डा. वरिंदर भाटिया

यही वजह है कि अपनी प्रसिद्धि को देखते हुए फिल्मों के कलाकार राजनीति में आ तो जाते हैं, पर कम ही लंबी पारी खेल पाने में सफल होते हैं। फिल्म के पर्दे की राजनीतिक दुनिया से एक अपनी अलग ही दुनिया और अलग ही दास्तां है। यहां सफलता पर दर्शकों की तालियों की गूंज बार-बार सुनाई देती है। लेकिन फिल्मी स्टार से नेता बनने के बाद मन में दबी-छुपी आशंकाएं जन्म लेती हैं। ऐसे में अपनों से टकराहट, शिकायत और उलाहने के दौर के बीच की भी एक दुनिया होती है, जहां कई बार कोई साथ नहीं होता। सोचना होगा कि बॉलीवुड और नेतागिरी किस हद तक एक-दूसरे के पूरक हंै। बॉलीवुड समाज के लिए क्या कर सकता है...

पहली बात यह समझ लेनी है कि हमें समय का प्रबंधन नहीं करना है, बल्कि उपलब्ध समय के अनुसार अपना प्रबंधन करना है। दूसरी बात यह समझ लेनी चाहिए कि सीमित समय में आप जितने काम कर लेना चाहते हैं, वे कभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे, इसलिए एक तरह के अधूरेपन को झेलने की, उसके साथ जीने की आदत आपको विकसित करनी ही होगी। तीसरी बात

वास्तव में यह एक क्रांति की तरह है, जिससे हर दिन लाखों छात्र लाभान्वित हो रहे हैं। एआई को अगर आने वाले समय की मुख्य जरूरत कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पढ़ाई से लेकर बिजनेस तक कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां इसका इस्तेमाल नहीं होता है। समय के साथ लोगों की निर्भरता एआई पर बढ़ी है और आगे यह और बढ़ेगी। राज्य सरकारें स्कूल शिक्षा की विषय वस्तु में आर्टिफिशियल इंटेलि

पानी आवश्यकता ही नहीं, हमारे प्राणों से जुड़ा है। इसके लिए हम सबकी पहल जरूरी है, अन्यथा आने वाले समय में क्या देश और क्या दुनिया, सभी को प्यासे ही गुजर-बसर करना होगा। जल ही जीवन है। जल के बिना कल की कल्पना नहीं की जा सकती। जल संरक्षण, वॉटर रिजार्च और जन जागरूकता ही विकल्प हैं। लोगों की भागीदारी के बिना यह संभव नहीं है...

आप उन लोगों की लिस्ट तैयार करें जिनके साथ आपको हमेशा एक सहारा मिलता रहा है, जिनके पास आप अपना सुख-दुख बांट पाती हों या जिनके पास आप खुलकर हर बात बोल पाती हों। अकेलेपन की भले ही आप शिकार हों, लेकिन यह हमेशा खुद सोचें कि आपको जहां तक हो सके, सोशल बनना है। इसके लिए आप खुद को कहें कि आप इंट्रेस्टिंग हैं और आपको लोग पसंद

उच्च शिक्षा में लड़कियों की बढ़ती संख्या का स्वागत करना चाहिए, लेकिन इस शिक्षा का उनके जीवन को हर लिहाज से बेहतर बनाने में क्या योगदान रहने वाला है, यह भी जानते रहना जरूरी है। आज निजीकरण के कारण महिलाओं केलिए उच्च शिक्षा इतनी महंगी होती जा रही है कि कोई गरीब आधी रोटी खाकर भी अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है। इसका खामियाजा सबसे अधिक लड़कियों को उठाना पड़ रहा है। दरअसल समाज की यह हकीकत है कि लडक़ी को चाहे जितना शिक्षित कर लो,

आज के विश्वविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयीय शिक्षा की अनेक समस्याएं हैं जिन पर शासन तथा शिक्षाविदों का ध्यान केंद्रित है। माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के प्रसार के कारण विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है और प्रश्न यह है कि क्या विश्वविद्यालय उन सभी विद्यार्थियों को स्थान दें, जो आगे पढऩा चाहते हैं, अथवा केवल उन्हीं को चुनकर लें जो उच्च शिक्षा से लाभ उठाने में समर्थ हों? शिक्षा का माध्यम क्या हो, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। शोध कार्य को प्रश्रय न देने की समस्या

इस क्षेत्र में घरेलू हिंसा को रोकने और कम करने के लिए, लिंग-तटस्थ कानून लागू किए जाने चाहिए और लिंगवादी कानून नहीं बनाए जाने चाहिए। पुरुषों के खिलाफ मानसिक और शारीरिक प्रताडऩा, न तो अब संवेदनहीन मुद्दा है, न ही इस पर बात करना महिला अधिकारों का किसी प्रकार का अतिक्रमण है। जहां तक पुरुषों के उत्पीडऩ का प्रश्न है, इस पर बात करना मानव अधिकारों का, समाज में संतुलन बनाए रखना है। एक देशी डॉक्यू

हमारे राज्य भी शिक्षा पर काफी राशि खर्च करते हैं, लेकिन इस राशि को तार्किक तरीके से खर्च किए जाना नदारद पाया जाता है और काफी पैसे बेफिजूल खर्च किए जाते हैं। डिजिटल शिक्षा के तेजी से विकसित हो रहे परिदृश्य में, आज के शिक्षार्थियों की गतिशील जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकी का एकीकरण अनिवार्य हो गया है। शिक्षा में प्रौद्योगिकी की कमी ने असंख्य चुनौतियां पैदा की हैं जो सीखने की प्रक्रिया की प्रभावशीलता, पहुंच और अनुकूलनशीलता में बाधा उत्पन्न करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में, शैक्षिक ऐप्स शिक्षा के सभी पहलुओं में एक महत्वपूर्ण घटक

विधि आयोग की सिफारिशों में इस बात पर जोर दिया गया है कि लंबित मुकदमों के निपटारे के लिए छुट्टियों के दिनों में कटौती की जानी चाहिए। अमरीकी विचारक अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने कहा था, ‘न्यायपालिका राज्य का सबसे कमजोर तंत्र होता है, क्योंकि उसके पास न तो धन होता है और न ही हथियार। धन के लिए न्यायपालिका को सरकार पर आश्रित रहना होता है और अपने दिए गए फैसलों को लागू कराने के लिए उसे कार्यपालिका पर निर्भर रहना होता है।’ ऐसे कई मामले हैं जिन्हें केवल बातचीत के माध्यम से हल किया जा सकता है...