भरत झुनझुनवाला

सरकारी और निजी दोनों प्रकार के बैंकों की विशेष लोगों को गलत ऋण देने की प्रवृत्ति होती है जिस पर अंकुश रिजर्व बैंक को लगाना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए वित्त मंत्री को बधाई है कि उन्होंने दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का फैसला किया है। जानकार बताते हैं कि दो छोटे सरकारी बैंकों

आश्चर्य यह है कि प्रकृति का पूजन करने वाली भारतीय संस्कृति आज हमारी धरती, पानी और वनस्पति को नष्ट करने पर तुली हुई है। इसकी तुलना में भोगवादी कहलाने वाली अमरीकी संस्कृति ने तमाम क्रियाशील जलविद्युत परियोजनाओं को सिर्फ  इसलिए हटा दिया है कि वहां के लोग खुली और अविरल बहती हुई नदी में स्नान

इसी प्रकार जब बाइबिल में कहा गया कि गॉड ने पुरुष के शरीर से हड्डी निकालकर उससे ईव बनाया तो हम इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि मनुष्य के अंतर्मन में विद्यमान सर्वव्यापी चेतना ने उन मनुष्यों को प्रेरित किया कि वे स्त्री और पुरुष के भौतिक और मानसिक कार्यों में विभाजन करें। वर्तमान

इसके विपरीत जब खाद्यान्नों के दाम अधिक बढ़ जाएं तो फूड ट्रेडिंग कारपोरेशन अपने भंडारण किए हुए माल की बिक्री करे, आयात करे और और देश में खाद्यान्न उचित मूल्य पर उपभोक्ता को उपलब्ध कराए। फूड ट्रेडिंग कारपोरेशन को स्वयं खरीद और भंडारण का काम भी नहीं करना चाहिए। इस कारपोरेशन द्वारा व्यापारियों से भविष्य

यह न्यून वृद्धि किसानों की आय दुगना करने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है। यह भी देखने की बात है कि इस वृद्धि में किसान की लागत में कितनी वृद्धि हुई है। यह भी वित्त मंत्री ने नहीं बताया है। इसलिए किसान की आय में शुद्ध वृद्धि बहुत कम ही दिखती है। सरकार का उद्देश्य

इसमें परिवर्तन यह करना चाहिए कि व्यक्तिगत लोगों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाएं जैसे सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम और इम्प्लोयी इंश्योरैंस कारपोरेशन आदि पर खर्च घटाकर कोविड जैसे संक्रामक रोगों की रिसर्च पर खर्च बढ़ा देना चाहिए। पांचवां, अन्य तमाम मंत्रालयों पर 2019-20 में 20.0 लाख करोड़ रुपए का खर्च हुआ था। इन सभी के

ऐसा करने से एक तरफ  किसान को पानी का मूल्य अदा करना पड़ेगा तो दूसरी तरफ  किसान को मूल्य अधिक मिलेगा और उसकी भरपाई हो जाएगी। लेकिन तब हम आप शहरी जनता को महंगा अनाज खरीदना पड़ेगा। इसलिए अंततः प्रश्न यह है हम सस्ते अनाज के पीछे भागेंगे अथवा प्रकृति को संरक्षित करते हुए थोड़ा

कैबिनेट के मंतव्य के अनुसार जापान को कुशल कर्मियों को उपलब्ध करने के लिए हमें वर्तमान शिक्षा तंत्र के बाहर सोचना होगा। वर्तमान शिक्षा तंत्र का आमूलचूल सुधार करना होगा। सेंटर फार सिविल सोसायटी के एक अध्ययन के अनुसार हांगकांग, फिलिपीन्स, पाकिस्तान, आंध्र प्रदेश, दिल्ली-शहादरा, उड़ीसा आदि स्थानों पर प्रयोग किए गए हैं जिसके अंतर्गत

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक जब सेवित की आय में 50 प्रतिशत की कटौती हो गई है तो सेवकों की आय में भी उसी अनुपात में 50 प्रतिशत की कटौती करना उचित दिखता है। ऐसा करने से सरकार का घाटा घटेगा। समय क्रम में जब अर्थव्यवस्था पुनः ठीक हो जाए तो सेवकों के वेतन पूर्ववत किए

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था दो भागों में विभक्त हो गई है। एक हिस्सा सार्वजनिक इकाइयों और बड़ी कंपनियों एवं इनके कर्मचारियों का है जो सुदृढ़ है। इस हिस्से को ही हमारे बैंक ऋण दे रहे हैं। मेरी गणना के अनुसार देश की 133 करोड़ जनता में से 10 करोड़ ही