बुजुर्गों का बदलता प्रोफाइल : प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

Prof. NK Singh By: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार Dec 25th, 2020 12:10 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

राज्य सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह वरिष्ठ नागरिकों के लिए होस्टल बनाए तथा उनको इन्हें उपलब्ध कराए। इन होस्टल्स में चिकित्सा व खेल संबंधी सुविधाएं भी होनी चाहिएं। हिमाचल जैसे राज्य में सरकार प्रदेश के लिए यहां तक कि कोविड काल में भी प्रचुर राजस्व व रोजगार जुटा सकती है। प्रदेश को नवाचारी रणनीतियों की जरूरत है। सरकार को वरिष्ठ नागरिकों को बोझ की तरह नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें राज्य के लिए संपदा की तरह समझना चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों के अनुभवों से सरकार कई लाभ उठा सकती है। वरिष्ठ नागरिकों को पैसे से ज्यादा इस तरह की देखभाल तथा पारिवारिक घनिष्ठता की जरूरत है। समाज के सभी वर्गों को भी समझना चाहिए कि बुजुर्ग उनके लिए सम्माननीय हैं…

विश्व भर में वरिष्ठ नागरिकों के जीवन तथा कार्यशैली में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। जितना ही अत्याधुनिक कोई देश होता है, उतना ही अधिक पुराने प्रोफाइल में नागरिक जीवन जीने के लिए देखभाल और सुविधाएं प्राप्त करते हैं। वास्तव में यह जीवन-स्तर में सामान्य विकास का हिस्सा है, साथ ही यह दीर्घजीवन का पैमाना है जो अलग-अलग समाजों में अलग-अलग होता है। ऐसी स्थिति विकसित हो गई है जब वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य तथा रचनात्मक चिंताओं को खास ध्यान देने की जरूरत होती है। कई बार वरिष्ठ को परिभाषित करना तकलीफदेह होता है क्योंकि यह अन्य व्यक्ति पर जजमेंट को ‘अमाउंट’ करता है। लेकिन सरकारों ने वरिष्ठता को आयु के जरिए परिभाषित किया है तथा 60 वर्ष को कट ऑफ प्वाइंट के रूप में माना जाता है। लेकिन कट ऑफ प्वाइंट बहुत लचीला है। कई मामलों में जब कोई 60 वर्ष का मित्र मरता है तो कई लोग हैरानी व्यक्त करते हैं कि ओह, इनती कम उम्र में मर गया। उनके बारे में कोई फैसला करना सामान्य बात है जो आपसे कम उम्र के होते हैं क्योंकि युवा व्यक्ति की कोई भी उम्र हो सकती है। मैं भी बुजुर्ग हो गया हूं, इसका एहसास मुझे पहली बार तब हुआ जब एक युवती ने मेट्रो में मुझे सीट दी।

मैं बिल्कुल स्वस्थ था तथा कभी नहीं सोचा कि मैं इतना बूढ़ा हो गया हूं, लेकिन उस लड़की ने मुझे यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि बड़ी उम्र तब दिखने लग जाती है जब सिर के बाल और चलने की चाल बुजुर्गों जैसी हो जाती है। एक बार मुंबई से दिल्ली आते हुए, एयरपोर्ट अथारिटी के चेयरमैन के रूप में, मुझे उड्डयन के सबसे वरिष्ठ व्यक्ति जेआरडी टाटा के साथ यात्रा करने का विशेषाधिकार मिला। यात्रा के दौरान हमारे बीच खूब बातचीत होती रही। जब हम दिल्ली पहुंच गए तो मैंने उनका हैंड बैग पकड़ लिया और इसे उनकी कार तक ले जाने की मंशा जताई। उन्होंने विनम्रता के साथ इसे अस्वीकार किया तथा ‘नहीं, धन्यवाद’ कहकर वह हैंडबैग के साथ आगे चलने लगे। वह उस समय लगभग 80 वर्ष के थे तथा मैं उनसे उम्र में काफी कम था। शायद वह वृद्ध महसूस नहीं करते थे तथा इस तरह के विशेषाधिकार के अधिकारी अपने को नहीं समझते थे। यात्रा के शिष्टाचार सांझे होते हैं जब इन्हें बुजुर्ग लोगों तक विस्तारित किया जाता है। किंतु सरकार इन्हें कानूनी जामा पहनाना चाहती है, जबकि कोई भी इसकी परवाह तक नहीं करता है।

जब भी मैंने मेट्रो में यात्रा की तो मैंने वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षित सीटें ही पाईं, लेकिन वास्तव में इसे कोई नहीं ऑब्जर्व करता है। यही कारण है कि जब एक लड़की ने मुझे अपनी सीट दी तो मैं प्रसन्न था। जब भी मैं विशेषकर रेलगाड़ी के जरिए दिल्ली से अंब की यात्रा करता हूं, मैंने यहां तक कि फर्स्ट क्लास एसी रेलवे में बर्थ पाया, जो कि एडवांस में ‘इंडीकेट’ नहीं होता, लोअर सीट बुकिंग के बारे में। यह अंतिम क्षणों में होता है कि कोई सीट संख्या को प्राप्त करता है, अपर या लोअर बर्थ दिखाकर। मेरा सबसे बुरा अनुभव तब का है जब मेरी पत्नी अस्पताल में थी। मुझे ट्रांसफ्यूजन के लिए खून देना था। अंतिम क्षणों में, जब मैं टेस्टिंग रूम में था, तो मुझे बताया गया कि मेरे खून की जरूरत नहीं है क्योंकि मैं ज्यादा बूढ़ा हूं। भारतीय स्टेट बैंक दावा करता है कि वह वरिष्ठ लोगों की ज्यादा चिंता करता है, लेकिन जब मैंने क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन किया तो उन्होंने इसे नामंजूर कर दिया क्योंकि वे इतने बूढ़े बुजुर्गों को क्रेडिट कार्ड नहीं देते हैं। सरकार द्वारा तय की गई बुढ़ापा पेंशन 1500 रुपए मासिक है तथा यह राशि जीने के लिए सामान्यतः काफी समझी जाती है। भारत में बूढ़े और बीमार अभिभावकों के खास ख्याल का पौराणिक आख्यान भी है। श्रवण कुमार की प्रसिद्ध कहानी है जो अपने कंधे पर टोकरियों की तुला बनाकर अपने माता-पिता को धार्मिक यात्रा करवाता है।

वे चलने में समर्थ नहीं थे और उन्हें देखभाल की ज्यादा जरूरत थी। किंतु आज के विश्व में कई ऐसी कहानियां हैं जहां बुजुर्गों की पूरी तरह उपेक्षा होती है तथा उन्हें परेशान भी किया जाता है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की नवीनतम पुस्तक राजनीतिक विषयों को लेकर है, परंतु इसमें बदलते पारिवारिक जीवन की कई झलकें भी हैं। मिसाल के तौर पर जब वह बीमार ग्रैंड मदर, जिन्होंने उनका पालन-पोषण किया था, को देखने जाते हैं तो उनके कैसे अनुभव रहते हैं, इसका ब्योरा भी किताब में दिया गया है। वह हमेशा कहती रही कि वह बहुत कमजोर है तथा उसे अपनी डाइट का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मैंने यह कहानी अपनी पत्नी को सुनाई जिसने मुझे बर्टरेंड रसेल और पीटर ड्रकर की दो और मिसालें दीं जिन्होंने भी अपने ग्रैंड पेरेंट्स को विस्तारित ‘नेरेशन’ दिया। रसेल अपनी दादी के साथ राजनीतिक संभाषण किया करते थे जो कि उनसे विपरीत विचार रखती थी। इसके बावजूद उनका पारिवारिक जीवन स्नेह और एक-दूसरे के प्रति देखभाल के दायित्व की चिंता से परिपूर्ण था।

राज्य सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह वरिष्ठ नागरिकों के लिए होस्टल बनाए तथा उनको इन्हें उपलब्ध कराए। इन होस्टल्स में चिकित्सा व खेल संबंधी सुविधाएं भी होनी चाहिए। हिमाचल जैसे राज्य में सरकार प्रदेश के लिए यहां तक कि कोविड काल में भी प्रचुर राजस्व व रोजगार जुटा सकती है। प्रदेश को नवाचारी रणनीतियों की जरूरत है। सरकार को वरिष्ठ नागरिकों को बोझ की तरह नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें राज्य के लिए संपदा की तरह समझना चाहिए। वरिष्ठ नागरिकों के अनुभवों से सरकार कई लाभ उठा सकती है। वरिष्ठ नागरिकों को पैसे से ज्यादा इस तरह की देखभाल तथा पारिवारिक घनिष्ठता की जरूरत है। समाज के सभी वर्गों को भी समझना चाहिए कि बुजुर्ग उनके लिए सम्माननीय हैं तथा उनके अनुभवों से लाभ उठाया जा सकता है। जो युवा अपने बुजुर्गों की देखभाल छोड़ देते हैं, उनको प्रेरणा देने के लिए अभियान चलाए जाने चाहिएं तथा उन्हें उनका कर्त्तव्य सिखाया जाना चाहिए। वास्तव में बुजुर्गों को पैसे की नहीं, बल्कि इस उम्र में प्यार की जरूरत होती है। बुजुर्गों का बुढ़ापा सहजता के साथ बीत जाए, इसके लिए सरकार को सभी सुविधाएं जुटानी चाहिए।

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