परिवर्तित होता मानव जीवन परिदृश्य

वर्तमान स्थिति में सभी को अपना मानसिक, मनोवैज्ञानिक, संवेगात्मक, आर्थिक तथा सामाजिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है…

किसे पता था कि कोरोना जैसा दानव दुनियां के लोगों की हंसती-खेलती जि़ंदगी में एक तूफान सा पैदा कर देगा। क्या ख़बर थी कि यह महामारी लाखों लोगों को मौत का ग्रास बना लेगी। किसी को भी आभास नहीं था कि दुनिया के सारे कारोबार ठप्प हो जाएंगे, बेरोजगारी फैलेगी, आर्थिकी प्रभावित होगी तथा मनुष्य अपनी चारदीवारी तक सीमित होकर अपने भाग्य को कोसने पर मजबूर होगा। एक बार फिर से इस महामारी ने भयंकर रूप धारण कर लिया है। कई देशों की व्यवस्थाएं बदल गई हैं। लगभग एक महीने से भारत में भी इस संक्रमण से भयंकर स्थिति हो गई है। देश की कई राज्य सरकारों ने तीव्र गति से फैलते संक्रमण तथा मृत्यु दर में वृद्धि होने के कारण फिर से लॉकडाउन, नाइट कर्फ्यू तथा कई प्रकार की बंदिशें लगानी शुरू कर दी हैं। बच्चे, युवा, अधेड़ तथा बुजुर्ग सभी परेशान हैं। मास्क के पहरे ने चेहरे की खुशियां छीन ली हैं। एक ओर जीने की ख्वाहिश, दूसरी तरफ  मौत का खौफ, बहुत ही भयानक मंज़र है। इस भयंकर स्थिति से मनुष्य का जीवन पूरी तरह से परिवर्तित होता नजर आ रहा है। लोगों में मानसिक, शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक बदलाव आने शुरू हो गए हैं।

जीवन की परेशानियां, काम-धंधे की चिंता, बच्चों का भविष्य, बैंक लोन की देनदारी, व्यक्ति पर मानसिक दबाव डाल रही हैं। जन्म संस्कार, कथा, भागवत, विवाह, सेवानिवृत्ति, तीज-त्योहारों, मेलों तथा पर्वों की खुशियों को ग्रहण लग चुका है। भजन, कीर्तन, जागरण, सांस्कृतिक आयोजन, सामूहिक भोज, कथा-व्रत, उद्यापन, तीर्थ यात्रा, सब कुछ बंद हो गया है। मृत्युपरांत होने वाले शोक आयोजन, क्रिया-कर्म तथा शोक संतप्त परिवार को ढाढस बंधाने के लिए भी सामाजिक रूप से पहरा है। किसी को सांत्वना देने के लिए भी सोचना पड़ता है। अपना-अपना सुख-दुख है। जीवन के संबंधों की गर्माहट अब शीतल पड़ चुकी है। शिक्षण संस्थानों में लगभग ताला लगने जैसे हालात हैं। शिक्षक और विद्यार्थी ऑनलाइन शिक्षण पर मजबूर हो चुके हैं। कक्षा तथा पाठशाला के वातावरण का आनंद अब सपने जैसा हो चुका है। एक समय था जब विद्यार्थी के पास मोबाइल मिलने पर उसके माता-पिता को पाठशाला में बुलाकर  स्कूल प्रशासन अनुशासनात्मक कार्रवाई करता था। आज मोबाइल विद्यार्थी, शिक्षक तथा शिक्षा नीति निर्धारकों के लिए वरदान साबित हो चुका है।

 ऑनलाइन शिक्षण के लिए आर्थिक मजबूरी के कारण जो मोबाइल नहीं खरीद सकते थे, उन्होंने भी एंड्रॉयड मोबाइल खरीद कर बच्चों को भेंट कर दिए। जो बच्चे दुनिया को अपनी साफ नज़रों से देख सकते थे उनकी दुनिया केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित हो चुकी है। मोबाइल का अधिक प्रयोग भविष्य में बच्चों को मानसिक, मनोवैज्ञानिक, शारीरिक रूप से प्रभावित कर सकता है। अपनी शिक्षा को पूर्ण कर व्यावसायिक जीवन में भविष्य तलाश रहे युवा भी कम परेशान नहीं हैं। संगठित एवं असंगठित क्षेत्रों में नौकरियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। लोगों के रोज़गार छिन गए हैं। देश-विदेश से घर वापस आ चुके युवा मानसिक तथा आर्थिक दबाव में सुखद भविष्य के लिए चिंतित रहते हैं। युवा-बच्चों के दुख तथा परेशानी में उनके माता-पिता कहां सुख-चैन से रह सकते हैं? उन पर भी बच्चों की पढ़ाई, नौकरी तथा शादी-विवाह की चिंता का दबाव है। छोटा-मोटा कारोबार, उद्योग-धंधा, दुकानदारी, रेहड़ी-फड़ी मजदूरी करने वाला धंधे की मंदी से परेशान है। व्यापारी को ग्राहक नहीं मिल रहा। ग्राहक के पास पैसे नहीं हैं। शादी-विवाह, धर्म-कर्म, उत्सव, मेले, त्यौहार सब बंद हैं। विशेष अवसरों पर खरीद-फरोख्त होती है। जब खास मौका ही नहीं तो क्यों कोई खरीदेगा? वैसे भी ऑनलाइन शॉपिंग से कोई भी अपनी मनपसंद वस्तु मंगवा सकता है। मोबाइल पर वस्तु पसंद कर सकते हैं। घर के दरवाजे पर सामान पहुंच जाता है। पेमेंट मोबाइल ऐप से हो जाती है। वस्तु अगर पसंद न आए तो वापस भी हो जाती है। दुकानदार अपनी दुकान पर बैठा ग्राहक का इंतजार करता रहता है। दुकान का किराया तथा कई प्रकार के टैक्स, बैंक लोन इत्यादि उसे मानसिक रूप से परेशान करते हैं। ट्रांसपोर्टर, बस मालिक, कारोबारी तथा विभिन्न काम-धंधे के लिए कर्ज लेने वाले व्यवसाय न चलने से बैंकों के भारी-भरकम ऋण पर ब्याज से परेशान हैं। पेट्रोल, डीजल तथा गैस की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी के जीवन में आग लगा दी है।

बिजली-पानी तथा अन्य सुविधाएं महंगी हो चुकी हैं। घर-मकान, दुकान तथा संस्थान में कारोबार के लिए ऋण लेने वालों को बैंकों की देनदारियों ने परेशान किया है। सबको आनंद एवं खुशियां देने वाला कलाकार इस समय आर्थिक संकट से जूझ रहा है। जो व्यक्ति स्वयं कष्ट या परेशानी में होगा, वो औरों के चेहरे पर गीत गाकर कैसे हंसी-खुशी ला सकता है? भजन, कीर्तन, जागरण, सांस्कृतिक कार्यक्रम बंद हैं। बैंड-बाजा, ऑर्केस्ट्रा, सज्जा-सजावट, लाइट-टेंट, झांकियां, साउंड, पंडित, नाई, बोटिए, हलवाई, डीजे, छोटा-मोटा कारोबार करने वाले सब कोरोना की बंदिशों से बेहाल हैं। मंदिरों के बाहर प्रसाद, हलवा, फूल-पत्ती, पूजा का सामान, मूर्तियां तथा अन्य सामग्री कोई नहीं खरीदता। मेलों में झूले, सर्कस, टिक्की-चाट, टी-स्टाल, सौंदर्य प्रसाधन, कपड़े, बर्तन, ग्रॉसरी, गुलदस्ते, गुब्बारे तथा खिलौने बेचने वाले बेमौत भूखे मरने पर विवश हैं। दंगलों में कुश्तियां करने वाले पहलवानों को दांव-पेच दिखाकर पैसा नहीं मिल रहा। किसान पशुओं के आतंक तथा भयंकर सूखे की स्थिति से निराश हो चुका है। इस साल वर्षा न होने के कारण फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। ट्रैक्टर की बुवाई, बीज, खाद तथा मजदूरी बहुत महंगी हो चुकी है। किसान को अपने निवेश की भरपाई भी नहीं हो रही। गांवों में लोगों ने पशु पालने लगभग बंद कर दिए हैं। घास कोई खरीदता नहीं है। वर्तमान स्थिति में सभी को अपना मानसिक, मनोवैज्ञानिक, संवेगात्मक, आर्थिक तथा सामाजिक संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है। आशा की जा सकती है कि मनुष्य का वर्तमान कष्ट शीघ्र समाप्त होगा तथा फिर से दुनिया में सुख-शांति एवं खुशियों का वातावरण होगा।

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