कुलदीप चंद अग्निहोत्री

भाई परमानंद और करम सिंह हिस्टोरियन के इस विवाद के लगभग तीस साल बाद डा. गंडा सिंह ने 1935 में बंदा सिंह बहादुर पर एक गंभीर ग्रंथ लिखा। इसके बाद बंदा बहादुर का मूल्यांकन हुआ...

अंग्रेज सरकार ने बहुत ही चतुराई से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लाकर खड़ी कर दी थी। लेकिन बहुत से लोग अंग्रेज सरकार के इस षड्यंत्र में नहीं फंसे। राष्ट्रवादी ताकतें इससे अलग रहीं...

तब तुरंत कांग्रेस में घुसे हुए पी. चिदंबरम जैसे दिमागी नक्सलवादियों ने समझ लिया कि इस चेतावनी की गंभीरता को कम करने के लिए चिल्लाया जाए कि हां मैं दिमागी नक्सल हूं। महबूबा मुफ्ती जैसे लोग देखादेखी चिल्ला रहे हैं कि शायद यह तगमा भी शोहरत देगा। लेकिन कांग्रेस को गंभीरता से अपने यहां से दिमागी नक्सलियों को निकालना चाहिए। पर क्या ऐसा हो पाएगा? क्योंकि कहा जाता है कि राहुल गांधी को भी पार्टी में दिमागी नक्सलियों ने ही घेरा हुआ है...

पाकिस्तान के लोग भी अब यह समझने लगे हैं कि अरब और तुर्क उनको अपने बराबर का मुसलमान नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें अपना गुलाम ही मानते हैं। सैयद अपनी लडक़ी की शादी किसी बड़े से बड़े देसी मुसलमान से भी नहीं करेंगे। उनके लिए देसी मुसलमान एक प्रकार के अछूत हैं। देसी मुसलमानों की जड़ भारत में है, न कि अरब में। पाकिस्तान में बलोच, पश्तून और सिन्धी अब इसको जान गए हैं। भारत का देसी मुसलमान भी एटीएम के शिकंजे से निकलने के लिए चेतन हो गया है...

अब जब सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में समयानुसार संशोधन करने का निर्णय किया हो तो सबसे ज्यादा कष्ट अमरीका को हो रहा है। वहां की सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद राईली मूर ने तो मुखौटा भी उतार दिया है। उसने कहा कि यह संशोधन किया ही इसलिए जा रहा है ताकि भारत के ईसाइयों पर नकेल कसी जा सके और उनको अपना काम करने से रोका जा सके। इतना ही नहीं उसने कहा कि इससे भारत-अमरीका के संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। हैरानी तो इस बात की है कि अमरीका अपने देश में आने देने के किसी आवेदनकर्ता की अर्जी पर जब विचार करता है तो उसके तमाम सोशल अकाउंट को भी चैक करता है...

इतिहास को जन भाषा में सम्प्रेषित करने वाला भी ब्राह्मण है और उसका विरोध करने वाले भी ब्राह्मण हैं। दरअसल समुदाय/जाति को लेकर समस्या नहीं थी, मूल समस्या तो ज्ञान के एकाधिकार की थी। लेकिन डा. भीमराव रामजी अंबेडकर ने तो ज्ञान के एकाधिकार प्रश्न पर एक नए स्थान से एक नई बहस शुरू कर दी थी। ज्ञान पर एकाधिकार किस समुदाय का था/है? अधिकांश शास्त्रों के लेखक महर्षि वेद व्यास जी माने जाते हैं और महाकाव्य के रचयिता आदि कवि महर्षि वाल्मीकि। इसी पृष्ठभूमि का जिक्र करते हुए अंबेडकर ने लिखा कि भारत के शास्त्र एक शूद्र वेद व्यास ने लिखे, महाकाव्य, मसलन रामायण महर्षि वाल्मीकि ने लिखे और आज की सबसे महत्वपूर्ण स्मृति, भारतीय संविधान की रचना अंबेडकर के हाथों ही हुई...

विदेशी शक्तियों ने प्रेरणा के लिए नेपाल और बांग्लादेश का उदाहरण इतिहास में दर्ज करवा दिया है। लगता है राजवंश ने इसी से प्रेरणा लेनी शुरू कर दी है। इसका पहला हिस्सा है सडक़ों पर भीड़। लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र। शायद बाबा साहिब अंबेडकर को इसका अंदाजा था। इसलिए उनका मानना था कि लोकतंत्र में भीड़तंत्र का कोई स्थान नहीं है। भीड़तंत्र केवल लोकतंत्र के लिए ही नहीं, बल्कि देश के लिए भी खतरा है...

यदि गहराई से खोजबीन की जाए तो पता चल जाएगा कि इंग्लैंड के आज भी जो चार पांच सौ धनी घराने हैं, वे सभी एशिया और अफ्रीका की लूट से ही बने हैं। बहुत अरसा पहले जब बाबा साहिब अंबेडकर ने इंग्लैंड में ‘रुपए का मूल्य’ विषय पर अपना पीएचडी थीसिस लिखकर सिद्ध किया था कि किस प्रकार इंग्लैंड सरकार हिंदुस्तान को लूट रही है तो वहां के तथाकथित निष्पक्ष परीक्षकों ने लम्बे समय तक उनकी पीएचडी की डिग्री रोके रखी थी। इंग्लैंड के राजवंश में जो कोहिनूर हीरा है, उसके मुकुट में जड़ा हुआ है, जिसे देखे बिना राजवंश को रात्रि की नींद नहीं आती, वह भारत से ही लूटकर ले जाया गया है...

पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल यह विवाद सुलझाने आए हैं। लेकिन चरणजीत सिंह चन्नी ने उन्हें मिलने से ही इन्कार कर दिया। राजा वडिंग ने तो यहां तक कह दिया कि पार्टी के लिए मैं किसी के भी जूते सिर पर रखने को तैयार हूं। लेकिन उनकी समस्या है कि जिनके जूते वे सिर पर रखने को तैयार हैं, वे अब अपने जूते भी उनको देने के लिए तैयार नहीं हैं। भूपेश बघेल ने भी चन्नी को राहुल गान्धी का संदेश सुना दिया है। उनका कहना है कि किसी भी हालत में वडिंग को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया नहीं जाएगा। जाहिर है कांग्रेस के लिए आने वाले पांच छह महीने संकट के हैं। क्या चन्नी अपने साथियों सहित कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो जाएंगे? क्या वे अपनी अलग क्षेत्रीय पार्टी बनाएंगे? इसका उत्तर कुछ दिनों में ही मिल जाएगा। लेकिन इतना निश्चित है कि कांग्रेस एकजुट होकर चुनाव में नहीं उतरेगी। वह खंड खंड होकर या फिर खंड खंड भाव से चुनाव मैदान में उतरेगी...

भारतीय इतिहास के मध्यकाल के भक्ति आंदोलन को देखना चाहिए। इस आंदोलन के बहुत से नायक रविदास, कबीर, धन्ना, नामदेव, सैन इत्यादि आज के इसी एससी समाज से थे। उन्होंने समाज को झिंझोड़ा। भेदभाव समाप्त कर एक हो जाने की अपील की। लोगों में नई जागृति आई। नए आंदोलन शुरू हुए। दशगुरु परंपरा का आन्दोलन उनमें से एक था। इसी प्रकार ओडीशा में महिमा आन्दोलन चला। सप्त सिन्धु क्षेत्र के महाराजा रणजीत सिंह ने सप्त सिन्धु क्षेत्र के अधिकांश हिस्से को विदेशियों से मुक्त करवा कर सप्त सिन्धु क्षेत्र के एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। ध्यान रखना चाहिए कि रणजीत सिंह सांसी बिरादरी से ताल्लुक रखते थे। लेकिन मध्यकाल के इस भक्ति आन्दोलन के नतीजे आने शुरू हुए तो भारत में यूरोप के लोग आने शुरू हो गए। उन्होंने जल्दी ही आज के एससी समाज की भूमिका को समझ लिया और तुरंत उनमें से अधिकांश को क्रिमिनल ट्राइब्स घोषित कर दिया...