डा. वरिंदर भाटिया

दक्षिण कन्नड़ के डिप्टी कमिश्नर शशिकांत सेंथिल ने अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद लिखा था- मौजूदा दौर में जब हमारे विविधतापूर्ण लोकतंत्र के सभी संस्थान अभूतपूर्व तरीके से समझौता कर रहे हैं, ऐसे में उनका काम जारी रखना अनैतिक होगा। सेंथिल ने आगे लिखा है कि आने वाला वक्त हमारे देश के मूल स्वभाव के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इसलिए ये बेहतर होगा कि वो प्रशासनिक सेवा से बाहर होकर लोगों के जीवन में भलाई लाने वाला काम करें। कुछ सवाल हैं- क्या अफसरों का मौजूदा सरकारों के साथ काम करना मुश्किल हो गया है? क्या सरकारें अफसरों के साथ ज्यादा सख्ती दिखा रही हैं? या सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं को नुकसान पहुंचाने के जो आरोप लगते हैं वो सही हैं...

हजारों योग्य नेट-पीएचडी धारक शिक्षक 15 से 20 हजार रुपए के मानदेय पर ठेके पर पढ़ाने को मजबूर हैं। जिस शिक्षक के पास खुद का भविष्य सुरक्षित नहीं है, वह छात्रों के भविष्य का निर्माण कैसे करेगा? फर्जी जर्नल्स और कट-कॉपी-पेस्ट रिसर्च हो रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पेटेंट और मौलिक शोध में योगदान बेहद कम है। अकादमिक तरक्की पाने के लिए पेड जर्नल्स में नकली शोध पत्र छपवाने का एक पूरा रैकेट फल-फूल रहा है...

बच्चों को अपने प्रति संवेदनहीन बनाने में मां-बाप का भी कुछ कसूर है। सोचें कि यदि आप अपने बच्चों को बोझ की तरह पालेंगे तो बच्चों से क्या उम्मीद करते हैं कि वे आपकी सेवा करेंगे? कदापि नहीं। संस्कार और प्यार तो दूर की बात है, स्त्री और पुरुष जब दोनों घर से बाहर धन कमाने को जाते हैं, तो उनके बच्चे पीछे कैसी कैसी यातनाएं सहते हैं, ऐसी परिस्थितियों का उनके मस्तिष्क में अपने माता-पिता के प्रति कड़वाहट उत्पन्न करना स्वाभाविक है। क्या यह सच नहीं है? क्या हमारे बच्चे समझते हैं कि कल हम भी बुजुर्ग होंगे और इसी दौर से गुजरेंगे। क्या हम सहमत हैं कि जो बच्चे अपने बुजुर्ग मां-बाप के नहीं हो सकते हैं, तो किसी के भी नहीं हो सकते...

2024 के कानून में भी दस साल तक की जेल और करोड़ों का जुर्माना था, फिर भी प्रश्नपत्र लीक होते रहे। इसलिए सवाल है कि सिर्फ आंकड़े बढ़ाने से कितना फर्क पड़ेगा? जानकारों का कहना है कि पेपर लीक असल में पेपर की छपाई, ढुलाई और रखरखाव के दौरान या कोचिंग माफिया के नेटवर्क से होता है। जब तक इस पूरी प्रक्रिया की सुरक्षा, साइबर निगरानी और तकनीकी ऑडिट मजबूत नहीं होगा, तब तक अकेली सजा से पेपर लीक नहीं रुकेगा...

समाज के वर्किंग क्लास और निम्न मध्यवर्ग में यह अहसास मजबूत हुआ है कि उनके बच्चे जीवन की दौड़ में तभी टिक सकते हैं जब वे शिक्षा प्राप्त करें। इसलिए यह समूह अब अपने बच्चों की शिक्षा के लिए हर तरह का संघर्ष कर रहा है। वह पेट काटकर, जमीन गिरवी रखकर, कर्ज लेकर भी बच्चों को पढ़ा रहा है। इसके कारण पिछले डेढ़-दो दशकों में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा में दाखिला बढ़ा है, लैंगिक अंतर कम हुआ है। यह एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन अगर फीस इसी तरह बढ़ती रही तो गरीब तबके को मन मारकर इस दौड़ से बाहर निकल जाना होगा। निश्चय ही उच्च शिक्षा से एक बड़े वर्ग का वंचित होना ठीक नहीं है...

कई जगहों पर, शिक्षा को अभी भी एक ऐसी प्रणाली के रूप में देखा जाता है जो छात्रों को जिंदगी के लिए नहीं, बल्कि परीक्षाओं के लिए तैयार करती है। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए दूरदर्शिता, प्रतिबद्धता और सहयोग की जरूरत होती है। गुणवत्ता अकेले किसी एक व्यक्ति या संस्था से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए सभी- शिक्षकों, अभिभावकों, छात्रों और नीति-निर्माताओं- को मिलकर काम करने की जरूरत होती है। शिक्षा में गुणवत्ता की चाहत कोई एक बार का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। इसका मतलब है उत्कृष्टता की आदतें विकसित करना...

यदि पति या उसका परिवार नियंत्रण की आड़ में महिला के साथ शारीरिक या मानसिक क्रूरता (दहेज उत्पीडऩ, मारपीट) करता है, तो महिला के पास भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कानूनी सहायता लेने का पूरा अधिकार है। भारतीय समाज में कई बार बड़े बुजुर्गों या पारंपरिक मान्यताओं को लेकर पति-पत्नी के बीच टकराव हो जाता है। इन मामलों में धैर्य, समझदारी और आपसी बातचीत से समस्याओं का हल निकाला जाता है। पति-पत्नी के रिश्ते में नियंत्रण की समस्या बहुत अधिक बढ़

हालांकि, सरकार चाहे तो ऐसी बाधाओं को आसानी से दूर कर सकती है। इसके लिए मजबूत इच्छा शक्ति की दरकार है। कुछ टीचर पैसा बनाने के फेर में पेपर लीक कांड से जुड़े पाए जा रहे हैं। यह शर्म की बात है? कुछ राष्ट्र निर्माता क्यों राष्ट्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं? क्यों कथित कोचिंग इंडस्ट्री देश के छात्रों की नैसर्गिक काबलियत बर्बाद कर रही है? मां-बाप की मेहनत की कमाई कोचिंग माफिया खाये जा रहा है...

ये ठीक नहीं कि आप जवान आबादी को, चाहे वह लडक़ा हो या लडक़ी, घर पर बैठा दो और सिर्फ इसलिए फ्रीबीज दे दो, ताकि वे आपके लिए वोट करें। ऐसा करके आप न सिर्फ बेकार लेबर बना रहे हैं, बल्कि सिस्टम में एक तरह का नुकसानदेह लेबर बना रहे हैं, जो आलसी हो जाता है। ऐसे लोग फिर दूसरी तरह की गलत हरकतों में पड़ जाते हैं, क्योंकि उनके पास करने को कुछ नहीं होता। 2019 में एक राजनीतिक दल ने अपने इलेक्शन मेनिफेस्टो में कहा था कि वह गरीबी रेखा से नीचे वालों को हर साल निश्चित रुपए देगा। ध्यान रहे कि यह टारगेटेड या यूनिवर्सल बेसिक इनकम भी फ्रीबीज का ही एक रूप है...

सैद्धांतिक शिक्षाविदों के बजाय, कई नए संस्थान उद्योग जगत के विशेषज्ञों को ला रहे हैं, जिन्होंने वास्तविक दुनिया की समस्याओं के समाधान विकसित किए हैं और अब वे उन्हें पढ़ाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अनुसंधान अप्रासंगिक है, बल्कि दृष्टिकोण ज्ञान प्राप्त करने से हटकर व्यावहारिक चिंतन की ओर स्थानांतरित हो रहा है। डिजिटल क्रांति के दौर में, अब किताबी कागज पर आधारित शिक्षण पद्धति प्रचलित नहीं रही। नए कॉलेज सीखने को प्रयोगशालाओं, वास्तविक परियोजनाओं, फील्डवर्क और स्टार्टअप प्रोटोटाइप तक ले जा रहे हैं। छात्र केवल पाठ्यपुस्तकों के प्रश्न हल नहीं कर रहे हैं, बल्कि वास्तविक दुनिया की समस्याओं पर काम कर रहे हैं...