चमोली की त्रासदी से सबक ले हिमाचल

सुखदेव सिंह By: Mar 1st, 2021 12:07 am

बारिशें बेमौसमी होने की वजह से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी सभी के लिए परेशानी का सबब बन रही है। जंगलों की ज़मीन अवैध निर्माण की वजह से दिनोंदिन घटती जा रही है। राजनीतिक पहुंच रखने वालों ने सरकारी ज़मीनों पर आवासीय मकान सहित रेस्टोरेंट और होटल बनाकर सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं। बरसात के दिनों में इंद्र देवता हमेशा अपना रौद्र रूप दिखाते हैं, मगर स्वार्थी लोगों के दिलों से भगवान का भय तक खत्म हो चुका है। खड्डों और नालों में पानी बहाव वाली जगहों पर लोगों द्वारा अवैध निर्माण किए जाने से बरसात प्रत्येक वर्ष जानलेवा बनती जा रही है। सरकारें अवैध निर्माण हटाने की बातें करती हैं, मगर रसूखदार लोगों के खिलाफ  प्रशासन कार्रवाई नहीं करता…

उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर फटने से मची तबाही से पूरे विश्व को सबक लेने की ज़रूरत है। यह त्रासदी हिमाचल प्रदेश के लोगों पर भी भारी पड़ी है। इससे पूर्व केरल व तमिलनाडु में भी प्राकृतिक आपदा के कहर से खूब जान-माल की हानि हो चुकी है, मगर इसके बावजूद हम लोगों ने प्रकृति से छेड़छाड़ किए जाने की अपनी आदत नहीं छोड़ी है। नतीजा चमोली त्रासदी के रूप में देखा जा सकता है। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए आम जनमानस को अब तैयार रहना होगा। चमोली हादसे के मलबे में दबे लोगों की तलाश अभी चल ही रही है कि इस बीच जिला मंडी के सराज में ठीक ऐसी ही घटना की पुनरावृत्ति ने दिल को दहला दिया है। पहाड़ किस कदर घातक बन रहे हैं, इस हादसे से जरूर सीख लेनी होगी। नीचे सड़क पर एक जीप में सवार होकर लोग गुजर रहे थे कि इस बीच ऊपर की पहाड़ी से अचानक मलबा उनकी गाड़ी पर गिरने से वे नीचे गहरी खाई में जाकर गिरे। इस दर्दनाक हादसे में तीन लोगों की मौके पर मौत हो चुकी है और अन्यों को स्थानीय प्रशासन और लोगों की मदद से अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। बढ़ती जनसंख्या के चलते अब विकास की गति भी उतनी ही जरूरी है जितनी प्रकृति की सुरक्षा करना। यह सभी की जिम्मेदारी बनती है। हिमाचल प्रदेश में सड़क विस्तारीकरण नियमों को ताक पर रखकर किया जा रहा है जिसके चलते ऐसी प्राकृतिक घटनाओं में वृद्धि हो रही है।

हरे पेड़ों को काटकर जंगल के बीचोंबीच सड़क विस्तारीकरण का काम चल रहा है। सड़क निर्माण कार्यों में जुटे कर्मचारी स्वयं अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं करते तो आम जनमानस की आखिर कौन सोचे, आज बड़ा सवाल है। जंगलों को जेसीबी मशीनों से काटकर पहाड़ों के अस्तित्व को हिलाने की कोशिश की जा रही है। नतीजतन मामूली बारिश पड़ने पर जंगल का मलबा सड़कों पर गिरकर सदैव यातायात को अवरुद्ध करके राहगीरों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। सड़क निर्माण सुरक्षायुक्त बने और जंगलों का अस्तित्व भी बरकाकर रहे, आज यह सोचना होगा। जंगलों में इस कदर कुल्हाड़ी चली कि अब ज्यादातर खरपतवार के पौधे ही नजर आने लगे हैं। प्रत्येक वर्ष बेशक पौधारोपण के नाम पर सरकारें करोड़ों रुपए खर्च करके वाहवाही लूटती रहें, मगर सच्चाई किसी से छुपी नहीं है। जंगलों में मौजूद पेड़ बड़े पहाड़ों को अपनी जड़ों से जकड़कर रखते थे जिसकी वजह से पहले कोई भूस्खलन की घटनाएं घटित नहीं होती थी। एक तो जंगलों में पेड़ रहे नहीं जिसकी वजह से पहाड़ बिल्कुल हिलकर रह चुके हैं। वहीं सड़क निर्माण कार्यों में जंगलों को जेसीबी मशीनों से काटना भी सुरक्षा लिहाज से ठीक नहीं है। पहाड़ी क्षेत्रों में बनने वाली सड़कों के किनारे पक्के डंगे बनाए जाने से ही भूस्खलन की रोकथाम कुछ हद तक की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब हिमाचल प्रदेश में अवरुद्ध पड़ी परियोजनाओं के कार्यों को हरी झंडी दिखा दी है। अगर समय रहते अब भी सुरक्षा को पहल नहीं दी गई तो इसका खामियाजा भी जनता को भुगतने के लिए कमर कसनी होगी। जंगलों में पानी के चैकडैम बनाकर भी विकास कार्य गिनाए जाने के दावे किए जा रहे हैं। क्या इस तरह के निर्माण कार्य किए जाने से जंगलों का अस्तित्व चिरकाल तक रह सकता है, कोई सोचने को तैयार नहीं है। सच्चाई यह भी कि अब विश्वस्तर पर ही मौसम में जमीन-आसमान का बदलाव आ रहा है।

बारिशें बेमौसमी होने की वजह से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी सभी के लिए परेशानी का सबब बन रही है। जंगलों की ज़मीन अवैध निर्माण की वजह से दिनोंदिन घटती जा रही है। राजनीतिक पहुंच रखने वालों ने सरकारी ज़मीनों पर आवासीय मकान सहित रेस्टोरेंट और होटल बनाकर सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं। बरसात के दिनों में इंद्र देवता हमेशा अपना रौद्र रूप दिखाते हैं, मगर स्वार्थी लोगों के दिलों से भगवान का भय तक खत्म हो चुका है। खड्डों और नालों में पानी बहाव वाली जगहों पर लोगों द्वारा अवैध निर्माण किए जाने से बरसात प्रत्येक वर्ष जानलेवा बनती जा रही है। सरकारें अवैध निर्माण हटाए जाने की बातें तो जरूर करती हैं, मगर  रसूखदार लोगों के खिलाफ  प्रशासन कार्रवाई करने में सफल नहीं होता है। खड्डों, नालों में अवैध खनन की वजह से जमीनों का खूब दोहन हो रहा है और जल स्रोत सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि जमीन का जल स्तर नीचे चला गया है। जेसीबी मशीनों से खड्डों व नालों का अवैध खनन किए जाने से कई फुट गहरी और लंबी खाइयां बन चुकी हैं। नतीजतन किसानों की कीमती जमीनें पानी के गलत बहाव की वजह से पानी में बहती जा रही हैं। सरकारों ने जितने जल स्रोत जनता के सुपुर्द किए, ठीक पानी की समस्या उतनी ही ज्यादा बढ़ी है। हालात इस कदर नाजुक बनते जा रहे हैं कि जल स्रोतों में पानी सूख जाने की वजह से लोगों को हर बार खासकर पानी की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सड़कों के विस्तारीकरण के साथ प्रकृति की सुरक्षा करना भी सभी की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

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