गुलाम नबी आजाद की दास्तां

एक मुसलमान का, चाहे उसका पुतला ही क्यों न हो, जलाया गया था। क़ायदे से उसे दफनाना चाहिए था। लेकिन ग़ुलाम नबी इससे भी डरे नहीं। आखिर थे तो भट्ट ही। कश्मीर में आज भी अनेक भट्ट दफनाते नहीं जलाते ही हैं, चाहे पुतला ही क्यों न हो। एक पत्रकार ने आखिर पूछ ही लिया ग़ुलाम नबी से, क्या आप भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे हैं क्योंकि सभी संकेत तो ऐसे ही मिल रहे हैं। उनका उत्तर था कि जब घाटी में काले रंग की बर्फ पड़ने लगेगी, तभी मैं भाजपा में जाने की सोच सकता हूं। लेकिन बर्फ काली है या सफेद, इसका निर्णय तो आज़ाद स्वयं ही करेंगे। ग़ुलाम नबी ने भाजपा में जाने का खंडन नहीं किया, बल्कि बर्फ के रंग को शर्त बना दिया है। यदि रंग भी आजाद को ही तय करना है तो वह उन्होंने केसरिया पटका पहनकर बता दिया है…

जम्मू-कश्मीर के गुलाम नबी आज़ाद का मामला गहराता ही जा रहा है। आज़ाद एक साथ ही जम्मू के भी हैं और कश्मीर घाटी के भी। जम्मू के लिहाज़ से वे डोडा जि़ला के रहने वाले हैं। उनकी पैदायश भी वहीं की है। लेकिन डोडा जि़ला में हज़ारों की संख्या में वे लोग भी रहते हैं जिनके पूर्वज कभी कश्मीर घाटी से यहां आकर बस गए थे। उनके पिता रहमतुल्लाह भट्ट उसी कश्मीर समाज से ताल्लुक़ रखते थे। बहुत से कश्मीरी हिंदुओं ने मजहब परिवर्तन के बाद अपने मूल कश्मीर समाज की पहचान मसलन भट्ट, कौल, धर, लोन वगैरह अपने नाम के साथ लगाए रखी, लेकिन बहुत लोगों ने नए मोहल्ले में जाने के बाद छोड़ भी दी। शायद यही कारण होगा कि ग़ुलाम नबी अपने नाम के साथ भट्ट नहीं लिखते। लेकिन उससे कोई बहुत ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। बल्कि लाभ ही होता है कि वे एक साथ ही जम्मू के भी हैं और कश्मीर के भी। यही कारण है कि जब वे एक समझौते के कारण राज्य के मुख्यमंत्री बने थे तो जम्मू वाले खुश थे कि पहली बार कोई जम्मू का शख्स राज्य का मुख्यमंत्री बना है और कश्मीर घाटी में ख़ुशी थी कि यह पद घूम फिर कर फिर हमारे पास ही है।

हजाम का यह संकट ही होगा कि ग़ुलाम नबी आज़ाद को अपनी चुनावी राजनीति महाराष्ट्र से शुरू करनी पड़ी। जम्मू-कश्मीर की चुनावी राजनीति में देर बाद ही उतर सके। चालीस साल के संसदीय जीवन में उनका अधिकांश समय राज्यसभा में ही बीता। कांग्रेस पार्टी में राज्यसभा में जाने का रास्ता पार्टी हाईकमान के महल से होकर ही जाता है। इतना तो कांग्रेस की राजनीति को थोड़ा-बहुत समझने वाले भी जानते हैं। इस चालीस साल बाद हाईकमान ने ग़ुलाम नबी को लेकर हाथ खड़े कर दिए। जम्मू-कश्मीर में तो वैसे भी अब कांग्रेस के पास कुछ बचा नहीं था, जिस पर सवार करवा कर वे ग़ुलाम नबी को फिर से राज्यसभा में बिठा देती। लेकिन ग़ुलाम नबी को आशा थी कि इस बार उन्हें केरल से संसद में पहुंचाया जाएगा। लेकिन बेचारे केरल वाले कितना भार उठा सकते थे? अपने प्रदेश से भागे राहुल गांधी को ही बड़ी मुश्किल से संभाल रखा है।

अब ग़ुलाम नबी की भी ग़ुलामी करना क्या केरल के ही भाग्य में बदा था? ग़ुलाम नबी को लगता होगा जो पारी महाराष्ट्र से शुरू हुई थी उसका अंत केरल से क्यों नहीं हो सकता? जब केरल वालों ने साफ बता दिया कि नहीं हो सकता तो ग़ुलाम नबी अपने कुछ दोस्तों को जम्मू ले आए। बाक़ायदा मंच सजाया। उस पर ग़ुलाम नबी समेत सभी दोस्त केसरी पटके बांध कर विराजमान हुए। तब उनके एक दोस्त कपिल सिब्बल ने दुख प्रकट किया कि ग़ुलाम नबी जैसे ज्ञानी और अनुभवी व्यक्ति को कांग्रेस हाईकमान ने संसद से आज़ाद कर दिया है, यह दुख की बात है। वे चार दशकों तक संसद के सदस्य रहे हैं। कभी लोकसभा में, कभी राज्यसभा में। दो-तीन साल जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री भी रहे। गांधी परिवार से उनके गहरे रिश्ते रहे हैं।

फिर भी उनको आज़ाद कर दिया गया। इससे कांग्रेस कमजोर हो गई है। लेकिन आज़ाद ने आज़ाद होकर एक और बात कह दी। उनका कहना था कि नरेंद्र मोदी काम बहुत अच्छा कर रहे हैं। मोदी जी भी तब भावुक हो गए थे जब चार दशकों बाद ग़ुलाम नबी राज्यसभा से आज़ाद हो रहे थे। अब केसरिया पटका पहन कर जब ग़ुलाम नबी जम्मू की सड़कों पर घूम रहे थे तो लोगों का माथा तो ठनकना ही था। वैसे भी चार दशक तक राजनीति करते-करते उनका क़द तो राज्य में बड़ा हो ही गया था। उस पर केसरिया पटका। फिर मोदी जी काम अच्छा कर रहे हैं।

यह सब देख कर कम से कम जम्मू के कांग्रेसी समझ गए कि किसी नए तालाब की तलाश हो रही है। जि़ला विकास परिषद के चुनावों ने वैसे ही जम्मू में कांग्रेस को किनारे लगा दिया था, अब ग़ुलाम नबी भी आज़ाद होकर केसरिया पटका पहन लेंगे तो  क्या होगा? उन्होंने आनन-फानन ग़ुलाम नबी का पुतला बनाया और उसको घसीटते हुए बाज़ार में ले आए। उसे आग के हवाले कर दिया। यह तो कुफर हो गया। एक मुसलमान का, चाहे उसका पुतला ही क्यों न हो, जलाया गया था। क़ायदे से उसे दफनाना चाहिए था। लेकिन ग़ुलाम नबी इससे भी डरे नहीं। आखिर थे तो भट्ट ही। कश्मीर में आज भी अनेक भट्ट दफनाते नहीं जलाते ही हैं, चाहे पुतला ही क्यों न हो। एक पत्रकार ने आखिर पूछ ही लिया ग़ुलाम नबी से, क्या आप भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे हैं क्योंकि सभी संकेत तो ऐसे ही मिल रहे हैं। उनका उत्तर था कि जब घाटी में काले रंग की बर्फ पड़ने लगेगी, तभी मैं भाजपा में जाने की सोच सकता हूं। लेकिन बर्फ काली है या सफेद, इसका निर्णय तो आज़ाद स्वयं ही करेंगे।

जब अनुच्छेद 370 जिंदा था तब बहुत से लोगों को कश्मीर की बर्फ काली नज़र आती थी और बाक़ी को सफेद। जब अनुच्छेद 370 हट गया तो बर्फ जिनको काली नज़र आती थी, उनको सफेद नज़र आने लगी और जिनको सफेद नज़र आती थी उनको काली नज़र आने लगी। यानी कि ग़ुलाम नबी ने भाजपा में जाने का खंडन नहीं किया, बल्कि बर्फ के रंग को शर्त बना दिया है। श्रीनगर में तभी चर्चा होने लगी है कि बर्फ का रंग कश्मीर के लोग किसी से पूछ कर तय नहीं करते, यह निर्णय वे स्वयं ही करते हैं। लाहुलबिलाकूबत।

यदि रंग भी ग़ुलाम नबी को ही तय करना है तो वह तो उन्होंने केसरिया पटका पहन कर बता ही दिया है। जि़ला विकास परिषदों के चुनाव में भाजपा ने तीन सीटें जीत कर अपनी हाजि़री तो लगवा ही दी है, कहीं ग़ुलाम नबी भी भगवा पटका पहन कर घाटी में घुस आया तो कांग्रेस की तो छोड़ो, पीडीपी और एनसी भी सन्नाटे में हैं। इन दिनों नरेंद्र मोदी और गुलाम नबी आजाद की एक-दूसरे के प्रति संवेदनाओं को लेकर भी खूब चर्चा हो रही है। राजनीतिक क्षेत्रों में इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। हर पार्टी में इस विषय को लेकर चिंतन हो रहा है। जनता के स्तर पर भी गली-नुकड़ों में इन संवेदनाओं के भिन्न-भिन्न अर्थ निकाले जा रहे हैं। इन संवेदनाओं के निहितार्थ क्या हैं, यह स्पष्ट रूप से आने वाले दिनों में ही तय हो पाएगा। फिलहाल हर कोई चिंतन की अवस्था में है।

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