भरत झुनझुनवाला

अतः यदि इस 37000 रुपए प्रति सच्चे छात्र की रकम को प्रदेश के सभी छात्रों यानी सरकारी एवं प्राइवेट स्कूल दोनों में पढ़ने वाले छात्रों में वितरित किया जाए तो प्रत्येक छात्र पर उत्तर प्रदेश सरकार लगभग 20000 रुपए प्रति वर्ष खर्च रही है। सुझाव है कि चुनाव के इस समय पार्टियां वायदा कर सकती

इसलिए केवल समर्थन की हवाई बातों को करने के स्थान पर हमें समझना होगा कि छोटे उद्योगों को यदि जीवित रखना है तो उन्हें वित्तीय सहायता देनी ही पड़ेगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि छोटे उद्योगों द्वारा बनाए गए माल की लागत अधिक होगी। जैसे बड़े उद्योग में बनाई गई टीशर्ट 200 रुपए में

इसलिए अनायास ही औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देने में नीति आयोग ने देश में रोजगार ही समाप्त कर दिए हैं। न्यून स्तर के अनौपचारिक जीवन के स्थान पर नीति आयोग ने औपचारिक मृत्यु को देशवासियों के पल्ले में डाल दिया है जिसके कारण प्रधानमंत्री ने कहा है कि रोजगार हमारे सामने प्रमुख चुनौती है। संभवतः

इस स्थिति में कई केंद्रीय बैंकों ने डिजिटल करंसी जारी करने का मन बनाया है। डिजिटल करंसी और क्रिप्टो करंसी में समानता यह है कि दोनों एक नंबर होते हैं जो आपके मोबाइल में रखे जा सकते हैं। लेकिन क्रिप्टो करंसी की तरह डिजिटल करंसी गुमनाम नहीं होती है। रिजर्व बैंक द्वारा इसे उसी तरह

ये 4 कारण बताते हैं कि आने वाले समय में सेवा क्षेत्र में हमारी स्थिति अच्छी हो सकती है। पहला कि मैन्युफैक्चरिंग का वैश्वीकरण पीछे हटेगा, दूसरा सेवा क्षेत्र का हिस्सा उत्तरोत्तर बढ़ रहा है, तीसरा सेवा क्षेत्र में रोजगार तुलना में सुरक्षित हैं और चौथा सेवा क्षेत्र के लिए प्रमुख कच्चा माल शिक्षा है

इस दिशा में सरकार को प्राइमरी स्तर पर ही अंग्रेजी भाषा और कम्प्यूटर शिक्षा को अनिवार्य कर देना चाहिए जिससे कि युवा आने वाले समय में कम्प्यूटर आधारित रोजगार जैसे पुस्तकों का अनुवाद करना अथवा वीडियो मिक्स करना जैसे कार्यों को स्वयं कर सकें और अपनी जीविका अर्जित कर सकें। हमें इस चिंता में नहीं

इसलिए सरकार को चाहिए कि एक महत्त्वाकांक्षी योजना बनाए जिसमें देश के हर जिले में उस स्थान की जलवायु में उत्पादित होने वाली उच्च मूल्य की फसल पर अनुसंधान किया जाए। मुझे बताया गया कि किसी समय अयोध्या से भिंडी का भारी मात्रा में निर्यात किया जाता था। वर्तमान में वहां से लोबिया देश के

सही बात यह है कि यदि हम संरक्षणवाद के साथ अपने घरेलू उद्यमियों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन दें तो आपसी प्रतिस्पर्धा में ये स्वयं कुशल उत्पादन करने लगेंगे। हमने बीते समय में गलती यह की कि संरक्षणवाद के साथ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा नहीं दिया जिसके कारण हमारे उद्यमी अकुशल उत्पादन करने लगे। इसलिए यदि

कुछ माल ऐसे होते हैं जिनका हम उत्पादन नहीं कर पाते हैं। जैसे मान लीजिए कि इंटरनेट के राउटर बनाने की हमारे पास क्षमता नहीं है। ऐसी परिस्थिति में हमें राउटर का आयात करना ही होगा और उस आयात को करने के लिए जितनी विदेशी मुद्रा हमें चाहिए, उतना निर्यात भी करना ही होगा। लेकिन

पशुओं की प्रजातियों पर रिसर्च के लिए सरकार को निवेश करना होगा। शाकाहारी भोजन को प्रोत्साहन देने के लिए मांस के उत्पादन में उपयोग किए गए कच्चे माल पर भारी टैक्स लगाएं तो मांस महंगा होगा, तो लोग शाकाहारी भोजन की ओर बढ़ेंगे। एलपीजी का दाम बढ़ाएं तो किसान के लिए गोबर गैस को बनाना