मंदी से कैसे जीते आर्थिकी

हमें देश हित में अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर पॉजिटिव रहना होगा। यकीनन हमारी आर्थिकी मंदी से जीतेगी। सुझाव है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी सेक्टर की नीतिगत समस्याओं को दूर करना होगा और उसे प्राइवेट प्लेयरों के लिए दिलचस्प बनाना होगा। सरकार को सार्वजनिक सुविधाओं के क्षेत्र में निवेश करना चाहिए…

कोरोना वायरस महामारी की अमावस से चांदनी की तरफ  बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था की अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में वृद्धि दर 0.4 प्रतिशत रही है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों में कहा गया है कि लगातार दो तिमाहियों में नकारात्मक रहने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था तीसरी तिमाही में सकारात्मक हो गई है। 2019-20 की समान तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 3.3 प्रतिशत थी। चालू वित्त वर्ष की दिसंबर में समाप्त तिमाही के दौरान भारत की जीडीपी सकारात्मक दौर में पहुंच गई है। इससे पहले की दो तिमाहियों के दौरान कोरोना वायरस महामारी के फैलने के कारण इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। एनएसओ के राष्ट्रीय लेखा के दूसरे अग्रिम अनुमान में 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद में 8 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान जताया गया है। जनवरी में एनएसओ ने चालू वित्त वर्ष 2020-21 में अर्थव्यवस्था में 7.7 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान जताया था। एक साल पहले 2019-20 में जीडीपी में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। कोरोना वायरस महामारी और उसकी रोकथाम के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था में 24.4 प्रतिशत की गिरावट आई थी। वहीं दूसरी तिमाही जुलाई-सितंबर में जीडीपी में 7.3 प्रतिशत की गिरावट आई थी। देश में कोविड-19 की स्थिति में तेजी से सुधार आने और लोगों के खर्च में तेजी से वृद्धि होना दो ऐसे कारक रहे हैं जो दिसंबर 2020 तिमाही के लिए बेहतर रहे। भारत की जीडीपी में पहली तिमाही के दौरान 24 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 7.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। अक्तूबर-दिसंबर 2020 तिमाही में चीन की अर्थव्यवस्था में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, इससे पहले वहां जुलाई-सितंबर 2020 में जीडीपी वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत रही थी। जीडीपी के दिसंबर तिमाही के आंकड़े बहुत ही काबिलेगौर हैं क्योंकि 2020-21 में जीडीपी में करीब 8 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है। जीडीपी के आंकड़ों का इंतजार इसलिए भी है क्योंकि इस वित्त वर्ष की जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 23.9 फीसदी गिरी थी।

 इसकी सबसे बड़ी वजह थी देश भर में लगाया गया सख्त लॉकडाउन, जिसके चलते इकोनॉमी पूरी तरह ठप पड़ गई थी। इसके बाद दूसरी यानी सितंबर तिमाही में अर्थव्यवस्था में 7.5 फीसदी की गिरावट आई। वैसे कई एजेंसियां पहले से ही इस बात की आशंका जता रही थीं कि तीसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था पॉजिटिव रह सकती है। रिजर्व बैंक की तरफ  से दिसंबर में जारी ‘स्टेट ऑफ दि इकोनॉमी’ बुलेटिन में भी कहा गया था इकोनॉमी के गहरी खाई से बाहर निकलने के संकेत मिल रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक 1722 कंपनियों के तिमाही नतीजों के आधार पर कहा गया था कि इकोनॉमी में सुधार हो रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना की वजह से इतिहास में पहली बार तकनीकी रूप से मंदी के दौर में पहुंची। वैसे भी जब कोई अर्थव्यवस्था लगातार दो तिमाही में गिरावट में रहती है तो माना जाता है कि अर्थव्यवस्था तकनीकी रूप से मंदी के दौर में पहुंच चुकी है। क्या भारतीय अर्थव्यवस्था अब बूम के रास्ते पर चल पड़ी है? महामारी की भयंकर मार से नकारात्मक विकास दर के पाताल से गुज़रकर देश की अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही में सकारात्मक विकास दर तक पहुंची और फिलहाल आखिरी तिमाही में इसका सकारात्मक विकास जारी है। दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अप्रैल-जून 2020 की तिमाही में 23.9 प्रतिशत की दर की गिरावट दर्ज की गई थी। अब अनुमान है कि इस साल जनवरी-मार्च की तिमाही में 0.7 प्रतिशत के हिसाब से सकारात्मक विकास दर्ज हो सकती है, जबकि पिछली तिमाही में विकास दर 0.1 प्रतिशत थी। अप्रैल 2020 के महीने से अर्थव्यवस्था पर लॉकडाउन का बुरा असर काफी गहराई से महसूस होने लगा। अगर 2020-21 के पूरे वित्तीय साल की विकास दर को देखें तो क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज़ के अनुसार ये 11.5 फीसदी होगी। एजेंसी ने 2021-22 वित्तीय वर्ष में भारत की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक 10.6 फीसदी का अनुमान लगाया है।

 वास्तविकता यह है कि नवंबर 2020 से क्रेडिट डिमांड में तेज़ी आई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक 15 जनवरी तक बैंकों ने क्रेडिट डिमांड में 6.1 की बढ़ोतरी बताई है। सरकारी संस्थाओं ने दावा किया है कि रिकवरी ‘वी’ शेप में हो रही है। इसका मतलब यह हुआ कि लॉकडाउन के दौरान सभी क्षेत्रों में विकास की दर नीचे गई और रिकवरी के दौरान उछाल सभी क्षेत्रों में हो रहा है। लेकिन कुछ विशेषज्ञ ये तर्क देते हैं कि रिकवरी ‘के’ शेप में हो रही है, जिसका मतलब ये हुआ कि कुछ क्षेत्रों में विकास हो रहा है, लेकिन कुछ दूसरे क्षेत्रों में या तो विकास की रफ़्तार बहुत सुस्त है या विकास नहीं हो रहा है। ये विकास की एक असमान रेखा की तरह है। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के लिए समान तरीके से विकास नहीं हो रहा है। जीडीपी गणना में असंगठित क्षेत्र पूरी तरह से शामिल नहीं किया जाता है। कुल मिलाकर जबकि संगठित क्षेत्र में अपेक्षाकृत तेज़ी से गिरावट आई है, असंगठित क्षेत्र महामारी से बहुत अधिक प्रभावित हुआ है। रिकवरी में भी यही रुझान है। रिकवरी के मामले में चीन ने तो पूरी दुनिया को चौंका दिया है। जब पूरी दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं नकारात्मक ग्रोथ या कॉन्ट्रैक्शन (अर्थव्यवस्थाओं का संकुचन या सिकुड़ना) का सामना कर रही हैं या फिर मामूली ग्रोथ के लिए भी संघर्ष कर रही हैं, उस वक्त पर चीन ने ग्रोथ के बढि़या आंकड़ों से दुनिया को हैरत में डाल दिया है। चीन की इकोनॉमी जिस रफ्तार से बढ़ रही है वह कोरोना से जूझ रहे दूसरे देशों के लिए कल्पना से भी ज्यादा है।

 कारण साफ है कोरोना पर जल्द कंट्रोल पाने की वजह से चीन अपनी आर्थिक ग्रोथ को रिकवर करने में सफल रहा है। ऐसे में अगर हम कोविड-19 पर कंट्रोल कर सकते हैं तो हम आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ा सकते हैं। इसी वजह से केवल एक तिमाही में ही चीन की ग्रोथ नेगेटिव हुई और उसके बाद इसमें धीरे-धीरे तेजी आने लगी। हमें अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए कोरोना कंट्रोल पर पूरा फोकस देना होगा। आम आदमी भी इस पर सहयोग करे तो आर्थिक हालात को माकूल बनने में मदद हो पाएगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी उम्मीद जताई है कि 2022-23 में धीमा होकर 6.8 प्रतिशत होने से पहले अगले साल देश की जीडीपी में 11.5 प्रतिशत की विकास दर से बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन आलोचक कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आंकड़े संग्रह करने वाली कोई स्वतंत्र एजेंसी नहीं है। वह सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करती है। वे किसी तरह से घबराहट की स्थिति को भी नहीं पैदा करना चाहते हैं, लिहाज़ा वे गुलाबी तस्वीर ही पेश करते हैं। लेकिन उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस विरोधाभास को गलत साबित करने के लिए हमें देश हित में अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर पॉजिटिव रहना होगा। यकीनन हमारी आर्थिकी मंदी से जीतेगी। सुझाव है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नॉलॉजी सेक्टर की नीतिगत समस्याओं को दूर करना होगा और उसे प्राइवेट प्लेयरों के लिए दिलचस्प बनाना होगा। सरकार को सार्वजनिक सुविधाओं शिक्षा, हेल्थ, बेहतर पर्यावरण, सड़क, बांध के क्षेत्र में निवेश करना चाहिए।

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