प्राचीन शिक्षा पद्धति की प्रासंगिकता

प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का एक प्रमुख तत्त्व गुरुकुल व्यवस्था रही है। इसमें विद्यार्थी अपने घर से दूर गुरु के घर पर निवास कर शिक्षा प्राप्त करता था। गुरु के समीप रहते हुए विद्यार्थी उसके परिवार का एक सदस्य हो जाता था तथा गुरु उसके साथ पुत्रवत व्यवहार करता था। आत्म-निर्भरता की भावना विकसित होती थी…

देश में सत्ता से जुड़ा हुआ माने जाने वाले एक बड़े ताकतवर सामाजिक संगठन के एक पदाधिकारी ने 6 दिसंबर को नागपुर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) के संदर्भ में कहा है कि ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली ने देश में पहले से मौजूद शिक्षा प्रणाली को नष्ट कर दिया है। उनके द्वारा इस बात को दोहराया गया कि आज देश में अनेक लोग गलत सोचते हैं कि भारत में कोई शिक्षा प्रणाली नहीं थी और देश में शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों द्वारा शुरू की गई थी। इस बात के विश्लेषण की जरूरत है कि क्या वाकई हमारे देश में हमारी संस्कृति में अंग्रेजों से पहले कोई अच्छी शिक्षा प्रणाली का अभाव था, शायद ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हमारी प्राचीन भारतीय सभ्यता विश्व की सर्वाधिक रोचक तथा महत्त्वपूर्ण सभ्यताओं में एक है। इस सभ्यता के समुचित ज्ञान के लिए प्राचीन शिक्षा पद्धति का अध्ययन करना आवश्यक है जिसने इस सभ्यता को चार हजार वर्षों से भी अधिक समय तक सुरक्षित रखा, उसका प्रचार-प्रसार किया तथा उसमें संशोधन किया। प्राचीन भारतीयों ने शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व प्रदान किया। वैदिक युग से ही इसे प्रकाश का स्रोत माना गया जो मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को आलोकित करते हुए उसे सही दिशा-निर्देश देता है। प्राचीन भारतीयों का यह दृढ़ विश्वास था कि शिक्षा द्वारा प्राप्त एवं विकसित की गई बुद्धि ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है। प्राचीन भारतीयों की दृष्टि में शिक्षा मनुष्य के सर्वांगीण विकास का साधन थी। इसका उद्देश्य मात्र पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं था, अपितु मनुष्य के स्वास्थ्य का भी विकास करना था। प्राचीन विचारकों की दृष्टि में शिक्षा मनुष्य के साथ आजीवन चलने वाली वस्तु है। हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली नैतिकता से परिपूर्ण थी। मनुस्मृति में वर्णित है कि ‘सभी वेदों का ज्ञाता विद्वान भी सच्चरित्रता के अभाव में श्रेष्ठ नहीं है, किंतु केवल गायत्री मंत्र का ज्ञाता पंडित भी यदि वह चरित्रवान है तो श्रेष्ठ कहलाने योग्य है।’ पुरातन भारतीय शिक्षा प्रणाली में विद्यार्थी के लिए शिक्षा की व्यवस्था कुछ इस प्रकार की गई थी कि प्रारंभ से ही उसे सच्चरित्र होने की प्रेरणा मिलती थी और वह तदनुसार अपने को विकसित करता था। वह गुरुकुल में आचार्य के सान्निध्य में रहता था।

आचार्य न केवल विद्यार्थी की बौद्धिक प्रगति का ध्यान रखता था, अपितु उसके नैतिक आचरण की भी निगरानी करता था। वह इस बात का ध्यान रखता था कि विद्यार्थी दिन-प्रतिदिन के जीवन में शिष्टाचार एवं सदाचार के नियमों का पालन करे। विद्यार्थी के समक्ष महापुरुषों व महान नारियों के उच्च चरित्र का आदर्श प्रस्तुत किया जाता था जिससे उसके चरित्र निर्माण में प्रेरणा मिलती थी। प्राचीन शिक्षा पद्धति को विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण के लक्ष्य को पूरा करने में सफलता मिली थी। इसके द्वारा शिक्षित विद्यार्थी कालांतर में चरित्रवान एवं आदर्श नागरिक बनते थे। भारत की यात्रा पर आने वाले विदेशी यात्रियों- मैगस्थनीज, हुएनसांग आदि सभी ने यहां के लोगों के नैतिक चरित्र के समुन्नत होने का प्रमाण प्रस्तुत किया है। प्राचीन शिक्षा का एक उद्देश्य विद्यार्थी को व्यक्तित्व के विकास का पूरा अवसर प्रदान करना था। भारतीय व्यवस्थाकारों ने व्यक्तित्व को दबाने का कभी भी प्रयास नहीं किया। कुछ विद्वान ऐसा सोचते हैं कि यहां की शिक्षा पद्धति में कठोर अनुशासन के द्वारा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को दबा दिया गया, जिससे उनका समुचित विकास नहीं हो सका। प्राचीन शिक्षा पद्धति में विद्यार्थी के बौद्धिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास का भी पूरा ध्यान रखा गया था। शिक्षा के द्वारा विद्यार्थी में आत्म-सम्मान, आत्म-विश्वास, आत्म-संयम, विवेक-शक्ति, न्याय-शक्ति आदि गुणों का उदय होता था जो उसके व्यक्तित्व को विकसित करने में सहायक थे। विद्यार्थी को भविष्य की चिंता नहीं सताती थी। उसके निर्वाह का उत्तरदायित्व समाज अपने कंधों पर वहन करता था। छात्र का लक्ष्य स्पष्ट एवं सुनिश्चित था। यदि वह व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करता तो उसकी वृत्ति पूर्व निर्धारित थी। यदि वह धार्मिक शिक्षा ग्रहण करता तो भी निर्धनता उसके मार्ग में बाधक नहीं थी। उसकी आवश्यकताएं सीमित होती थीं तथा समाज उनकी पूर्ति करता था।

 विद्यार्थी सादा जीवन एवं उच्च विचार का आदर्श सामने रखता था। आत्मसंयम एवं आत्मानुशासन की प्रवृत्तियां भी व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती थीं। उसे अपने इंद्रियों की उच्छृंखल प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखना पड़ता था। आहार, विहार, वस्त्र, आचरण आदि सभी को उसे नियमित करना होता था। शुद्धता एवं सादगी उसके जीवन के मुख्य ध्येय थे। भारतीय चिंतकों ने विद्यार्थी की प्रवृत्तियों एवं भावनाओं को अनावश्यक दबाने का प्रयास नहीं किया। आत्म-नियंत्रण एवं आत्मानुशासन से उनका तात्पर्य यथोचित एवं यथावश्यक आहार, विहार, वस्त्राभरण, निद्रा, शयन आदि से था। इससे विद्यार्थी को उच्छृंखल होने से बचाया जाता था। अध्यापक विद्यार्थी को प्रताडि़त करने के बजाय प्रेम एवं सद्भावना द्वारा सन्मार्ग में प्रवृत्त करता था। प्राचीन भारतीय शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक सुख एवं निपुणता को प्रोत्साहन प्रदान करना भी था। केवल संस्कृति अथवा मानसिकता और बौद्धिक शक्तियों को विकसित करने के लिए ही शिक्षा नहीं दी जाती थी, अपितु इसका मुख्य ध्येय विभिन्न उद्योगों, व्यवसायों आदि में लोगों को दक्ष बनाना था। भारतीय शिक्षा पद्धति ने सदैव यह उद्देश्य अपने समक्ष रखा कि नई पीढ़ी के युवकों को उनके आनुवंशिक व्यवसायों में कुशल बनाया जाए। सभी प्रकार के कार्यों के लिए शिक्षा देने की व्यवस्था प्राचीन भारत में थी। कार्य विभाजन के द्वारा विभिन्न शिल्पों और व्यवसायों में लोग निपुणता प्राप्त करने लगे जिससे सामाजिक प्रगति को बल मिला तथा समाज में संतुलन भी बना रहा। आर्य जाति की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य वैदिक साहित्य को सुरक्षित बनाए रखना था। भारत में वेद तथा अन्य धर्म ग्रंथ जिस प्रकार से आज तक जीवित हैं, उसकी समता किसी अन्य सभ्यता में देखने को नहीं मिलती है। इस प्रकार प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के उद्देश्य अत्यंत उच्च कोटि के थे। शिक्षा संबंधी प्राचीन भारतीयों का दृष्टिकोण मात्र आदर्शवादी ही नहीं, अपितु अधिकांश अंशों में व्यावहारिक भी था।

यह व्यक्ति को सांसारिक जीवन की कठिनाइयों एवं समस्याओं के समाधान के लिए सर्वथा उपयुक्त बनाती थी। शिक्षा समाज सुधार का सर्वोत्तम माध्यम थी। वात्स्यायन के कामसूत्र में 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है जिनका अध्ययन सुसंस्कृत महिला के लिए अनिवार्य बताया गया है। ये पाकविद्या, शारीरिक प्रसाधन, संगीत, नृत्य, चित्रकला, सफाई, सिलाई-कढ़ाई, व्यायाम, मनोरंजन आदि से संबंधित हैं। कामसूत्र के अतिरिक्त कादम्बरी, शुक्रनीतिसार, ललितविस्तर आदि में भी 64 कलाओं का उल्लेख मिलता है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का एक प्रमुख तत्त्व गुरुकुल व्यवस्था रही है। इसमें विद्यार्थी अपने घर से दूर गुरु के घर पर निवास कर शिक्षा प्राप्त करता था। गुरु के समीप रहते हुए विद्यार्थी उसके परिवार का एक सदस्य हो जाता था तथा गुरु उसके साथ पुत्रवत व्यवहार करता था। परिवार के वातावरण से दूर रहने के कारण उसमें आत्म-निर्भरता की भावना विकसित होती थी। आज हमें गुरुकुल जैसी गुणपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को दोबारा जीवंत करने की जरूरत है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमें असंवेदनशील बना रही है। नई शिक्षा नीति यदि इसमें भारतीयता का पुट लाने में कामयाब होती है तो यह अपने आप में एक अभूतपूर्व शैक्षणिक संयोग होगा।

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