कुलदीप चंद अग्निहोत्री

क्षणिक लाभ के लिए आदमी लोभ की वृत्ति से ग्रसित हो जाता है और उसके कारण उसका सांसारिक और गृहस्थ जीवन प्रभावित होता है। मनोविकारों पर नियंत्रण पाना ही सबसे बड़ी साधना है… देशभर में दशगुरु परंपरा के नवम गुरु श्री तेगबहादुर जी की चार सौवीं जयंती मनाई जा रही है। उनकी जन्मसाखी में एक

कैप्टन अमरेंद्र का विरोध भी समझ में आता है। आखिर किसान का जो पैसा आढ़ती के पास आता है, वह उसे अकेले थोड़ा पचा पाता होगा। हो सकता है उसमें अकेले पचा पाने की क्षमता भी हो, लेकिन आसपास की जुंडली भला उसे अकेले पचाने देगी। इसलिए कैप्टन साहिब का विरोध देख कर भी आश्चर्य

दारा शुकोह को तर्क से उत्तर देने की बजाय हथियार से उत्तर क्यों दिया गया? लेकिन दो धाराओं की इस टक्कर में दारा शुकोह का साथ देना एक प्रकार से भारत की सांस्कृतिक लिहाज़ से रक्षा करना ही था। परंतु मुग़लों के राजनीतिक आतंक के उस युग में कोई भी दारा शुकोह की धारा के

उन्हें हिंदुस्तान का लोकतंत्र दिखाई नहीं देता। आंखों के चश्मे के कारण लोकतंत्र की प्रतिमा भी तानाशाही दिखाई देती है। विदेशी चश्मे और हिंदुस्तान पर दोबारा राज करने की इच्छा को किनारे रखकर यदि सोनिया परिवार देखने की कोशिश करेगा तो उसे स्पष्ट दिखाई देगा कि लोकतंत्र हिंदुस्तान का स्वभाव है… कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल

पैर पर चोट के माध्यम से ममता को हिंसा कराने वाली नहीं बल्कि हिंसा की शिकार निरीह महिला बनाने की कोशिश की गई। लेकिन सार्वजनिक स्थान पर हज़ारों लोगों के सामने हमला कैसे हुआ? सुरक्षा कर्मचारी कहां थे? हज़ारों लोगों के सामने हमला करने के बाद कोई भाग कैसे सकता है? क्योंकि ममता कम से

एक मुसलमान का, चाहे उसका पुतला ही क्यों न हो, जलाया गया था। क़ायदे से उसे दफनाना चाहिए था। लेकिन ग़ुलाम नबी इससे भी डरे नहीं। आखिर थे तो भट्ट ही। कश्मीर में आज भी अनेक भट्ट दफनाते नहीं जलाते ही हैं, चाहे पुतला ही क्यों न हो। एक पत्रकार ने आखिर पूछ ही लिया

स्वाभाविक था सभ्यताओं के संघर्ष में लगी अब्राहमी सेनाओं का ध्यान एक बार फिर भारत की ओर गया। किसी भी तरीके से भारत की राजनीति के केंद्र में पहुंच चुकी सांस्कृतिक शक्तियों को किसी भी तरीके से अपदस्थ करना होगा। शायद शुरू में उन्हें लगता होगा कि नरेंद्र मोदी एक-आध पारी खेल कर निकल लेंगे।

वर्तमान किसान आंदोलन में भी आम आदमी पार्टी की यही भूमिका है। उन्हें आशा थी कि किसान आंदोलन को समर्थन की आड़ में वे पंजाब में प्रभावी पार्टी बन कर उभरेंगे जिसका लाभ आने वाले विधानसभा चुनावों में लिया जा सकेगा। लेकिन पंजाब के लोगों ने शायद आम आदमी पार्टी को यह ख़तरनाक खेल खेलने

गांवों से चुन कर आए ये युवा राजमहलों में रहने के आदी हो चुके अब्दुल्ला परिवार व सैयद परिवार से ज़्यादा अच्छी तरह घाटी के युवा मानस को पहचानते हैं। यही कारण था नए समीकरणों में सैयद परिवार और अब्दुल्ला परिवार दोनों ही हाशिए पर आ गए। जिला परिषदों में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के पदों

सीटों की बात रहने भी दें तो उसे वोट प्रतिशत में भी ऐतिहासिक गिरावट आई है। लोगों को ग़ुलाम नबी की पार्टी ही ख़ुश रख सकती है। यदि सचमुच ऐसा होता तो जम्मू वाले उनकी पार्टी को गोधूली न चटाते। जहां तक कश्मीर संभाग का सवाल है, वहां कुछ गिनी-चुनी पार्टियों को छोड़ कर, कांग्रेस