कृषि सुधारों में कमजोर संवाद: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

Prof. NK Singh By: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार Dec 11th, 2020 12:08 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

लाखों टन गेहूं तथा अन्य फसलें बारिश, तूफान या आग में नष्ट हो जाती हैं, लेकिन वहां पर्याप्त वेयरहाउसिंग क्षमता नहीं है। इस क्षेत्र में आधारभूत सुविधाएं जुटाने के लिए निवेश करने के लिए तथा आधुनिकीकरण के लिए निजी क्षेत्र को आगे आना ही चाहिए। अंबानी अथवा अडानी द्वारा किसानों के शोषण का भय कानून में सुरक्षा उपाय करके तथा प्राशसनिक निर्देशों से दूर किया जा सकता है। यह कानून किसान को अपनी फसल बेचने के लिए स्थान तथा एजेंट को चयनित करने की स्वतंत्रता देता है। किसानों तथा उनके हितों को सरकार के संरक्षण का आश्वासन जरूर मिलना चाहिए, किंतु कृषि सुधार अपरिहार्य हैं, समय की बड़ी जरूरत हैं, इसलिए इन्हें वापस नहीं लिया जाना चाहिए। किसानों को अपनी फसलें बेचने के लिए एक वैकल्पिक बाजार मिलेगा…

पंजाब और हरियाणा के किसान पिछले एक पखवाड़े से प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने सड़कों को जाम कर दिया है जिससे आम आदमी परेशान हो रहा है। हालांकि किसान दावा कर रहे हैं कि उनका प्रदर्शन व आंदोलन शांतिपूर्ण चल रहा है तथा वे सड़कों को जाम नहीं कर रहे हैं, इसके बावजूद प्रदर्शन के लिए सड़क पर जिस स्थान पर वे कब्जा कर लेते हैं, उससे सामान्य यातायात में बाधा आ रही है। किसानों की मांग है कि हाल में संसद ने कृषि सुधारों को लेकर जो कानून पास किए हैं, उन्हें वापस लिया जाए क्योंकि उनका मत है कि ये कानून उनके हितों के खिलाफ हैं। कोई भी यह बताने में असमर्थ है कि किसानों के खिलाफ कौनसा प्रावधान है।

यहां तक कि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी मददगार कमिशन एजेंट्स का उद्वरण देते हैं जिनकी सेवाएं खत्म कर दी जाएंगी। यह सत्य है कि ये कानून किसानों को अपनी फसलें बेचने के लिए कई वैकल्पिक चैनल उपलब्ध कराएंगे। इस तरह किसान अपने उत्पादों की सबसे बढि़या कीमत प्राप्त कर सकेंगे। लेकिन शक्तिशाली कमिशन एजेंट पैसा बनाने में कामयाब नहीं होंगे और यहां तक कि आरोप है कि यह राजनेताओं की मदद करेगा। ये कानून किसानों के शोषण को रोकेंगे, न कि उनके हितों के खिलाफ हैं। सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके द्वारा दिया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जारी रहेगा तथा यह किसानों पर निर्भर करेगा कि उनके अनुकूल कौनसा विकल्प है।

मेरा विचार है कि सरकार को इन कृषि कानूनों के लाभ किसानों को समझाने के लिए एक जोरदार सुनियोजित अभियान चलाना चाहिए। अब तक स्थिति यह है कि सरकार इन कानूनों के लाभ किसानों को समझा नहीं पाई है तथा सरकार व किसानों के मध्य संचार कमजोर रहा है। इस आंदोलन ने राजनीति व प्रदर्शन के अद्भुत विरोधाभास खड़े किए हैं। विरोध करने वाले अधिकतर नेता कृषि सुधारों के पक्षधर रहे हैं। मिसाल के तौर पर शरद पवार कभी पूर्व खाद्य आपूर्ति मंत्री के तौर पर चाहते थे कि बाजार को खोलने के लिए कानून में बदलाव किया जाए, लेकिन अब वह इसके खिलाफ हैं। सभी विपक्षी दलों ने इस कानून का समर्थन किया था तथा इसे संसद में पारित भी किया था, किंतु अब पूरा विपक्ष इसके खिलाफ है। ऐसी स्थिति में संसद की अपने आप में शुचिता क्या है?

जब कानून पास हो गए हैं तथा इनका विरोध हो रहा है, तो सरकार को इन्हें वापस लेने के लिए कहा जा रहा है। कई बार कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए गांधी जी का उद्वरण दिया जाता है, किंतु वह एक विदेशी सरकार के खिलाफ परिवर्तन व आधारभूत बदलाव का सृजन कर रहे थे, न कि किसी अपने तथा अपने लोगों द्वारा पारित कानून के खिलाफ थे। पंजाब के किसान ‘पैंपर्ड फार्मर्स’ हैं क्योंकि वे सरकार से सर्वोत्कृष्ट सुविधाएं प्राप्त करते हैं, किंतु उनका आउटपुट इनपुट से नहीं मिलता है। कृषि की उत्पादकता पहले ही सवालों के घेरे में है तथा हम बहुत निम्न उत्पादकता गु्रप हैं। पंजाब में किसान निशुल्क जल, बिजली तथा अन्य छूटों का लाभ उठा रहे हैं।

पंजाब का आउटपुट ‘गेहूं’ यूपी के 370 के मुकाबले 182 है। पंजाब में शत-प्रतिशत न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है, जबकि कर्नाटक में यह मात्र शून्य प्रतिशत है। महाराष्ट्र में यह 28 फीसदी है तथा यूपी में भी यह इसी तरह है। मैं केवल कुछ उदाहरणों का उद्वरण दे रहा हूं क्योंकि पंजाब के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार को अस्थिर करने के लिए राजनीतिक आधार पर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। किसानों के हितों के अनुरूप संशोधन करके इन कानूनों को बदला जा सकता है, किंतु इन सुधारों से पीछे हटने का सवाल ही नहीं है क्योंकि कृषि क्षेत्र को इन सुधारों की सख्त जरूरत है।

लाखों टन गेहूं तथा अन्य फसलें बारिश, तूफान या आग में नष्ट हो जाती हैं, लेकिन वहां पर्याप्त वेयरहाउसिंग क्षमता नहीं है। इस क्षेत्र में आधारभूत सुविधाएं जुटाने के लिए निवेश करने के लिए तथा आधुनिकीकरण के लिए निजी क्षेत्र को आगे आना ही चाहिए। अंबानी अथवा अडानी द्वारा किसानों के शोषण का भय कानून में सुरक्षा उपाय करके तथा प्राशसनिक निर्देशों से दूर किया जा सकता है।

यह कानून किसान को अपनी फसल बेचने के लिए स्थान तथा एजेंट को चयनित करने की स्वतंत्रता देता है। किसानों तथा उनके हितों को सरकार के संरक्षण का आश्वासन जरूर मिलना चाहिए, किंतु कृषि सुधार अपरिहार्य हैं, समय की बड़ी जरूरत हैं, इसलिए इन्हें वापस नहीं लिया जाना चाहिए। किसानों को अपनी फसलें बेचने के लिए एक वैकल्पिक बाजार मिलेगा। वे बढि़या दाम पर अपनी फसलें बेच सकेंगे। इससे उन्हें लाभ ही होगा। उनकी आय में वृद्धि की भी संभावना है।

सरकार ने किसानों के हित में कई योजनाएं चला रखी हैं। सरकार को अपनी बात किसानों तक पहुंचाने के लिए सुनियोजित प्रयास करना चाहिए। सरकार और किसानों के बीच जो कम्युनिकेशन गैप है, उसे दूर किया जाना चाहिए। किसानों को शांत करना जरूरी है ताकि वे घरों को लौटकर अपनी फसलों पर ध्यान दे सकें। इस तरह इस आंदोलन को शांत किया जा सकता है। सरकार को किसानों के प्रति अपनी कटिबद्धता दर्शाने की जरूरत है। मेरा सुझाव है कि किसानों को अपनी समस्या सुलझाने के लिए सरकार से बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए। अपनी मांगें मनवाने के लिए सरकार पर दबाव डाला जा सकता है। किसानों को यह बात भी समझनी चाहिए कि कृषि सुधार आज की जरूरत हैं।

कृषि क्षेत्र में सुधार किए बिना किसानों का कल्याण नहीं हो सकता है। इस सेक्टर में आधारभूत सुविधाएं जुटाने के लिए प्राइवेट सेक्टर की ओर से निवेश बिल्कुल जरूरी है। जब कृषि क्षेत्र का आधारभूत ढांचा मजबूत होगा, तो किसानों को कई प्रकार की सुविधाएं मिल सकेंगी। कृषि क्षेत्र में निजी निवेश का फायदा किसानों को भी अवश्य मिलेगा। सरकार भी कह रही है कि किसान कहीं भी देशभर में अपनी फसल बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे। जहां उन्हें उचित दाम मिलेंगे, वहीं वे अपनी फसल बेच सकते हैं। इससे किसानों की आय में निश्चित रूप से ही वृद्धि होगी। सरकार को किसानों के कल्याण के लिए नई योजनाएं भी चलानी चाहिएं।

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