डा. वरिंदर भाटिया

क्या विदेशी विश्वविद्यालयों का मकसद शिक्षा को एक व्यापारिक उत्पाद के रूप में पेश करना होगा या फिर शिक्षा उनके लिए सामाजिक और कल्याणकारी उत्पाद होगा जो कि देसी शिक्षा संस्थानों में भी कम हो रहा है। इन बिंदुओं का जवाब तो सब जानते हैं, फिर भी देश में उच्च शिक्षा की हालत और चुनौतियों

आर्य समाज का देश की आज़ादी में बहुमूल्य योगदान है। इसका पाखंडवाद और अंधविश्वास के खिलाफ संघर्ष अपने आप में एक अविचलित वैचारिक क्रांति है। आर्य समाज का खास तौर पर डीएवी संस्थाओं के जरिए देश में शिक्षा के फैलाव में अति महत्त्वपूर्ण योगदान है। समाज की कुरीतियों से लडऩे की जरूरत आज भी कम

छात्राओं का यौन उत्पीडऩ शिक्षा समाज में एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। इसे राज्य सरकारें कभी भी हल्के से न लें। क्यों न हमारे पत्रकार दोस्तों और सरकारों द्वारा यह पड़ताल की जाए कि राज्यों के स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी व कोचिंग सेंटर्स में छात्राओं की अस्मत की सुरक्षा के क्या उपाय किए गए हैं।

प्रोन्नति सीधी भर्ती से हो या फिर अन्य विधियों से, यह सहज-सामान्य, सतत एवं वैज्ञानिक होनी चाहिए। इसका तात्पर्य यह भी है कि शोषण का शिकार हमारे सीनियर प्राध्यापक भी होते हैं। भारत अपनी युवा जनसंख्या के बूते पर विश्व पटल पर प्रखरता से उभरना चाहता है तो उसे सबसे पहले उच्च शिक्षा के उत्थान

निहित सुधारों में ग्रेडेड अकेडमिक, एडमिनिस्ट्रेटिव और फाइनेंशियल ऑटोनॉमी आदि शामिल हों। क्षेत्रीय भाषाओं में ई-कोर्स शुरू किए जाएं। वर्चुअल लैब्स विकसित किए जाएं। इसके लिए हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को सक्रिय होना चाहिए। नए कॉलेज शिक्षा फ्रेमवर्क में केवल सैद्धांतिक पहलू को ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक पक्ष पर भी खासा जोर दिया जाए ताकि

हमें अपने देश के स्कूल छात्रों को होलिस्टिक मतलब सम्पूर्ण शिक्षा मुहय्या करवानी है। इससे हमारे छात्र ज्यादा सामाजिक जिम्मेवार और देश हितों के प्रति संवेदनशील बन सकेंगे। इसके लिए बेहतर क्वालिटी की एकेडेमिक्स की भी जरूरत है। यह सब तब हो सकेगा जब हमारे अध्यापक बेहतरीन और अपडेटेड होंगे। टीचर ट्रेनिंग का सिलसिला कई

यह ठीक है कि कुछ निजी विश्वविद्यालय गुड वर्क कर रहे हैं, लेकिन क्या यह सच नहीं कि अनेक प्राइवेट यूनिवर्सिटीज का ध्यान आर्थिक फायदे की तरफ ज्यादा होता है और शिक्षा की गुणवत्ता की अनदेखी की जाती है। छात्रों का आर्थिक और अकादमिक शोषण होता है। मान लें यदि कुछ निजी विश्वविद्यालय इन विसंगतियों

हम तब तक अच्छी व्यवस्था खड़ी नहीं कर पाएंगे जब तक हम वोट का महत्त्व और अपने मतदाता होने के फर्ज को पूरी जिम्मेदारी के साथ निभा नहीं देते हैं। चुनाव प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण समझकर चुनाव के दिन घर में ही रहने का प्रयास न करें, अपितु परिवार के साथ घर से बाहर निकलकर वोट

शिक्षा हमें नैतिकता सिखा कर, हमारे कत्र्तव्यों के बारे में बताकर समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बनाने में हमारी मदद करती है। यह सच है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसे प्राप्त करके इनसान अपने पैरों पर खड़ा हो सके और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके, लेकिन शिक्षा का मूल उद्देश्य इनसान को एक

न्याय अभी भी देश के बहुसंख्यक नागरिकों की पहुंच के बाहर है, क्योंकि वे वकीलों के भारी खर्च वहन नहीं कर पाते हैं और उन्हें व्यवस्था की प्रक्रियात्मक जटिलता से होकर गुजरना पड़ता है। भारतीय न्याय तंत्र में विभिन्न स्तरों पर सुधार की दरकार है। यह सुधार न सिर्फ न्यायपालिका के बाहर से, बल्कि न्यायपालिका