भारतीय राजनीति का गिरता स्तर

Prof. NK Singh By: Jan 15th, 2021 12:08 am

इस तरह के दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाओं का कारण भी यही है कि दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। अगर हम संसद की बात करें तो वहां भी कई सदस्यों का व्यवहार निर्लज्जता की श्रेणी में आता है। संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जा रहा है तथा सदन में पर्चे फाड़े जा रहे हैं। एक-दूसरे पर कुर्सियां भी फैंकी जा रही हैं। हमारे 35 फीसदी सांसद ऐसे हैं जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि है। ब्रिटिश संसद के एक सदस्य ने मुझसे पूछा कि हम ऐसे सांसदों को चुनते क्यों हैं? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। इस तरह राजनीति का स्तर दिन-प्रति दिन गिरता जा रहा है…

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि देश के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए दो दवाओं को विकसित किया है। यह एक बड़ी खुशखबरी थी तथा प्रत्येक भारतीय को हमारे वैज्ञानिकों एवं तकनीशियनों द्वारा की गई खोज को गर्व से लेना चाहिए। हमें अपने वैज्ञानिकों पर गर्व होना चाहिए।  हिमाचल में पहले से ही बड़ी संख्या में फार्मा इकाइयां स्थापित हैं तथा वे अमरीका जैसे देशों को 50 फीसदी दवाओं की आपूर्ति करती हैं। इसका श्रेय हमारी फार्मा इंडस्ट्री को जाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आर्थिक बढ़त के साथ विपणन और विक्रय का प्रबंधन किया जाए।

यह हमारी बड़ी त्रासदी है कि कुछ राजनेता, राजनीतिक दल तथा पत्रकार निहित स्वार्थों के कारण तथा राजनीतिक लाभ के लिए इस उपलब्धि को स्वीकार नहीं करते हैं तथा अकारण ही निंदा करते हैं। इसी तरह कुछ लोग हमारे मिसाइल परीक्षण पर भी संदेह जताते हैं। भारतीय राष्ट्रवाद का यह मतलब नहीं है कि हमें अपनी गलतियों और विफलताओं की अनदेखी करनी चाहिए, बल्कि इसका मतलब है कि हमें अपने वैज्ञानिकों की उपलब्धियों, सैन्य सफलताओं तथा अन्य उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए तथा इनका आनंद लेना चाहिए। लेकिन कुछ लोगों को हर क्षेत्र की उपलब्धियों को लेकर समस्या ही समस्या है। पाकिस्तान से बदला लेने के लिए जब हमारी सेना ने बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक की, तो उस पर भी कई प्रश्न उठाए गए तथा सेना की इस उपलब्धि को संदेह की दृष्टि से देखा गया। अब भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई दो दवाओं को लेकर संदेह जताया जा रहा है। वैज्ञानिकों की उपलब्धि पर आभारी होने के बजाय उस पर अकारण सवाल खड़े किए जा रहे हैं। हाल में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव वैक्सीन की आलोचना में यहां तक चले गए कि उन्होंने इसे भारतीय जनता पार्टी की वैक्सीन करार दे दिया।

 उन्होंने आशंका जताई कि इससे जनता को क्षति होगी। साथ ही उन्होंने जनता से आह्वान कर दिया कि वह इस वैक्सीन को न ले। सच्चाई यह है कि इस वैक्सीन को 20 हजार से अधिक लोगों पर परीक्षित किया गया है तथा उनके परिणामों को वैज्ञानिकों द्वारा ध्यानपूर्वक ढंग से विश्लेषित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है। इसके विपरीत कई देशों ने इस वैक्सीन को खरीदने के लिए इच्छा जताई है। ब्राजील इसका एक उदाहरण है। हमारे देश में देखा यह जा रहा है कि हम अपने ही लोगों की उपलब्धियों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। उपलब्धियों की प्रशंसा करना या आभार जताना तो दूर की बात है। सरकार की महत्त्वपूर्ण कार्रवाइयों को भी समर्थन नहीं मिल पाता है जिससे राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुंच रही है। फ्रांस से लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले में भी यह देखा गया। चीन के साथ भारत के संबंधों के मामले में भी राष्ट्रीय हितों को नुकसान करने वाली बातें हुईं। जो आरोप लगाए गए हैं, वे अधिकतर मामलों में झूठे साबित हुए हैं। फ्रांस से राफेल विमानों की खरीद के मामले में आरोप लगा कि इस खरीद में गड़बड़झाला हुआ है। आरोप लगाने वाले इस बात को साबित नहीं कर पाए। राफेल विमानों की खरीद लंबे समय से लंबित थी तथा राष्ट्र की सुरक्षा की दृष्टि से इन विमानों की खरीद बहुत जरूरी थी। भारत-चीन संबंधों के मामले में भी कुछ तबकों ने ऐसे आरोप लगाए कि उससे शत्रु देश को लाभ हुआ और भारत को क्षति पहुंची।

 फ्रांस और चीन जैसे मसले राष्ट्रीय महत्त्व के हैं। कम से कम इन मसलों पर सियासत नहीं होनी चाहिए तथा देश को एकजुट दिखना चाहिए। यह हमारी त्रासदी है कि हम शत्रु के समक्ष भी एकजुट नहीं रह पाते। भारत की गंदी होती राजनीति तथा भारतीय राजनीति के गिरते स्तर के ये कुछ उदाहरण हैं। खालिस बुरे व्यवहार के उदाहरण तथा राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाने वाली अन्य कार्रवाइयां भी जनता की नजर में हैं। हम यह प्रमाणित नहीं कर सकते कि कैसे राजनेता यहां तक कि बुरे व्यवहार में संलिप्त होते जा रहे हैं। सबसे बुरा उदाहरण महाराष्ट्र का है, जहां शिवसेना नेता संजय राउत ने फिल्म अभिनेत्री कंगना रणौत को न केवल हरामखोर कहा, बल्कि ऐसा करके एक सम्माननीय व्यक्तित्व का अनादर भी किया। पार्टी के भीतर भी संजय राउत से किसी ने उनके इस व्यवहार पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि इसके उल्ट पार्टी में उन्हें समर्थन मिलता दिख रहा है। पूरा देश अविश्वास के ऐसे वातावरण में पिसता दिख रहा है तथा इस तरह के दुर्व्यवहार दिन-प्रतिदिन आम होते जा रहे हैं। यहां तक कि किसानों का आंदोलन भी राष्ट्रीय हितों की चिंता करता नहीं दिखता है। दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह होने जा रहा है जहां ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि होंगे। इसके बावजूद किसान संगठन उस दिन दिल्ली में भारी भीड़ लाकर उसे घेरने की धमकी दे रहे हैं। इससे राष्ट्रीय पर्व में बाधा पहुंचेगी तथा राष्ट्रीय हितों को नुकसान होगा। यह बात अलग है कि बाद में मिली सूचनाओं के अनुसार ब्रिटिश प्रधानमंत्री का यह दौरा वहां की घरेलू परिस्थितियों के कारण रद्द कर दिया गया है। इसी तरह शिवसेना के एक सांसद का एयर इंडिया की एक उड़ान में सार्वजनिक व्यवहार खेदजनक है। इस सांसद ने बिजनेस क्लास टै्रवल के लिए पूछा तो उन्हें बताया गया कि यह उड़ान ‘ऑल इकोनोमी’ है। इससे गुस्साए शिवसेना सांसद ने उड़ान के स्टाफ को बुरी तरह धमकाया तथा उन्हें पीटने के लिए अपनी चप्पल तक उतार दी। इस सांसद के विरुद्ध कोई भी अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

इस तरह के दुर्व्यवहार की बढ़ती घटनाओं का कारण भी यही है कि दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती है। अगर हम संसद की बात करें तो वहां भी कई सदस्यों का व्यवहार निर्लज्जता की श्रेणी में आता है। संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित किया जा रहा है तथा सदन में पर्चे फाड़े जा रहे हैं। एक-दूसरे पर कुर्सियां भी फैंकी जा रही हैं। हमारे 35 फीसदी सांसद ऐसे हैं जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि है। ब्रिटिश संसद के एक सदस्य ने मुझसे पूछा कि हम ऐसे सांसदों को चुनते क्यों हैं? मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। इस तरह भारत की राजनीति का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। भारतीय राजनीति गंदी हो गई है। भारतीय राजनीति उस अंधेरी गुफा में फंस गई है जहां कोई यह नहीं जानता कि कौन सच बोल रहा है तथा कौन सही मार्ग का अनुसरण कर रहा है। सियासी दलों को पार्टी हित एक किनारे रखते हुए इस गंदगी को हटाने के लिए कोई पहल करनी चाहिए। तभी भारतीय राजनीति अपना खोया हुआ स्तर वापस पा सकती है।

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