बेहतरीन आदर्श हैं रजनीकांत

उनके पिता रामोजी राव एक हवलदार थे। घर की माली हालत ठीक नहीं थी। मां जीजाबाई की मौत के बाद चार भाई-बहनों में सबसे छोटे रजनीकांत ने परिवार को सहारा देने के लिए ‘कुली’ का भी काम किया। इसके बाद वह बेंगलुरू ट्रांसपोर्ट सर्विसेज में कंडक्टर बन गए। फिर उन्होंने अभिनय में डिप्लोमा किया…

मेहनत और मेहंदी कुछ समय के बाद रंग लाती हैं, इस शाश्वत सत्य को सार्थक करते हुए साऊथ सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत के लिए सिनेमा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के अवार्ड का ऐलान किया गया है। इसके बाद से उनके चाहने वालों की खुशी का ठिकाना नहीं है। सोशल मीडिया पर उन्हें बधाइयां देने वालों की कतार लगी है। कभी शुरुआती जिंदगी में बस कंडक्टर का काम कर चुके रजनीकांत ने अपना यह अवार्ड एक बस ड्राइवर के लिए डेडिकेट किया है। यह पुरस्कार मिलने के ऐलान के बाद रजनीकांत ने एक खास चिट्ठी लिखकर सोशल मीडिया पर शेयर की है, जिसमें उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, तमिलनाडु की सरकार और फिल्मी दुनिया के दिग्गज कलाकारों का शुक्रिया अदा किया है। इसी कड़ी में एक बस ड्राइवर का भी जिक्र है, जिसे रजनीकांत ने इस पुरस्कार पाने के लिए सहायक बताते हुए धन्यवाद कहा है। इसमें रजनीकांत ने लिखा है, ‘मैं यह अवार्ड अपने दोस्त राज बहादुर को समर्पित करना चाहूंगा। उसी ने मेरा टैलेंट समझा था और मुझे कई मौके मिल पाए। मैं अपने भाई सत्यनारायण राव का भी शुक्रगुजार हूं जिन्होंने कई बलिदान किए जिससे मैं एक एक्टर बन पाऊं। मेरे गुरु बालाचंदर को भी शुक्रिया कहना चाहता हूं जिन्होंने मुझे बड़े पर्दे से रूबरू करवाया और मैं असल मायनों में रजनीकांत बन पाया।’

एक समय जब रजनीकांत सुपरस्टार नहीं थे, तब वह बस कंडक्टर हुआ करते थे। उस समय राज बहादुर बस के ड्राइवर थे। रजनीकांत को आज सुपरस्टार बनने का मौका उन्हीं की मदद से हासिल हुआ। कहना गलत नहीं होगा कि उनकी सफलता के इस सफर में उनके दोस्त राज बहादुर का अहम योगदान रहा है। पिछले काफी समय से रजनीकांत के तमिलनाडु की राजनीति में दाखिले की चर्चा थी जिससे उनके चहेतों के वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता था। कुछ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जारी गहमा-गहमी के बीच रजनीकांत को दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित करने का फैसला लिया गया है। दक्षिणी फिल्मों के सुपर स्टार बनने से लेकर बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाने वाले रजनीकांत को दादा साहेब फाल्के अवार्ड देकर केंद्र सरकार ने एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की है। तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव से ऐन पहले फिल्म जगत के इस सर्वोच्च सम्मान के ऐलान को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं, लेकिन सरकार का अपना तर्क है जो थोड़ा वाजिब भी लगता है। शायद इसीलिए इस अवार्ड का ऐलान करते वक्त सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को यह कहना पड़ा कि कोरोना महामारी के बीच अगर हम इसका ऐलान करते तो सब हाथ धोकर हमारे पीछे पड़ जाते कि सरकार को कोरोना से ज्यादा चिंता इस अवार्ड को देने की है। हालांकि यह अवार्ड साल 2019 के लिए उन्हें दिया जाएगा। जावड़ेकर ने अपने ट्वीट में इसकी घोषणा करते हुए रजनीकांत को भारतीय सिनेमा इतिहास के सबसे महान अभिनेताओं में से एक बताया है। वैसे साल 2018 में यह पुरस्कार सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और साल 2017 में भूतपूर्व भाजपा नेता और अभिनेता विनोद खन्ना को दिया गया था। लेकिन सियासी गलियारों में एक सवाल तैर रहा है कि रजनीकांत को सक्रिय राजनीति में आने से रोकने की भूमिका क्या चार महीने पहले ही तैयार हो गई थी? इसकी वजह भी है कि पिछले साल ही रजनीकांत ने अपनी एक पार्टी बनाई थी, तब सभी को यह लगा था कि वह तमिलनाडु के चुनाव मैदान में भी उतरेगी।

 दक्षिण से लेकर उत्तर भारत में यह चर्चा जोरों पर थी कि उम्र के 71वें साल में आ चुके रजनीकांत अब चुनावी जंग में भी अपनी किस्मत आजमाएंगे। लेकिन बीते साल दिसंबर में उन्होंने अचानक ऐलान कर दिया कि वे चुनावी राजनीति से बाहर रहेंगे। उनके फैन्स के साथ ही दक्षिण भारत के राजनीतिक पंडित भी इस ऐलान से हैरान रह गए थे कि आखिर रजनीकांत के इस फैसले को क्या समझा जाए। हालांकि यह तो रजनीकांत ही जानते होंगे कि उन्होंने राजनीति में आते-आते अपने कदम क्यों रोक लिए, लेकिन उनके अभिनय को भला कौन भुला सकता है। अपनी एक्टिंग के दम पर सिनेमा के जरिए लोगों के दिल में आज भी उन्होंने अलग ही जगह बनाई हुई है। उनके सिगरेट को फ्लिप करने का फिल्मी पर्दा अंदाज, सिक्का उछालने का तरीका और चश्मा पहनने का तरीका बहुत से लोग कॉपी करने की कोशिश करते हैं। देश ही नहीं, विदेशों में भी रजनीकांत के स्टाइल की कॉपी की गई। वैसे रजनीकांत का असली नाम शिवाजी है। उनका जन्म 12 दिसंबर 1950 को बेंगलुरू में एक मराठी परिवार में हुआ था। रजनीकांत ने अपनी मेहनत और कड़े संघर्ष की बदौलत टॉलीवुड में ही नहीं, बॉलीवुड में भी काफी नाम कमाया। साऊथ में तो रजनीकांत को थलाइवा और भगवान कहा जाता है। रजनीकांत ने 25 साल की उम्र में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। उनकी पहली तमिल फिल्म ‘अपूर्वा रागनगाल’ थी। इस फिल्म में उनके साथ कमल हासन और श्रीविद्या भी थीं। 1975 से 1977 के बीच उन्होंने ज्यादातर फिल्मों में कमल हासन के साथ विलेन की भूमिका ही की। लीड रोल में उनकी पहली तमिल फिल्म 1978 में ‘भैरवी’ आई। यह फिल्म काफी हिट रही और तबसे ही रजनीकांत स्टार बन गए। रजनीकांत की जिंदगी मेहनतकश युवाओं के लिए एक बेहतरीन आदर्श है। एक साधारण बस कंडक्टर से अपनी जीविका की शुरुआत करने वाले रजनीकांत आज भी फिल्मों में सक्रिय हैं। उनके पिता रामोजी राव गायकवाड़ एक हवलदार थे।

 घर की माली हालत ठीक नहीं थी। मां जीजाबाई की मौत के बाद चार भाई-बहनों में सबसे छोटे रजनीकांत ने परिवार को सहारा देने के लिए ‘कुली’ का भी काम किया और इसके बाद वह बेंगलुरू ट्रांसपोर्ट सर्विसेज में कंडक्टर बन गए थे। लेकिन यह काम उन्हें रास नहीं आया और इसलिए उन्होंने 1973 में मद्रास फिल्म संस्थान में दाखिला लिया और अभिनय में डिप्लोमा लिया। रजनीकांत की मुलाकात एक नाटक के मंचन के दौरान फिल्म निर्देशक के. बालाचंदर से हुई और यहीं से उनकी लाइफ  ने अनोखा मोड़ लिया। बालाचंदर ने रजनीकांत से प्रभावित होकर तमिल फिल्म में रजनी को ब्रेक दिया, जिसमें उनका रोल खलनायक वाला था। फिल्म ने सफलता का नया इतिहास लिखा था। फिल्म ने नेशनल अवार्ड जीता और रजनीकांत लोगों के दिलों पर छा गए और इसी वजह से रजनीकांत हमेशा बालाचंदर को अपने पिता का दर्जा देते हैं। इसके बाद रजनीकांत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अनिथन, अदिक्कथवन, श्री भरत, एल्ऐकरन, गुरु षिश्यन और ढर्मथिन ठल्ऐव उनकी यादगार फिल्में हैं। इससे पहले साल 2014 में रजनीकांत 6 तमिलनाडु स्टेट फिल्म अवार्ड्स से नवाजे गए थे, जिनमें से 4 पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के और दो स्पेशल अवार्ड्स थे। साल 2000 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था, तो वहीं 45वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया में रजनीकांत को ‘सेंटेनरी अवॉर्ड फॉर इंडियन फिल्म पर्सन ऑफ द ईयर’ से सम्मानित किया गया था। उन्हें यह पुरस्कार मिलने पर बधाई है।

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