कुलदीप चंद अग्निहोत्री

राहुल गांधी अन्तत: उच्चतम न्यायालय पहुंचे। लेकिन साधारण व्यक्ति की तरह नहीं। पूरा जुलूस लेकर। ट्रक में बैठकर। ट्रक में से किसी को धक्के देकर उतारा जा रहा है। पैदल चलो। किसी को हाथ पकड़ कर ऊपर खींचा जा रहा है। किसी को कोहनी मारी जा रही है, किसी से कोहनी मरवाई जा रही है। साथ साथ कुछ वकील भी चल रहे हैं। नारे लगा रहे हैं, चिल्ला रहे हैं। लो! एक के मुंह पर राहुल गान्धी ने चमगादड़ का चेहरा लगा दिया है। किसी ने पूछा, राहुल गान्धी कहां जा रहे हैं? पता चला उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर करने जा रहे हैं। चिल्ला रहे हैं। लोग हैरान हैं, ट्रक के ऊपर और उसके आजू बाजू जो लोग चिल्ला कर जा रहे हैं, ये आखिर कौन हैं? उत्तर राहुल गान्धी ही देते हैं, हमारी तो यह शिवजी की बारात है। कोई भी कुत्ता-बिल्ली इसमें शामिल हो सकता है। ऊपर वाले भी और नीचे वाले भी हैरान हो रहे हैं। राजकुमार ने ऐसा किसके बारे में कहा? लेकिन पूछ कोई नहीं रहा। यदि पूछ लिया तो न जाने राजकुमार किस का नाम ले लेंगे...

चाहिए तो यह था कि इस टाइमगैप अरेंजमेंट काल में राजकुमार को पढऩे के लिए पंचतंत्र दिया जाता। लेकिन वह वक्त तो राजकुमार ने मनमोहन सिंह द्वारा बनाए अधिनियमों को सार्वजनिक रूप से फाड़ कर अपनी झूठी शक्ति का प्रदर्शन करने में लगा दिया। अब राजवंश में हडक़म्प मचा हुआ है। राजकुमार की उम्र बढ़ती जा रही है। राजमाता की तबीयत ठीक नहीं रहती। समय हाथ से निकला जा रहा है। लगता है अब दरबारियों ने समझाया है कि घर बैठने या विदेश में जाते रहने से कुछ नहीं बनेगा। सदा सडक़ों पर घूमा करो। आम लोग जैसा बनने की कोशिश करो...

अफवाह फैलाने के बाद उस पर उग आई फसल को कैसे काटना है, इसके लिए पूरा नेटवर्क चाहिए। यह काम नेटवर्क के बिना नहीं हो सकता। अफवाह फैलाने और उसके फैलने से बने स्पेस में तोडफ़ोड़ के लिए छात्रों के रूप में जो लोग आए उनको पुलिस ने विश्वविद्यालय के अन्दर कैसे जाने दिया? ये सब ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर ढूंढने की बजाय उत्तर छिपाने की कोशिश हो रही है। जम्मू कश्मीर के एक लडक़े की उस दिन की एक पोस्ट सामने आ रही है, जिसमें सार रूप में वह कह रहा है सवाल इतना सरल नहीं है। असल मुद्दा ‘सवाल पूछने के अधिकार’ का है। हमें सवाल पूछने नहीं दिए जा रहे। सवाल पूछने को प्रतिबन्धित किया जा रहा है। यह भाषा राहुल गान्धी की भी है। वह भी देश भर में यह कहते हुए घूम रहे हैं कि सवाल नहीं पूछने दिए जा रहे। वही छात्र कहता है कि इसीलिए गुस्से में आकर मैंने तोडफ़ोड़ की है। लेकिन यहां तो मसला और भी उलझा हुआ है। जिस घटना पर सवाल पूछने की बात कही जा रही है, उस काल्पनिक घटना की अफवाह भी एक षड्यंत्र के तहत फैलाई गई...

कुछ दिन पहले वृंदावन जाने का अवसर मिला। वहां भक्ति काल के संत हरि दास जी की स्मृति में पिछले एक सौ पचास साल से राधा अष्टमी के दिन शास्त्रीय संगीत का उत्सव होता है। इस बार आयोजकों ने संत हरिदास जी के साहित्य पर चर्चा करने के लिए मुझे भी बुलाया था। वृंदावन में कई मित्रों ने आग्रह किया जब इतनी दूर आए हो तो राधाकुंड में गोपाल जी के मंदिर के दर्शन अवश्य करें। एक आध ने तो यहां तक कहा कि गोपाल जी से मिले बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। राधाकुंड वृंदावन से बीस किलोमीटर दूर है। श्रीमती रजनी साथ थीं। इसलिए हम गोपाल जी के मंदिर में गए। वहां मणिपुर के ही एक वैज्ञानिक सुखदेव दास मिल गए जो मंदिर में ही रहते हैं। अब गोपाल जी के मंदिर की कथा कहां से शुरू की जाए? इसे मणिपुर रियासत के राजा महाराजा कुलचन्द्र सिंह से शुरू करते हैं। उसने अंग्रेज सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। इस लड़ाई में असम के चीफ कमिश्नर समेत सभी अंग्रेज हमलावरों को पराजित कर पकड़ लिया और उनको

शिक्षा के गिरते स्तर की खोज करते-करते अब दो लोग पकड़ में आए, पहला शिक्षक और दूसरा कुलपति। लेकिन सरकार ने निर्णय कर लिया है कि उसे शिक्षा में सुधार करना है...

वह कहते हैं कि, ‘कोई इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि स्वतंत्रता पा लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उसे बनाए रखने के लिए पक्के साधनों का पा लेना। स्वतंत्रता को मजबूत रखने वाली तो अन्ततोगत्वा एक भरोसेमन्द फौज ही है। ऐसी फौज जिस पर हर समय और किसी भी परिस्थिति में, देश के लिए लडऩे हेतु विश्वास किया जा सके। भारत में तो सेना संयुक्त ही होगी, जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही होंगे। मान लीजिये किसी विदेशी शक्ति का भारत पर आक्रमण होता है तो क्या सेना के मुसलमानों का भारत की रक्षा के लिए भरोसा किया जा सकता है? मान लीजिये हमलावर मुसलमानों का हम-मजहब हो तो क्या वे भारत की रक्षा के लिए उनका मुकाबला करेंगे या फिर उनकी तरफ हो जाएंगे...’

भाई परमानंद और करम सिंह हिस्टोरियन के इस विवाद के लगभग तीस साल बाद डा. गंडा सिंह ने 1935 में बंदा सिंह बहादुर पर एक गंभीर ग्रंथ लिखा। इसके बाद बंदा बहादुर का मूल्यांकन हुआ...

अंग्रेज सरकार ने बहुत ही चतुराई से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लाकर खड़ी कर दी थी। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेज सरकार के इस षड्यंत्र में नहीं फंसे। राष्ट्रवादी ताकतें इससे अलग रहीं...

तब तुरंत कांग्रेस में घुसे हुए पी. चिदंबरम जैसे दिमागी नक्सलवादियों ने समझ लिया कि इस चेतावनी की गंभीरता को कम करने के लिए चिल्लाया जाए कि हां मैं दिमागी नक्सल हूं। महबूबा मुफ्ती जैसे लोग देखादेखी चिल्ला रहे हैं कि शायद यह तगमा भी शोहरत देगा। लेकिन कांग्रेस को गंभीरता से अपने यहां से दिमागी नक्सलियों को निकालना चाहिए। पर क्या ऐसा हो पाएगा? क्योंकि कहा जाता है कि राहुल गांधी को भी पार्टी में दिमागी नक्सलियों ने ही घेरा हुआ है...

पाकिस्तान के लोग भी अब यह समझने लगे हैं कि अरब और तुर्क उनको अपने बराबर का मुसलमान नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें अपना गुलाम ही मानते हैं। सैयद अपनी लडक़ी की शादी किसी बड़े से बड़े देसी मुसलमान से भी नहीं करेंगे। उनके लिए देसी मुसलमान एक प्रकार के अछूत हैं। देसी मुसलमानों की जड़ भारत में है, न कि अरब में। पाकिस्तान में बलोच, पश्तून और सिन्धी अब इसको जान गए हैं। भारत का देसी मुसलमान भी एटीएम के शिकंजे से निकलने के लिए चेतन हो गया है...