस राज्य में सीपीएम का पूरा प्रभाव था। उसने ऐसा विकास के बल पर नहीं किया, बल्कि पार्टी कैडर को मजबूत करके तथा अपने विरोधियों को हिंसा के जरिए दबाकर किया। तब ममता ने कम्युनिस्टों की हिंसा व उनकी अलोकतांत्रिक हरकतों की कड़ी आलोचना कर उनसे सत्ता छीन ली थी। अब ममता बैनर्जी उन्हीं के दिखाए मार्ग पर चलते हुए राज्य पर अपना नियंत्रण कायम रखने के लिए वह सब उपाय कर रही हैं जो कभी कम्युनिस्टों ने इस राज्य में अपनी सत्ता फैलाने के लिए उपयोग में लाए थे। आर्थिक मोर्चे पर ममता की सबसे बड़ी विफलता यह है कि वह राज्य में निवेश लाने में विफल रही हैं। टाटा से जुड़ा एक बहुचर्चित मसला है।

 टाटा कंपनी ने राज्य में वाहनों के निर्माण के लिए जमीन अधिगृहीत की। बंगाल का इतिहास बिड़ला द्वारा निर्मित एंबेसेडर कार के लिए भी जाना जाता है, जो अब लुप्तप्रायः हो गया है। ममता ने किसानों के लिए प्रदर्शन किया तथा जमीन वापस करने के लिए कहा क्योंकि उन्हें ज्यादा लाभ मिल रहा था। इससे दुखी होकर यह परियोजना गुजरात चली गई। गुजरात ने सभी सुविधाएं दीं और आज यह प्लांट सफलतापूर्वक चल रहा है जो कइयों को रोजगार दे रहा है तथा आर्थिक विकास भी हो रहा है। बंगाल की जमीन अब बेकार पड़ी है तथा इस पर कुछ भी उगता हुआ नहीं लगता है। इस तरह ममता के राज में उद्योगों के लिए बेहतर वातावरण का निर्माण नहीं हो पाया और वहां निवेश की स्थिति नाजुक हो गई। वास्तव में सहयोग करना तो ममता जानती ही नहीं। विपक्ष के लिए ऐसी स्थिति में उन पर सियासी हमला बोलना आसान हो गया। किंतु ममता चालाक हैं और जानती हैं कि हिंसा की संस्कृति और आक्रामक नेतृत्व से कैसे लाभ उठाया जाए। भाजपा ने सोच-विचार करके अपनी रणनीति अपनाई।

उसने राजनीतिक हमले के लिए भावनगर तथा डायमंड हार्बर जैसे दो स्थलों को चुना। इनमें से एक स्थान ममता का अपना पॉवर सेंटर है, जबकि दूसरा उनके भतीजे से संबंधित है। उनका भतीजा ममता का सियासी उत्तराधिकारी भी है। टीएमसी के उच्च नेतृत्व को उन्हीं के गढ़ में घेरने की भाजपा ने रणनीति बनाई। अब ममता को भी एहसास हो गया है कि भाजपा सीधे हमला कर रही है तथा उन्हें शासन से बाहर कर देना चाहती है। इसलिए ममता ने भी नड्डा का विरोध करने के लिए तथा राज्य में प्रविष्ट होने से रोकने के लिए हिंसक शक्ति का प्रयोग कर डाला। हिंसा की पहले से ही संभावना थी तथा नड्डा के काफिले पर ईंटों से हमला किया गया। इसमें पार्टी अध्यक्ष सहित वर्कर तथा अन्य नेता भी हिंसक भीड़ के शिकार हुए। भाजपा वहां अपना कार्यालय खोलना चाहती थी, परंतु इसका हिंसक प्रतिरोध हुआ तथा पार्टी ने इस मसले को राष्ट्रीय स्तर पर उछाल दिया।

पार्टी अध्यक्ष पर हमले का मामला अब सुर्खियां बटोर रहा है, दूसरी ओर बंगाल में ममता के राज में हिंसा तथा अव्यवस्था की स्थिति उजागर हुई है। अब भाजपा के पास राज्य में अपनी शक्ति फैलाने के लिए यह दाव है कि वह अपने को पीडि़त के रूप में पेश करेगी। साथ ही वह राज्य में गरीबी व बेरोजगारी को मुद्दा बना सकती है। नड्डा राज्य में डोर टू डोर कैंपेन चलाकर टीएमसी को बड़े स्तर पर कमजोर करेंगे। यहां तक कि नागरिकता कानून ने ममता के पतन के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया है। इस तरह अब बंगाल में सियासी लड़ाई दो दलों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष मात्र नहीं है, बल्कि अब संवैधानिक संघवाद का बड़ा मुद्दा भी इससे जुड़ गया है। ममता की पहले से ही केंद्र से टस्सल चल रही है और अगर वह राज्य में कानून व व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहती हैं तो उन्हें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना होगा। राज्य के राज्यपाल ने पहले ही केंद्र को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है जिसमें हिंसा व अव्यवस्था का जिक्र किया गया है। अब देखना यह है कि ममता राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने से कैसे रोक पाती हैं।

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