बैंकों का निजीकरण सही पहल

सरकारी और निजी दोनों प्रकार के बैंकों की विशेष लोगों को गलत ऋण देने की प्रवृत्ति होती है जिस पर अंकुश रिजर्व बैंक को लगाना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए वित्त मंत्री को बधाई है कि उन्होंने दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का फैसला किया है। जानकार बताते हैं कि दो छोटे सरकारी बैंकों को प्रारंभ में पंजीकृत किया जा सकता है। वास्तव में वित्त मंत्री को इस दिशा में और तेजी और सख्ती से बढ़ना चाहिए और बड़े बैंकों का भी तत्काल निजीकरण करना चाहिए, जिससे सरकार को रकम मिले, जिसका निवेश नए और उभरते क्षेत्रों में किया जा सके और हर वर्ष सरकारी बैंकों के दुराचार को ढकने के लिए उनमें निवेश करने की जरूरत न रहे…

आगामी वर्ष के बजट में वित्तमंत्री ने एक महत्त्वपूर्ण घोषणा यह की है कि दो सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण किया जाएगा। अभी तक सरकार की नीति सरकारी कंपनियों के आंशिक शेयरों को बेचने की रही है। इस प्रकार के ‘विनिवेश’ से कंपनियों पर नियंत्रण एवं उनके प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों की ही रहती है। इसके विपरीत ‘निजीकरण’ में सरकारी इकाई के कंट्रोलिंग शेयर किसी निजी खरीददार के पक्ष में बेच दिए जाते हैं, निजीकृत कंपनी के प्रबंधन पर खरीददार का संपूर्ण अधिकार हो जाता है और उसमें सरकारी दखल समाप्त हो जाता है। यह कदम इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि बीते दशक में लगभग हर वर्ष सरकार को अपने बजट में सरकारी बैंकों को जिंदा रखने के लिए, उनके भ्रष्टाचार तथा अकुशलता से जनित घाटे को छुपाने के लिए एवं उस घाटे की भरपाई करने के लिए सरकारी बैंकों की पूंजी में लगातार रकम का निवेश करना पड़ रहा है। इन बैंकों का निजीकरण कर देने से सरकार को रकम का निवेश करने के स्थान पर रकम प्राप्त होगी। जैसे गैराज में पड़ी पुरानी कार को गतिमान रखने के लिए प्रति वर्ष उसमें रुपया लगाना पड़ता है, किंतु यदि उसे बेच दिया जाए तो मालिक को रकम मिलती है। सरकार के इस कदम की पहली आलोचना यह की जा रही है कि अर्जित रकम का उपयोग सरकार के वर्तमान चालू खर्चों को पोषित करने के लिए किया जाएगा।

यह आलोचना केवल आंशिक रूप से ही ठीक बैठती है। पिछले वर्ष सरकार ने विनिवेश से 20 हजार करोड़ रुपए अर्जित किए थे, जो कि इस वर्ष 175 हजार करोड़ अर्जित करने का लक्ष्य है। यानी इस मद पर 155 हजार करोड़ अतिरिक्त रकम अर्जित करने का उद्देश्य है। इसके सामने पिछले वर्ष सरकार ने पूंजी खर्च 439 हजार करोड़ रुपए किए थे, जो कि आगामी वर्ष में 554 हजार करोड़ खर्च करने का लक्ष्य है। यानी इस मद पर 115 हजार करोड़ अतिरिक्त रकम खर्च करने का उद्देश्य है। अतः कहा जा सकता है कि निजीकरण से अर्जित 155 हजार करोड़ की  रकम का 115 हजार करोड़ का मुख्य हिस्सा सरकार द्वारा पूंजी खर्चों में ही निवेश किया जाएगा। इनसे चालू खर्च कम ही पोषित किए जाएंगे। निश्चित रूप से और अच्छा होता कि यदि पूंजी खर्चों में और अधिक वृद्धि की गई होती। लेकिन जो किया गया है उसका सम्मान करना चाहिए। निजीकरण की दूसरी आलोचना यह कहकर की जा रही है कि सरकार कल्याणकारी राज्य के अपने दायित्व से पीछे हट रही है। वर्ष 1971 में जब निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, उस समय विचार था कि निजी बैंकों द्वारा गांवों एवं पिछड़े इलाकों में सेवाएं अर्जित नहीं कराई जा रही हैं, इसलिए इसका राष्ट्रीयकरण करके पिछड़े क्षेत्रों में शाखाएं खोलने के लिए कहा जाए। सरकार का यह उद्देश्य पूरा भी हुआ है। आज सरकारी बैंकों द्वारा दूरदराज के इलाकों में सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। लेकिन दूसरी समस्या उत्पन्न हो गई है कि सरकारी बैंकों में व्याप्त अकुशलता एवं भ्रष्टाचार के कारण इन्हें लगातार घाटा हो रहा है। इन्हें जीवित रखने के लिए सरकार द्वारा हर वर्ष इनमें पूंजी निवेश किया जा रहा है। इस पूंजी निवेश के लिए किसी न किसी रूप से जनता पर ही टैक्स लगाकर रकम अर्जित की जा रही है। इसलिए राष्ट्रीय बैंकों द्वारा एक तरफ पिछड़े इलाकों में सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं तो दूसरी तरफ  उन्हीं पिछड़े इलाकों से टैक्स अधिक वसूलकर इन्हें जीवित रखा जा रहा है। मेरा मानना है कि कुल मिलाकर पिछड़े इलाकों को इनसे कुछ लाभ हुआ हो तो भी अर्थव्यवस्था पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अर्थव्यवस्था के कमजोर पड़ने से पिछड़े क्षेत्र भी कमजोर पड़े हैं। वास्तव में पिछड़े इलाकों को बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण जरूरी था ही नहीं। रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त अधिकार उपलब्ध हैं जिनका उपयोग करके निजी बैंकों को आदेश दिया जा सकता है कि वे चिन्हित विशेष क्षेत्रों में अपनी शाखाएं खोलें और सेवाएं उपलब्ध कराएं। 1971 में सरकार ने गलती यह की थी कि रिजर्व बैंक की इस नाकामी को ठीक करने के स्थान पर सरकार ने बैंकों का निजीकरण किया और उनकी नौकरशाही द्वारा देश को कमजोर करने का एक नया रास्ता खोल दिया। बैंकों को घाटा हुआ और हम पिछड़ गए। हम कुएं से निकलकर खाई में आ पड़े। वर्तमान में जरूरत यह है कि सरकारी बैंकों का निजीकरण करने के साथ-साथ रिजर्व बैंक द्वारा सख्ती से निजी बैंकों को पिछड़े इलाकों में सेवाएं उपलब्ध कराने के आदेश दिए जाएं। रिजर्व बैंक की एक नाकामी को छुपाने के लिए सरकार को दूसरे संकट में नहीं पड़ना चाहिए। सरकार के कदम की तीसरी आलोचना यह की जा रही है कि निजी मालिकों द्वारा बैंकों से मुनाफाखोरी की जाती है और अपने ही विशेष चहेतों को रकम उपलब्ध कराई जाती है।

यह बात सही है, लेकिन इसका भी सही उपाय यह है कि रिजर्व बैंक इन पर निगरानी रखे और जब इन पर संदेह हो कि ये इस प्रकार के दुराचार में लिप्त हैं, तब इन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। बताते चलें कि वास्तव में सरकारी बैंकों द्वारा भी इसी प्रकार के गलत लोगों को ऋण दिया जाता है। जैसे विजय माल्या आदि को सरकारी बैंकों ने ऋण देकर अपने ऊपर संकट लाया। लेकिन सरकारी बैंकों द्वारा जब इस प्रकार का दुराचार किया जाता है तो वह दिखता नहीं है, जबकि निजी बैंकों द्वारा वही दुराचार करने पर दिखने लगता है। सरकारी बैंक जब माल्या या नीरव मोदी को ऋण देते हैं तो माल्या और नीरव मोदी पर कार्रवाई की जाती है और जिन सरकारी अधिकारियों ने उन्हें गलत ऋण दिए थे और घूस ली थी, वे मस्त रहते हैं। इसलिए इस समस्या का निजीकरण से कोई संबंध है ही नहीं। सरकारी और निजी दोनों प्रकार के बैंकों की विशेष लोगों को गलत ऋण देने की प्रवृत्ति होती है जिस पर अंकुश रिजर्व बैंक को लगाना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए वित्त मंत्री को बधाई है कि उन्होंने दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का फैसला किया है। जानकार बताते हैं कि दो छोटे सरकारी बैंकों को प्रारंभ में पंजीकृत किया जा सकता है। वास्तव में वित्त मंत्री को इस दिशा में और तेजी और सख्ती से बढ़ना चाहिए और बड़े बैंकों का भी तत्काल निजीकरण करना चाहिए, जिससे सरकार को रकम मिले, जिसका निवेश नए और उभरते क्षेत्रों, जैसे जेनेटिक्स, डाटा प्रोसेसिंग और अंतरिक्ष इत्यादि में किया जा सके और हर वर्ष सरकारी बैंकों के दुराचार को ढकने के लिए उनमें निवेश करने की जरूरत न रहे।

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