सोशल मीडिया का बड़ा एजेंडा

स्वाभाविक था सभ्यताओं के संघर्ष में लगी अब्राहमी सेनाओं का ध्यान एक बार फिर भारत की ओर गया। किसी भी तरीके से भारत की राजनीति के केंद्र में पहुंच चुकी सांस्कृतिक शक्तियों को किसी भी तरीके से अपदस्थ करना होगा। शायद शुरू में उन्हें लगता होगा कि नरेंद्र मोदी एक-आध पारी खेल कर निकल लेंगे। लेकिन अब लगता है कि दर्शक उन्हें इतनी जल्दी निकलने नहीं देंगे। सभ्यताओं के संघर्ष में लगी अब्राहमी सेनाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है। इसलिए अब उनके निशाने पर भारत है और इस लड़ाई में सोशल मीडिया के नाम से मोर्चा संभाल रही विदेशी कंपनियां भी अपने मोर्चे संभाल चुकी हैं। बाबा साहिब अंबेडकर ने संविधान सभा में दिए गए अपने अंतिम भाषण में इसी का अंदेशा ज़ाहिर किया था। उन्होंने कहा था कि अपने देश के कुछ लोग भी बाहर वालों के साथ मिल जाते हैं…

सोशल मीडिया की आजकल सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है। जबसे कर्नाटक की एक लड़की दिशा रवि की टूलकिट प्रकाश में आई है, तब से यह चर्चा भारत में ज़्यादा ज़ोर पकड़ रही है। न्यू मीडिया या अन्य नामों से यह मीडिया विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा भी बन रहा है। बड़ी-बड़ी कंपनियां सोशल मीडिया के लिए मंच प्रदान करती हैं। फेसबुक, यू-ट्यूब, ट्विटर इत्यादि इसी प्रकार की कंपनियां हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया पर इन कंपनियों का किसी न किसी प्रकार से प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रहता है। लेकिन फिलहाल इस प्रकार की सभी कंपनियां विदेशी मूल की ही हैं। यह ठीक है कि उनमें बहुत से भारतीय मूल के लोग भी काम करते हैं, लेकिन नीति निर्धारण का काम मालिकों के हाथ में ही होता है, इसमें संशय नहीं है। कुछ कंपनियां ऐसी भी हैं जो आपके आगे ज्ञान का भंडार खोल कर रख देती हैं। ऐसे सर्च इंजन बहुत प्रभावी हैं। गूगल उन्हीं में से एक सर्च इंजन है। लेकिन इन इंजनों के ज्ञान की भी एक दिशा रहती ही है। उनका ज्ञान परोसने की अपनी उद्देश्य युक्त पद्धति है। ऊपर से देखने पर यह दृश्य बहुत मनोहर दिखाई देता है। पूरा विश्व एक बड़े परिवार जैसा। लेकिन इसकी भावना विश्व परिवार जैसी नहीं है, जिसका हम लोग भारत में बैठ कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के नाम से जाप करते रहते हैं। इन कंपनियों की भावना कहीं न कहीं अपने साम्राज्य को बढ़ाने की आकांक्षा में ही छिपी हुई है। कहा भी गया है, जैसी जाकी भावना तैसी सिद्धि होय। इन विदेशी कंपनियों की भावना पूरे विश्व को परिवार बनाने की नहीं, बल्कि पूरे विश्व पर वैचारिक दृष्टि से क़ब्ज़ा करने की ही है। सूत्र में कहा जाए तो यूरोप का एजेंडा वही है जिसके चलते स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस और इंग्लैंड ने कभी विश्व के अधिकांश भूभाग पर क़ब्ज़ा कर लिया था, लेकिन उसका तरीक़ा बदल गया है।

सैम्युएल हैमिंगटन जिसको क्लैश आफ सिविलाइजेशन या सभ्यताओं का संघर्ष कहता है, यह एक प्रकार से सभ्यताओं का संघर्ष ही है। अंतर केवल इतना है कि पहले यह अब्राहम सभ्यताओं के बीच ही होता था। भारत की सभ्यता और संस्कृति इन लड़ रही सेनाओं की गिनती में नहीं थी। उसका कारण इस संस्कृति का संकुचन हज़ारों वर्ष में सिकुड़ते-सिकुड़ते जम्मू द्वीप के एक हिस्से तक ही रह गया था। सभ्यता के संघर्ष में लगी सेनाओं ने इसे इस हिस्से से भी मिटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। यह प्रक्रिया तो अंग्रेज़ों के भारत में आने के बाद ही शुरू हो गई थी। लेकिन यूरोप इस बात पर प्रसन्न था कि अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भी भारत की सरकारों ने इन प्रक्रियाओं को जारी रखा। सेक्युलिरिजम के नाम पर भारत सरकार ने भारत की संस्कृति को ही आधिकारिक तौर पर नकार दिया। इसलिए  सभ्यताओं के संघर्ष में लगी सेनाएं भारत और भारत सरकार की ओर से निश्चिंत हो गई थीं। सोनिया गांधी के भारत में आ जाने से उनकी यह निश्चिंतता और भी बढ़ गई थी। लेकिन तभी विश्व की राजनीति में दो घटनाएं घटीं। पहली तो अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर एक सभ्यता के पोषकों ने आक्रमण कर दिया। अब तक यूरोप के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को दुनिया भर में फैलाने का दायित्व वैसे भी अमरीका ने संभाल लिया था क्योंकि विश्व की राजनीति और संघर्ष में यूरोप थोड़ा अस्वस्थ हो गया था। अमरीका पर हुए इस आक्रमण ने सभ्यताओं के इस संघर्ष को तेज़ तो कर दिया, लेकिन इसी बीच विश्व रंगमंच पर एक और घटना हो गई। जम्बू द्वीप के भारत खंड में भारतीय जनता पार्टी का राज आ गया। भारत की सांस्कृतिक शक्तियां राजनीति के केंद्र बिंदु में आ गईं। अभी तक हाशिए में बैठे भारत ने भी विश्व राजनीति में अपने सांस्कृतिक आधार पर अपनी भूमिका तलाशनी शुरू कर दी। किसी सरकार ने पहली बार मांग की कि योग का प्रचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व स्तर पर योग दिवस मनाए। संयुक्त राष्ट्र को यह स्वीकार भी करना पड़ा। भारत के सांस्कृतिक प्रतीकों की भारत में ही पुनर्स्थापना होने लगी। अयोध्या में  शताब्दियों पहले सभ्यताओं के संघर्ष में ही गिरा दिए गए राम मंदिर का पुनर्निर्माण होने लगा। गुजरात में स्टेच्यु आफ  यूनिटी उभर कर सामने आया। दक्षिण पूर्व एशिया के बौद्ध देशों से आना-जाना बढ़ने लगा।

स्वाभाविक था सभ्यताओं के संघर्ष में लगी अब्राहमी सेनाओं का ध्यान एक बार फिर भारत की ओर गया। किसी भी तरीके से भारत की राजनीति के केंद्र में पहुंच चुकी सांस्कृतिक शक्तियों को किसी भी तरीके से अपदस्थ करना होगा। शायद शुरू में उन्हें लगता होगा कि नरेंद्र मोदी एक-आध पारी खेल कर निकल लेंगे। लेकिन अब लगता है कि दर्शक उन्हें इतनी जल्दी निकलने नहीं देंगे। सभ्यताओं के संघर्ष में लगी अब्राहमी सेनाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है। इसलिए अब उनके निशाने पर भारत है और इस लड़ाई में सोशल मीडिया के नाम से मोर्चा संभाल रही विदेशी कंपनियां भी अपने मोर्चे संभाल चुकी हैं। बाबा साहिब अंबेडकर ने संविधान सभा में दिए गए अपने अंतिम भाषण में इसी का अंदेशा ज़ाहिर किया था। उन्होंने कहा था कि अपने देश के कुछ लोग भी बाहर वालों के साथ मिल जाते हैं। विदेशी कंपनियों द्वारा संचालित सोशल मीडिया की यह खूबी भी है कि वे इनकी शिनाख्त नहीं होने देतीं। भारत के लोगों को विदेशी कंपनियों के इरादों को समझना होगा। भारत की संस्कृति का प्रचार-प्रसार तेज करना होगा। वसुधैव कुटुंबकम वाली भारत की संस्कृति को विश्व भर में मान्यता प्राप्त है। भारत में विकसित योग को भी विश्व को मान्यता देने के लिए विवश होना पड़ा है। यह भारतीयों के लिए गर्व की बात होनी चाहिए। पश्चिमी संस्कृति के फैलाव का इरादा रखने वाली ताकतों को भारतीय ही जवाब दे सकते हैं। भारत को अपनी समस्याओं का समाधान भारतीय संदर्भ में करना होगा। कभी विश्व गुरु माने जाने वाला भारत इतनी ताकत तो रखता ही है कि वह अपनी समस्याओं का समाधान भारतीय संदर्भ में निकाले। विदेश के आगे गिड़गिड़ाने की जरूरत भारत को नहीं होनी चाहिए। हमें विदेशी कंपनियों के इरादे सफल नहीं होने देने हैं। अगर ये इरादे सफल रहे तो भारत सांस्कृतिक रूप से गुलाम हो जाएगा।

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