भरत झुनझुनवाला

बड़े व्यापारियों ने सीमेंट, लोहे और एयर कंडीशनर आदि की आपूर्ति की, उस उत्पादन में रोजगार कम संख्या में बने, आम आदमी के हाथ में रकम कम आई और बाजार में मांग कम बनी। बड़ी कंपनियों का कार्य अवश्य बढ़ा परंतु जमीनी स्तर पर अर्थव्यवस्था में चाल नहीं बनी। इसकी तुलना में यदि सरकार संसद

वर्तमान संकट से शीघ्र ही छुटकारा मिलने वाला नहीं दिख रहा है। सरकार को सर्वप्रथम टीका बनाने में भारी निवेश करना चाहिए, विशेषकर देश में उपलब्ध गंगा के फाज अथवा आयुर्वेद इत्यादि से। दूसरे, ऋण लेकर अपने खर्चों को सामान्य रूप से बनाए रखने की नीति को त्याग कर सरकारी खर्चों में 50 प्रतिशत की

समस्या यह है कि यदि सरकार पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टी और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठनों को मान्यता देती है तो इन संगठनों द्वारा भ्रष्ट नौकरशाही के साथ-साथ भ्रष्ट सरकार पर भी प्रश्न उठाए जाते हैं, जो कि सरकार को मान्य नहीं होता है। प्रतीत होता है कि इसलिए सरकार का प्रयास है कि सिविल

जरूरत इस बात की है कि हम अपने समग्र पर्यावरण की रक्षा करें, जिससे उत्तराखंड में जंगल का जलना, गंगा के पानी का प्रदूषित होना इत्यादि न हो। देश का पर्यावरण स्वच्छ और स्निग्ध हो ताकि देश के अमीर देश में ही रहकर अपनी पूंजी का निवेश देश में ही करने को लालायित हों और

अतः कम ही सही, लेकिन श्रमिक को कुछ रोजगार मिलता रहे, इसके लिए जरूरी है कि श्रम की उत्पादकता को  बढ़ाया जाए। श्रम की उत्पादकता बढ़ाने के दो प्रमुख उपाय हैं। एक यह कि उत्तम मशीनों का उपयोग किया जाए जिससे कि उसी कुशलता के स्तर का श्रमिक अधिक उत्पादन कर सके। दूसरा यह है

मैं समझता हूं कि कपड़े और कागज जैसी आवश्यक एवं उपयोगी वस्तुओं के स्थान पर तेल पर अधिक टैक्स वसूल करना ही उचित होगा। विशेषकर इसलिए कि तेल पर टैक्स वसूल करने का बोझ आम आदमी पर कम और समृद्ध वर्ग पर ज्यादा पड़ेगा। तेल के ऊंचे मूल्य सही हों तो भी सरकार की आलोचना

यदि लोकतंत्र को छोड़ कर एकाधिकार की सरकार लागू की जाए तो दो परिस्थितियां बनती हैं। यदि एकाधिकारी सरकार जनसेवा करती है तो यह हर प्रकार से सही बैठता है, जैसा कि चीन में देखा जाता है। लेकिन यदि एकाधिकारी सरकार जनविरोधी हो जाती है तब लोकतंत्र लाभप्रद और जरूरी दिखता है जैसा कि युगांडा

जिस प्रकार कांटे से कांटे को निकाला जाता है, उसी प्रकार संभव है कि इन दोनों के आपसी घर्षण का लाभ उठाकर इन दोनों पर ही नियंत्रण किया जा सके। सीधा उपाय यह है कि सरकार देश के आम आदमी यानी जनता को सक्षम बनाए क्योंकि इनके दुराचार की जानकारी जनता को तो होती ही

इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसी नीतियां लागू करे जिससे जनता स्वयं उत्पादक कार्यों में लिप्त हो सके और आय अर्जित कर सके और अनाज खरीद सके। जैसे हमारे गांव के युवा यदि संगीत का निर्माण कर उसका विक्रय कर सकें और उस रकम से यदि वही 30 किलो गेहूं खरीदते तो सरकार के ऊपर

सरकारी और निजी दोनों प्रकार के बैंकों की विशेष लोगों को गलत ऋण देने की प्रवृत्ति होती है जिस पर अंकुश रिजर्व बैंक को लगाना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए वित्त मंत्री को बधाई है कि उन्होंने दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का फैसला किया है। जानकार बताते हैं कि दो छोटे सरकारी बैंकों