कुलदीप चंद अग्निहोत्री

मोहन भागवत जी का यह विश्लेषण या टिप्पणियां भारत के राजनीतिक जीवन के सूत्रधारों के लिए विशेष महत्व रखती हैं, लेकिन इन टिप्पणियों के आलोक में संघ और भाजपा के रिश्तों की तलाश करना गलत दरवाजा खटखटाना ही कहा जाएगा...

मतदाताओं ने मजहबी भेदभाव की ये दीवारें तोड़ कर सैयदा के मुकाबले एक गुज्जर को और सुन्नी के मुकाबले एक शिया को भारी बहुमत से जिता दिया। जम्मू कश्मीर के दोनों राज परिवार ध्वस्त हो गए। शेख अब्दुल्ला परिवार और मुफ्ती परिवार का कोई भी सदस्य लोकसभा में नहीं होगा...

भाजपा को ‘तीस’ का महत्व समझ आ गया होगा, क्योंकि अपने बलबूते स्पष्ट बहुमत के लिए 272 सीटों की जरूरत होती है। कांग्रेस को पता चल गया होगा कि उसके लिए यात्रा अभी लंबी है...

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने 1962 में भारत पर चीन द्वारा किए गए हमले को ‘अलेज्ड अटैक’ करार दिया है। इसका अर्थ है कि सचमुच हमला नहीं हुआ था, बल्कि लोक मानस में ऐसा कहा जा रहा है। यानी मामला यहां तक आ पहुंचा है कि चुनाव में चंद सीटें जीतने के लिए कांग्रेस चीन को 1962 के हमले के मामले में भी क्लीन चिट देने के लिए तैयार हो गई है। चीन को क्लीन चिट देने की इस रणनीति को जब क्रियान्वित कर दिया गया, तो इसके दुष्प्रभाव सामने आए और कांग्रेस ने रणनीति बदल दी...

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ डा. हेडगेवार के समय से लेकर डा. मोहन भागवत तक के काल में देश के इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों से बावस्ता रहा है और प्रयास करता रहा है कि देश की राजनीति देश की समाज रचना और संस्कृति के केन्द्र बिन्दु के इर्द-गिर्द निर्मित होनी चाहिए...

जमानत चाहे पक्की हो, चाहे अंतरिम, उसके लिए मानक भी अलग-अलग ही मान लिए गए हैं। चुनाव लडऩे व उसमें प्रचार करने वालों के लिए अलग मानक और वोट डालने वालों के लिए अलग मानक। कल को कोई भी विचाराधीन कैदी कह सकता है, हुजूर पांच साल बाद चुनाव का प

कांग्रेस की रणनीति को समझने के लिए केवल सैम पित्रोदा को समझना ही काफी नहीं है, कनाडा और अमरीका के व्यवहार को समझना होगा। सभी मिल कर भारत की घेराबंदी कर रहे हैं और उनकी साजिशों को सफल बनाने के लिए भारत में भी बहुत मिल ही जाते हैं। अं

वैसे यह भी हैरानी की बात है कि अमरीका दुनिया में ज्यादातर उन्हीं देशों का समर्थन करता है जो निरंकुश सत्ता के पालक हैं। अमरीका की विचार स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की नीतियां केवल उसकी विदेश नीति के हथियार हैं जिनके अर्थ उसके अपने हितों के अनुसार बदलते रहते हैं...

अभी तक सीपीएम के बारे में यह माना जाता था कि वह विचारधारा पर आधारित पार्टी है। लेकिन वह अपने विदेशी स्वभाव के कारण सौ साल बीत जाने पर भी हिंदुस्तान में अपने पैर नहीं जमा सकी। समाप्ति के इस अंतिम चरण में उसने भी किसी न किसी तरह ‘सांस चलती रहे’ के सूत्र को आधार मान कर कांग्रेस के साथ गठबंधन करके अपनी स्थिति हास्यास्पद बना ली है...

पिछले कुछ सालों से राहुल गांधी के बयानों को भी इसी गहरी नजर से देखना चाहिए। वह अमरीका के लोगों को बताते रहे हैं कि भारत को पाकिस्तान समर्थक इस्लामी आतंकवादियों से इतना डर नहीं है जितना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से...