सुखदेव सिंह

लोग सेनेटाइजर, मास्क, ग्लब्ज और पीपीई किटें खरीदने में अपना घरेलू बजट खर्च करते जा रहे हैं। सेनेटाइजर का इस्तेमाल कार्यालयों में किया जाता था, आज अधिकतर लोगों के घरों में यह देखने को मिल रहा है। इस महामारी से बचाव के लिए आम जनमानस को अपने भोजन में अदरक, लहसुन, काली मिर्च, दाल चीनी,

इसी वजह से कई बार लोगों के घरों में बिजली के उपकरण लोड बढ़ने और घटने के कारण जलकर रह जाते हैं। विभाग ने क्या कभी इस तरह जलने वाले उपकरणों की जिम्मेदारी लेना गवारा समझा है? बिजली बाधित रहने से जहां लोग समस्याएं झेलते हैं, वहीं इंडस्ट्रीज मालिकों का कामकाज भी ठप होकर रह

आधार कार्ड की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने अब जायज हैं। सरकारों ने आधार कार्ड प्रत्येक कार्य के लिए पहचान पत्र के तौर पर लगाए जाने को प्राथमिकता दी है। इस तरह आधार कार्ड का दुरुपयोग होने से इस मामले की कड़ी जांच होनी चाहिए। जनता के जान-माल की रक्षा करने वाली पुलिस ने शायद

पर्यटकों को लुभाने के लिए पहाड़, नदियां, जंगल, डैम, चिडि़याघर, मंदिर, नामी शहर, खजियार झील, बीड़-बिलिंग जैसे पैराग्लाइडिंग स्थल भी यहां हैं। इसके बावजूद हम लोग न तो युवाओं को रोजगार से जोड़ पाए और न ही सरकारों का खाली खजाना भरने में कामयाब बन पाए हैं। हैरानी की बात यह है कि विदेशी लोग

आजकल तो फ्रोजन मुर्गा, बतख, मछली, गाय मांस, सी फूड, सब्जियां तक भी डिब्बाबंद होकर बाजारों में ज्यादा बिक रही हैं। खाद्य वस्तुओं की पैकिंग कब हुई और कब इनकी अवधि समाप्त हो रही है, कोई जांच करने वाला नजर नहीं आता है। हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होने की वजह से पर्यटन का

दुर्भाग्य की बात यह है कि जनप्रतिनिधियों के वेतनमान लाखों रुपए एवं अन्य सुविधाएं होने के बावजूद उन्हें बुढ़ापे में हजारों रुपयों की पेंशन का लाभ भी प्राप्त है। उधर कर्मचारियों को न तो सही वेतन है, साथ ही पेंशन के सही लाभ भी नहीं मिल पा रहे हैं… लोकतांत्रिक प्रणाली में समानता के अधिकार

गरीब महिलाओं को गैस सिलेंडर मुफ्त उपलब्ध करवाकर एक सराहनीय पहल को अंजाम दिया गया था। मगर गैस सिलेंडर की लगातार बढ़ती कीमतों की वजह से ऐसी योजनाओं का सार्थक बनना अब आसान नहीं रहा है। गैस सिलेंडर पर केंद्र सरकार उपभोक्ताओं के खाते में सबसिडी जमा करती थी। पिछले एक वर्ष से उपभोक्ताओं के

बारिशें बेमौसमी होने की वजह से ऐसी प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ोतरी सभी के लिए परेशानी का सबब बन रही है। जंगलों की ज़मीन अवैध निर्माण की वजह से दिनोंदिन घटती जा रही है। राजनीतिक पहुंच रखने वालों ने सरकारी ज़मीनों पर आवासीय मकान सहित रेस्टोरेंट और होटल बनाकर सरकारी नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं।

गणतंत्र दिवस की बेला पर उपद्रवी किसानों ने जो किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। किसानों ने सिर्फ  राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं किया, बल्कि निशान साहब चढ़ाने की दशकों पुरानी परंपरा बदलकर भी आपसी भाईचारे में दरार डाली है। उधर देश भर में किसानों की ओर से किए गए चक्का जाम में

सुखदेव सिंह लेखक नूरपुर से हैं यह शस्त्र ही जिनका दशकों से गहना रहे हों, उन्हें आतंकवादी कहना भी उचित नहीं है। किसानों का हुक्का-पानी बंद किए जाने से इस विकराल बनती जा रही समस्या का हल नहीं निकलने वाला है। आज किसानों का मददगार बनकर अपनी राजनीति चमकाने वाले नेताओं की कमी नहीं, यह