कुलदीप चंद अग्निहोत्री

हिंदू-सिखों की इन सिलैक्टड हत्याओं से ज़ाहिर है घाटी में अल्पसंख्यकों में भय व्याप्त होता और वे घाटी छोड़ने लगते। लेकिन इन सिलैक्टड हत्याओं के बाद सुरक्षा बलों ने भी अपनी रणनीति बदली और एक साथ ही प्रदेश के अनेक स्थानों पर छापामारी कर लगभग पांच सौ से भी ज्यादा आतंकवादियों के ओवरग्राऊंड वर्करों को

कन्हैया कुमार ने कांग्रेस को डूबता हुआ जहाज कहा है। वह उसे बचाने कांग्रेस में आए हैं। इस संबंध में कांग्रेस के इतिहास का पुराना किस्सा याद आ रहा है। कुमारमंगलम जाने-माने कम्युनिस्ट थे। लेकिन जब कम्युनिस्टों को लगा कि अपने बलबूते भारत में उनका कोई भविष्य नहीं है, तब उन्होंने रणनीति के तौर पर

सिद्धू को लेकर कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने उसके पाकिस्तान के हुकुमरानों के साथ संबंधों को लेकर प्रश्न खड़ा कर दिया। कैप्टन फौज में रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे देश की सुरक्षा के प्रश्न पर सोनिया परिवार से अपने संबंधों की बलि भी चढ़ा सकते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के इस प्रश्न पर सोनिया

एटीएम की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि जिस अनुच्छेद 370 की छत्रछाया में यह समाज फल-फूल रहा था, वह छत्रछाया समाप्त हो गई है। अब सचमुच कश्मीरी जनता अपना नेतृत्व निर्माण कर रही है। पिछले दिनों जिला विकास परिषदों के चुनाव इसका सबूत है। हुर्रियत कान्फ्रेंस हाशिए पर है… जब से अफगानिस्तान के अधिकांश

क्षणिक लाभ के लिए आदमी लोभ की वृत्ति से ग्रसित हो जाता है और उसके कारण उसका सांसारिक और गृहस्थ जीवन प्रभावित होता है। मनोविकारों पर नियंत्रण पाना ही सबसे बड़ी साधना है… देशभर में दशगुरु परंपरा के नवम गुरु श्री तेगबहादुर जी की चार सौवीं जयंती मनाई जा रही है। उनकी जन्मसाखी में एक

कैप्टन अमरेंद्र का विरोध भी समझ में आता है। आखिर किसान का जो पैसा आढ़ती के पास आता है, वह उसे अकेले थोड़ा पचा पाता होगा। हो सकता है उसमें अकेले पचा पाने की क्षमता भी हो, लेकिन आसपास की जुंडली भला उसे अकेले पचाने देगी। इसलिए कैप्टन साहिब का विरोध देख कर भी आश्चर्य

दारा शुकोह को तर्क से उत्तर देने की बजाय हथियार से उत्तर क्यों दिया गया? लेकिन दो धाराओं की इस टक्कर में दारा शुकोह का साथ देना एक प्रकार से भारत की सांस्कृतिक लिहाज़ से रक्षा करना ही था। परंतु मुग़लों के राजनीतिक आतंक के उस युग में कोई भी दारा शुकोह की धारा के

उन्हें हिंदुस्तान का लोकतंत्र दिखाई नहीं देता। आंखों के चश्मे के कारण लोकतंत्र की प्रतिमा भी तानाशाही दिखाई देती है। विदेशी चश्मे और हिंदुस्तान पर दोबारा राज करने की इच्छा को किनारे रखकर यदि सोनिया परिवार देखने की कोशिश करेगा तो उसे स्पष्ट दिखाई देगा कि लोकतंत्र हिंदुस्तान का स्वभाव है… कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल

पैर पर चोट के माध्यम से ममता को हिंसा कराने वाली नहीं बल्कि हिंसा की शिकार निरीह महिला बनाने की कोशिश की गई। लेकिन सार्वजनिक स्थान पर हज़ारों लोगों के सामने हमला कैसे हुआ? सुरक्षा कर्मचारी कहां थे? हज़ारों लोगों के सामने हमला करने के बाद कोई भाग कैसे सकता है? क्योंकि ममता कम से

एक मुसलमान का, चाहे उसका पुतला ही क्यों न हो, जलाया गया था। क़ायदे से उसे दफनाना चाहिए था। लेकिन ग़ुलाम नबी इससे भी डरे नहीं। आखिर थे तो भट्ट ही। कश्मीर में आज भी अनेक भट्ट दफनाते नहीं जलाते ही हैं, चाहे पुतला ही क्यों न हो। एक पत्रकार ने आखिर पूछ ही लिया