कुशल फार्मासिस्ट के रूप में मोदी

Prof. NK Singh By: Jan 29th, 2021 12:08 am

अब हम उस राजनीति की बात करेंगे जो वैक्सीन को लेकर चल रही है। भारत ने एक सुरक्षित, सस्ती तथा प्रभावकारी दवा का निर्माण किया। इस प्रयास को विश्व भर में श्लाघा भी मिली, लेकिन अपने घर में इसको लेकर राजनीति के सिवाय कुछ नहीं हुआ। हमने सुना कि यह भाजपा की वैक्सीन है तथा बुरी है। ऐसा करके हमने उन वैज्ञानिकों तथा तकनीशियनों का अपमान किया जिन्होंने रिकार्ड समय में इसे बनाने के लिए कठोर परिश्रम किया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं निर्माण केंद्रों का दौरा किया तथा उत्पादन के लिए उन्होंने हर प्रकार की सहायता उपलब्ध करवाई। इस सहायता का परिणाम है कि इस दवा की कीमत मात्र छह डालर है, जबकि अमरीकी दवा की कीमत 30 और रूसी दवा की कीमत 19 डालर है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह दवा ज्यादा प्रभावकारी है तथा कई राष्ट्रों के लिए निशुल्क ही उपलब्ध है…

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मानवता को बचाने के लिए मिशन चलाकर विश्व के रक्षक के रूप में उभरे हैं। उन्होंने न केवल अपने लोगों को कोविड वैक्सीन की सप्लाई सुनिश्चित की, बल्कि पूरे विश्व को वैक्सीन भेजी जा रही है। इस अभियान का एक हिस्सा कमर्शियल सेल से संबंधित है, जबकि दूसरा हिस्सा यह है कि वैक्सीन को गरीब लोगों को तथा जरूरतमंद विश्व को भी भेजा जा रहा है। क्या इससे पहले कभी आपने देखा है कि भारत से वैक्सीन की मांग इतने स्तर पर की जा रही है। एक देश के प्रधानमंत्री का भारत को लिखा गया पत्र हृदय को छू लेने वाला है जिसमें वह अपनी मदद की गुहार लगाते हैं तथा वैक्सीन को निशुल्क देने की मांग करते हैं। भारत की ओर से भूटान, नेपाल, मॉरीशस, मालदीव, मोरक्को, बांग्लादेश को वैक्सीन की निशुल्क आपूर्ति की गई तथा अगली सूची में श्रीलंका भी शामिल है। ब्राजील को यह दवा बेची गई है तथा अन्य देश भी हो सकते हैं जो इसे खरीदने की क्षमता रखते हैं। क्या आपने विश्व में ऐसा अंतरराष्ट्रीय परोपकार व मानवतावाद देखा है। विश्व ने अब तक यह देखा है कि अमरीका, रूस तथा फ्रांस जैसे अमीर देश गरीब देशों की मदद करते रहे हैं, किंतु अपनी शर्तों पर यह मदद हुई है। ये देश गरीब देशों को अपनी प्रौद्योगिकी, विशेषज्ञों की सेवाएं लेने अथवा ऋण लेने के लिए कहते रहे हैं। चीन ने बेची गई दवाओं के बिल भेजे तथा संबंधित देशों को अदायगी करने के लिए कहा। यहां मोदी ने पूरे विश्व को मानवतावादी संदेश दिया। दवा के बदले न कोई कीमत मांगी गई, न कोई शर्तें थोपी गईं और न ही किसी तरह की अपेक्षा की गई। यह हिंदुओं की दान करने की भावना है। यह उस हिंदू दर्शन की तरह व्यवहार है जिसके अनुसार पूरा विश्व ही एक परिवार है। हिंदू दर्शन में विश्व को वसुधैव कुटुंबकम कहा गया है। मानवीय भावना में क्या हम एक-दूसरे से संबद्ध नहीं हैं?

बिल गेट्स ने भारत के इस परोपकार व मानवतावाद की प्रशंसा करके सही किया है। एक विश्व में रहते हुए हम एक-दूसरे से संबद्ध हैं तथा एक-दूसरे के प्रति हमारी भावनाएं होनी चाहिए। मैंने एमबीए के कोर्स में छात्रों को सहानुभूति के साथ-साथ संवेदना के बारे में भी पढ़ाया था। जब विश्व को कोई दुख होता है तो अधिकतर लोग संवेदना से परिपूर्ण होते हैं। ऐसे दुख के प्रति वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं। मैं जब स्टील उद्योग में काम करता था तो मेरा एक ऐसे केस से सामना हुआ जिसमें अल्पायु का एक लड़का नौकरी के लिए आवेदन करता है। यह नौकरी ऐसे मामलों के लिए आरक्षित थी जिसमें पिता अथवा अभिभावक ड्यूटी समय में मर जाता है। ऐसे मामले में उसके बच्चे को नौकरी पाने का अधिकार रहता है। क्योंकि लड़का अल्पायु था, इसलिए उसका आवेदन इस टिप्पणी के साथ निरस्त कर दिया गया कि हमें सहानुभूति तो है, किंतु हम आपकी मदद के लिए कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि हमारे ऊपर नियमों का बंधन है।

 इस संबंध में मेरे पास जो फाइल आई, उसमें मैंने यहा लिखा, ‘किसी युवक की मदद करने का मौका दोबारा नहीं मिल सकता, जबकि उसके पिता ब्लास्ट फर्नेस में ऑपरेशन करते हुए अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। जब तक यह बच्चा वयस्क नहीं हो जाता, तब तक हम उसे अस्थायी पद दे सकते हैं। इस तरह उसके परिवार की मदद हो जाएगी।’ मेरे अधिकारियों ने इस पर तर्क किया कि ऐसा करना कानून-सम्मत नहीं है, हालांकि इस मामले में हमें सहानुभूति है। मैंने उन्हें बताया कि में सहानुभूति का प्रयोग कर रहा हूं, संवेदना का नहीं। सहानुभूति एक ऐसी भावना है जब आप उस स्थिति में होते हैं कि आप कुछ कर सकते हैं। उस मामले में मैंने अस्थायी नौकरी दी तथा नियम का भी कोई उल्लंघन नहीं हुआ। आप अन्य व्यक्ति की स्थिति में अनुभव करते हैं तथा केवल नियम लागू करने के लिए ‘रैडटैपिस्ट’ अथवा लालफीताशाह नहीं बनते। अक्सर नियमों का हवाला देकर लालफीताशाही को प्रोत्साहित किया जाता है। समस्या का समाधान निकालने के लिए सहानुभूति का दृष्टिकोण मदद करता है। ऐसा ही दृष्टिकोण अपनाते हुए मैंने इंडस्ट्रियल रिलेशंस के कई विवादों की समस्याओं तथा कठिनाइयों का समाधान किया। अगर सभी देश सहानुभूति की ऐसी भावना रखें तो यह विश्व व्यवस्था तथा शांति की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। मोदी ने इस मामले में एक मिसाल कायम की है तथा आने वाले समय में उन्हें न केवल विश्व के फार्मासिस्ट के रूप में जाना जाएगा, बल्कि वह मानवता के पुजारी के रूप में भी उभर रहे हैं। अब हम उस राजनीति की बात करेंगे जो वैक्सीन को लेकर चल रही है। भारत ने एक सुरक्षित, सस्ती तथा प्रभावकारी दवा का निर्माण किया।

 इस प्रयास को विश्व भर में श्लाघा भी मिली, लेकिन अपने घर में इसको लेकर राजनीति के सिवाय कुछ नहीं हुआ। हमने सुना कि यह भाजपा की वैक्सीन है तथा बुरी है। ऐसा करके हमने उन वैज्ञानिकों तथा तकनीशियनों का अपमान किया जिन्होंने रिकार्ड समय में इसे बनाने के लिए कठोर परिश्रम किया। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं निर्माण केंद्रों का दौरा किया तथा उत्पादन के लिए उन्होंने हर प्रकार की सहायता उपलब्ध करवाई। इस सहायता का परिणाम है कि इस दवा की कीमत मात्र छह डालर है, जबकि अमरीकी दवा की कीमत 30 और रूसी दवा की कीमत 19 डालर है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह दवा ज्यादा प्रभावकारी है तथा कई राष्ट्रों के लिए निशुल्क ही उपलब्ध है। मोदी ने मानवता के आधार पर विश्व को जीत लिया है, लेकिन यह दुख की बात है कि अपने देश में कुछ किसान उनकी मौत के नारे लगा रहे हैं, जबकि सरकार किसान आंदोलन से नरमी के साथ बर्ताव कर रही है। एक ऐसे व्यक्ति जिनका विश्व भर में सम्मान हो रहा है, उनके पास अपने देश में कृतघ्न समुदाय से सीखने के लिए काफी कुछ है। आशा करनी चाहिए कि तमाम आधारहीन आलोचनाओं के बावजूद नरेंद्र मोदी मानवता की भलाई के अपने अभियान को इसी तरह जारी रखेंगे।

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