डा. वरिंदर भाटिया

समाज के वर्किंग क्लास और निम्न मध्यवर्ग में यह अहसास मजबूत हुआ है कि उनके बच्चे जीवन की दौड़ में तभी टिक सकते हैं जब वे शिक्षा प्राप्त करें। इसलिए यह समूह अब अपने बच्चों की शिक्षा के लिए हर तरह का संघर्ष कर रहा है। वह पेट काटकर, जमीन गिरवी रखकर, कर्ज लेकर भी बच्चों को पढ़ा रहा है। इसके कारण पिछले डेढ़-दो दशकों में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा में दाखिला बढ़ा है, लैंगिक अंतर कम हुआ है। यह एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन अगर फीस इसी तरह बढ़ती रही तो गरीब तबके को मन मारकर इस दौड़ से बाहर निकल जाना होगा। निश्चय ही उच्च शिक्षा से एक बड़े वर्ग का वंचित होना ठीक नहीं है...

कई जगहों पर, शिक्षा को अभी भी एक ऐसी प्रणाली के रूप में देखा जाता है जो छात्रों को जिंदगी के लिए नहीं, बल्कि परीक्षाओं के लिए तैयार करती है। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए दूरदर्शिता, प्रतिबद्धता और सहयोग की जरूरत होती है। गुणवत्ता अकेले किसी एक व्यक्ति या संस्था से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए सभी- शिक्षकों, अभिभावकों, छात्रों और नीति-निर्माताओं- को मिलकर काम करने की जरूरत होती है। शिक्षा में गुणवत्ता की चाहत कोई एक बार का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। इसका मतलब है उत्कृष्टता की आदतें विकसित करना...

यदि पति या उसका परिवार नियंत्रण की आड़ में महिला के साथ शारीरिक या मानसिक क्रूरता (दहेज उत्पीडऩ, मारपीट) करता है, तो महिला के पास भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कानूनी सहायता लेने का पूरा अधिकार है। भारतीय समाज में कई बार बड़े बुजुर्गों या पारंपरिक मान्यताओं को लेकर पति-पत्नी के बीच टकराव हो जाता है। इन मामलों में धैर्य, समझदारी और आपसी बातचीत से समस्याओं का हल निकाला जाता है। पति-पत्नी के रिश्ते में नियंत्रण की समस्या बहुत अधिक बढ़

हालांकि, सरकार चाहे तो ऐसी बाधाओं को आसानी से दूर कर सकती है। इसके लिए मजबूत इच्छा शक्ति की दरकार है। कुछ टीचर पैसा बनाने के फेर में पेपर लीक कांड से जुड़े पाए जा रहे हैं। यह शर्म की बात है? कुछ राष्ट्र निर्माता क्यों राष्ट्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं? क्यों कथित कोचिंग इंडस्ट्री देश के छात्रों की नैसर्गिक काबलियत बर्बाद कर रही है? मां-बाप की मेहनत की कमाई कोचिंग माफिया खाये जा रहा है...

ये ठीक नहीं कि आप जवान आबादी को, चाहे वह लडक़ा हो या लडक़ी, घर पर बैठा दो और सिर्फ इसलिए फ्रीबीज दे दो, ताकि वे आपके लिए वोट करें। ऐसा करके आप न सिर्फ बेकार लेबर बना रहे हैं, बल्कि सिस्टम में एक तरह का नुकसानदेह लेबर बना रहे हैं, जो आलसी हो जाता है। ऐसे लोग फिर दूसरी तरह की गलत हरकतों में पड़ जाते हैं, क्योंकि उनके पास करने को कुछ नहीं होता। 2019 में एक राजनीतिक दल ने अपने इलेक्शन मेनिफेस्टो में कहा था कि वह गरीबी रेखा से नीचे वालों को हर साल निश्चित रुपए देगा। ध्यान रहे कि यह टारगेटेड या यूनिवर्सल बेसिक इनकम भी फ्रीबीज का ही एक रूप है...

सैद्धांतिक शिक्षाविदों के बजाय, कई नए संस्थान उद्योग जगत के विशेषज्ञों को ला रहे हैं, जिन्होंने वास्तविक दुनिया की समस्याओं के समाधान विकसित किए हैं और अब वे उन्हें पढ़ाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अनुसंधान अप्रासंगिक है, बल्कि दृष्टिकोण ज्ञान प्राप्त करने से हटकर व्यावहारिक चिंतन की ओर स्थानांतरित हो रहा है। डिजिटल क्रांति के दौर में, अब किताबी कागज पर आधारित शिक्षण पद्धति प्रचलित नहीं रही। नए कॉलेज सीखने को प्रयोगशालाओं, वास्तविक परियोजनाओं, फील्डवर्क और स्टार्टअप प्रोटोटाइप तक ले जा रहे हैं। छात्र केवल पाठ्यपुस्तकों के प्रश्न हल नहीं कर रहे हैं, बल्कि वास्तविक दुनिया की समस्याओं पर काम कर रहे हैं...

शैक्षणिक संस्थानों की संख्या में वृद्धि के कारण गुणात्मक शिक्षा और प्रशिक्षण में गिरावट आई है, क्योंकि कई संस्थानों में उचित मान्यता और संकाय की कमी है। उदाहरण के लिए कई कॉलेज घटिया शिक्षा प्रदान करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्नातक बेरोजगार हो जाते हैं। शिक्षित युवाओं में उच्च बेरोजगारी दर की समस्या का समाधान करने के लिए, भारत को कौशल विकास को बढ़ावा देना होगा, शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना होगा, श्रम-प्रधान क्षेत्रों को बढ़ावा देना होगा, उद्यमशीलता का समर्थन करना होगा...

इस रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 8.6 प्रतिशत संस्थानों ने माना कि उनके पाठ्यक्रम पूरी तरह से उद्योग की जरूरतों के अनुरूप हैं। वहीं 51 प्रतिशत से ज्यादा संस्थानों ने साफ कहा कि उनके कोर्स का उद्योग से कोई तालमेल ही नहीं है। यह स्थिति आकांक्षाओं और जमीनी हकीकत के बीच गहरे अंतर को दिखाती है। उन्होंने यहां तक कहा कि भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अपने तय किए गए लक्ष्यों को हासिल करने में संरचनात्मक रूप से कमजोर है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कॉलेजों में इंडस्ट्री से जुड़े अनुभवी प्रोफेशनल्स की भागीदारी बहुत कम है...

भारत की आईटी इंडस्ट्री दशकों से देश की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ रही है, लेकिन अब एक नए और खतरनाक दौर से गुजर रही है। खतरा कोई और नहीं, बल्कि आईटी कंपनियों द्वारा बनाया गया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ही है। जहां पहले सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, टेस्टिंग और सर्विसेज जैसी सेवाओं पर निर्भर कंपनियां चमक रही थीं, उनके बुरे दिन शुरू हो चुके हैं। बुरे दिन इसलिए क्योंकि अब उन तमाम कार्यों को एआई ऑटोमेटेड करके सीधा उनके बिजनेस मॉडल को ही चुनौती दे रहा है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि देश को दुनिया का आउटसोर्सिंग हब माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था में आईटी सेक्टर, बीपीओ, कॉल सेंटर्स और बैक-ऑफिस सेवाओं में लाखों लोगों को रोजगार मिलता है...

एपस्टीन फाइल्स ने दुनियाभर में सनसनी मचाई है। लोग इन फाइलों को एक्सेस करना चाहते हैं और उन सरकारी वेबसाइटों पर जा रहे हैं जहां इन्हें अपलोड किया गया है। लेकिन अब एपस्टीन फाइल्स को एक जगह पर देखने का तरीका तैयार कर दिया गया है। इसका नाम जेमेल है। यह देखने में एकदम जीमेल की तरह है। कहते हैं इस पर जाकर जेफ्री एपस्टीन के ईमेल्स को बहुत आसानी से एक्सेस किया जा सकता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस टूल को सॉफ्टेवयर इंजीनियर रहे ल्यूक इगेल और राइली वाल्ज ने मिलकर तैयार किया है। कुल मिला कर एपस्टीन फाइलों ने साफ कर दिया है कि यह मामला सिर्फ एक अपराधी तक सीमित नहीं था, बल्कि ताकत, पैसे और प्रभाव का एक गहरा जाल था...