चुनाव प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था

किशन बुशैहरी By: Jan 13th, 2021 12:07 am

पंचायत प्रतिनिधियों का पंचायत में जातिगत एवं वर्गगत संख्या के आधार पर चयनित होना प्रदेश की पंचायतों के संतुलित व समग्र विकास की दिशा में सबसे प्रमुख अवरोध है। वर्तमान घटनाक्रमों से यह तथ्य प्रकट होता है कि मतदाता अपने क्षेत्र में स्वस्थ एवं सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने के प्रति उदासीन हैं…

नववर्ष 2021 के प्रथम माह की दिनांक 17, 19 व 21 को हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं एवं स्थानीय निकायों के चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। इस चुनावी महाभारत में प्रदेश की लगभग 3615 ग्राम पंचायतों के विभिन्न पदों के लिए, पंचायत समिति के 1696 व जिला परिषद के 249 व 420 नगर निकाय सदस्यों के निर्वाचन के लिए मतदान होगा, जिसमें सिरमौर जिला के विकास खंड के अंतर्गत ग्राम पंचायत भैला व नवगठित पंचायत धारवा, मंडी जिला के करसोग विकास खंड की नवगठित पंचायत नाहविंधार के प्रतिनिधियों का चुनावी अधिसूचना से पूर्व ही सर्वसम्मति से चयन करना, प्रदेश में व्याप्त विभिन्न सामाजिक पूर्वाग्रहों व विसंगतियों, विरोधाभासों से मुक्त होकर संबंधित पंचायत के समग्र एवं भेदभाव मुक्त विकास के आधार को मजबूत किया है। इसके अतिरिक्त जनजातीय क्षेत्र किन्नौर की लगभग पांच पंचायतों के जन प्रतिनिधियों को सर्वसम्मति से चुनना व सिरमौर जिला की दुर्गम पंचायत सांगना के मतदाताओं ने देव परंपरा का अनुसरण करते हुए शिरगुल देवता के प्रांगण में सर्वसम्मति से पंचायत प्रतिनिधियों को चुन कर अपने क्षेत्र के सर्वांगीण विकास में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।

विकास खंड संगड़ाह की ग्राम पंचायत लाना चेता के 2200 मतदाताओं द्वारा प्रधान सहित समस्त पंचायत प्रतिनिधियों का सर्वसम्मति से चुनाव करना भी आश्चर्यचकित करता है, जोकि इस क्षेत्र के प्रबुद्ध मतदाताओं की क्षेत्रीय, राजनीतिक, सामाजिक सामंजस्य जैसी विलक्षण सोच का परिचायक है। इन पंचायतों  के प्रबुद्ध मतदाताओं ने प्रदेश वासियों के समक्ष सामाजिक जागरूकता एवं आपसी समन्वय का नवीन उदाहरण स्थापित किया है, जोकि प्रदेश के अन्य क्षेत्रों की पंचायतों के प्रबुद्ध मतदाताओं के लिए भी  अनुकरणीय है। इसके विपरीत मंडी जिला के एक सामाजिक संगठन के कुछ प्रतिनिधियों द्वारा जाति आधारित आरक्षित सीटों के मतदान का बहिष्कार या नोटा के प्रयोग का आह्वान करना प्रदेश के सामाजिक, संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था के इस सुदृढ़ ढांचे को ध्वस्त करने की दिशा में एक भ्रामक प्रयास भी है। ग्रामीण विकास के नवीन आयाम स्थापित करने में पंचायती राज व्यवस्था सबसे महत्त्वपूर्ण कड़ी है। कामगारों, किसानों एवं साधारण नागरिकों, विशेषकर महिला वर्ग को सशक्त तथा सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक रूप से समर्थ करने में पंचायती राज संस्थान महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। मंडी जिला की थरजनू पंचायत की युवा निवर्तमान प्रधान जबना चौहान प्रदेश की समस्त महिलाओं एवं युवाओं को इनके द्वारा अपनी पंचायत में किए गए विभिन्न सामाजिक एवं विकासात्मक कार्यों की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय चर्चा भविष्य के जनप्रतिनिधियों को उत्कृष्ट कार्य करने के लिए प्रेरित करती रहेगी। प्रदेश के समावेशी विकास के प्रारूप, जोकि शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण की अवधारणा पर केंद्रित है, जिस को मूर्तरूप देने में यह सूक्ष्म लोकतांत्रिक व्यवस्था पूर्ण रूप से सक्षम है।

यही पंचायती राज व्यवस्था का मंतव्य भी है। किसी भी पंचायत के समग्र विकास में पंचायत प्रतिनिधियों का ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ व पारदर्शी होना अत्यंत आवश्यक है। पंचायत प्रतिनिधियों में इन आवश्यक गुणों के अभाव के कारण पंचायत के विकासात्मक कार्यों में विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप पंचायत के विकास की संभावना लगभग शून्य हो जाती है। आदिकाल से ही भारतीय सामाजिक परिवेश में समाज के विभिन्न आंतरिक मुद्दों के सकारात्मक हल में पंचायत प्रणाली एक सशक्त एवं प्रभावशाली भूमिका का निर्वहन करती रही है। पंचायत जनप्रतिनिधियों का न्यायप्रिय व तटस्थ होना नितांत आवश्यक है क्योंकि इन जनप्रतिनिधियों से न्यायप्रियता, कर्तव्यनिष्ठा एवं समानता की अपेक्षा की जाती रही है। प्रदेश वासी इस कड़वे यथार्थ से भी विमुख नहीं हो सकते हैं कि पंचायती राज संस्थाओं में अत्यधिक आर्थिक एवं न्यायिक शक्तियां समाहित होने के कारण व मनरेगा जैसे आर्थिक कार्यों के क्रियान्वयन हेतु प्रदत अधिकारों के परिणामस्वरूप अधिकांश भ्रष्ट एवं लालची प्रत्याशी प्रदेश के मतदाताओं को शराबखोरी, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसे संकीर्ण मुद्दों के माध्यम से प्रलोभित करने में तत्पर रहते हैं।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ग्रामीण पंचायती राज व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उनके कथनानुसार वास्तविक लोकतंत्र कुछ गिने चुने व केंद्रित व्यक्तियों द्वारा स्थापित नहीं किया जा सकता है, अपितु इसमें समाज के समस्त वर्गों की भागीदारी व सहभागिता सुनिश्चित होनी चाहिए। परंतु प्रदेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्तिथियों के अनुरूप प्रदेश की पंचयाती राज व्यवस्था के प्रतिनिधियों का चुनाव भी प्रदेश के जातिगत व क्षेत्रगत ध्रुवीकरण की धुरी पर ही घूमता रहा है। पंचायत प्रतिनिधियों का पंचायत में जातिगत एवं वर्गगत संख्या के आधार पर चयनित होना प्रदेश की पंचायतों के संतुलित व समग्र विकास की दिशा में सबसे प्रमुख अवरोध है। प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक घटनाक्रमों से यह तथ्य प्रकट होता  है कि प्रदेश के मतदाता अपने क्षेत्र में स्वस्थ एवं सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित करने के प्रति उदासीनता भी इसका प्रमुख कारण है जिसके परिणामस्वरूप पंचायती राज संस्थान भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद एवं भेदभाव का प्रमुख केंद्र बन कर उभर रहे हैं, जोकि भविष्य में इस सूक्ष्म लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल उद्देश्यों की पूर्ति को पूर्ण करने में प्रमुख बाधा बन कर उभर सकते हैं।

यह विचारणीय एवं सुखद तथ्य है कि प्रदेश पंचयाती  राज विभाग व चुनावी प्रक्रिया में सम्मिलित अधिकारी एवं कर्मचारी वर्ग पूर्ण निष्ठा व निष्पक्षता के साथ चुनाव प्रक्रिया का निर्वहन करते रहे हैं। परंतु इसका स्याह पक्ष यह भी है कि प्रदेश के मतदाताओं एवं प्रत्याशियों में जागरूकता, नैतिकता का अभाव, निजी स्वार्थ व प्रलोभन इस सूक्ष्म लोकतांत्रिक व्यवस्था को खंडित करने में प्रयासरत हैं। अतः प्रदेश के प्रबुद्ध मतदाताओं का भी यह नैतिक कर्त्तव्य बनता है कि ग्रामीण विकास की मूल सूत्रधार एवं न्यायिक व्यवस्था की इस महत्त्वपूर्ण कड़ी को सुदृढ़ करने हेतु जाति निरपेक्ष, निष्पक्ष एवं भ्रष्टाचार मुक्त पंचायत निर्माण में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दें।

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