सामाजिक सुरक्षा और प्रवासी मजदूर

राज्यों को इनके घरों के पास कामकाज के इंतजाम करने होंगे। यह ग्रामीण व्यवस्था को सुदृढ़ करने से मुमकिन हो सकेगा। रोजगार की परिकल्पना नए सिरे से किए जाने की जरूरत है…

प्रधानमंत्री ने 20 अप्रैल की शाम को राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था कि राज्य प्रवासी मजदूरों का भरोसा जगाए रखें और उनसे आग्रह करें कि वो जहां हैं, वहीं रहें। लेकिन जमीनी वास्तविकता यह है कि देश में कोरोना के बढ़ते कहर और लॉकडाउन की आशंका से परेशान प्रवासी मजदूर एक बार सामाजिक सुरक्षा की कमजोरी के कारण फिर पलायन कर रहे हैं। पिछले लॉकडाउन की तरह भले ही इस बार सड़कों पर उतनी भीड़ नहीं दिखाई दे रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पलायन कम हो रहा है। जिसे जो साधन मिल रहा है, उसी से लोग निकल चुके हैं और यह क्रम जारी है। प्रवासी मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा को लेकर देश के अनेक राज्यों में शिथिलता दिखाई जा रही है। श्रम मंत्रालय ने प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए राज्यों से सोशल सिक्योरिटी से जुड़े नियम जल्द जारी करने को कहा है। कोरोना महामारी को एक साल से ज्यादा होने के बाद भी प्रवासी मजदूरों के लिए बनी पॉलिसी लागू नहीं हो सकी है। कोरोना मामलों में वृद्धि के बीच एक  बार फिर प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें बढ़ी हैं। महामारी के एक साल बाद भी पॉलिसी का फायदा नहीं मिला। इस मामले में बताया जा रहा है कि केंद्र के सामाजिक सुरक्षा नियम तैयार हैं, परंतु राज्यों ने अब तक इसे जारी नहीं किया है। राज्यों द्वारा इस पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। प्रवासी श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य अधिकारों पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग  की ओर से की गई एक ताजा स्टडी के मुताबिक प्रवासी श्रमिकों को बुनियादी सुविधाएं भी आसानी से नहीं मिल रही हैं। इतना ही नहीं, उन्हें बाहरी और दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर समझा और देखा जाता है। यह स्टडी ऐसे समय में सामने आई है जब पूरा भारत कोरोना की दूसरी लहर का दंश झेल रहा है और प्रवासी श्रमिक अपने-अपने राज्यों में लौटने लगे हैं। एनएचआरसी द्वारा कमीशन और ‘केरल डेवलपमेंट सोसाइटी’ द्वारा किए गए इस अध्ययन में रिसर्चर्स ने लगभग 4400 प्रवासी श्रमिकों, स्थानीय श्रमिकों, राज्य सरकार के अधिकारियों, चुने गए प्रतिनिधियों, स्कॉलर्स, एक्सपर्ट्स, एनजीओ के प्रतिनिधियों, व्यापार संघों का इंटरव्यू लिया। ये इंटरव्यू चार राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा में श्रमिकों से लिया गया।

 दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा में कामकाज के उद्देश्य से आने वाले अधिकतर प्रवासी श्रमिक कम सैलरी पर  ज्यादा जोखिम भरे क्षेत्रों, जैसे कंस्ट्रक्शन वर्क,  हैवी इंडस्ट्रीज, ट्रांसपोर्ट सर्विसिज और कृषि क्षेत्र में काम करते हैं। इस अध्ययन की सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इन प्रवासी श्रमिकों को स्वास्थ्य सेवाएं, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, रहने के लिए घर, भोजन, पानी और अन्य जरूरी सुविधाएं भी ठीक से नहीं मिलती। स्टडी के मुताबिक सभी प्रवासी श्रमिकों में से लगभग 84 फीसदी श्रमिकों ने कहा कि उनके पास रहने के लिए सही घर तक नहीं है और वे खराब घर में रहने पर मजबूर हैं। स्टडी में कहा गया है कि केवल दिल्ली में श्रमिकों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं, क्योंकि वहां मोहल्ला क्लीनिक इन श्रमिकों के लिए मददगार साबित हो रहे हैं। मगर अन्य राज्यों में प्रवासी श्रमिकों के लिए हालात बेहद खराब हैं। वहां प्रवासियों को अच्छी स्वास्थ्य सेवा तक ठीक से उपलब्ध नहीं हो रही। अध्ययन में कहा गया कि महिला प्रवासी श्रमिक पोषण संबंधी परेशानियों का सामना कर रही हैं और स्थानीय मजदूरों की तुलना में उन्हें खराब प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं। इस सर्वे में शामिल 68 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उनके पास शौचालय की भी सुविधा नहीं है, क्योंकि वे झुग्गी-झोंपड़ी या बस्तियों में रहती हैं। स्टडी के मुताबिक मुंबई में लगभग 62 प्रतिशत प्रवासी श्रमिक झुग्गियों में रहते हैं। अध्ययन में दावा किया गया है कि दिल्ली में हर महीने 43 अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों, गुजरात में 35 श्रमिकों, हरियाणा में 41 श्रमिकों और महाराष्ट्र में 38 श्रमिकों की कंस्ट्रक्शन जगहों पर दुर्घटनाओं में, पेट से संबंधित बीमारियों, दिल की बीमारियों के चलते मौत हो जाती है। और तो और, कुछ श्रमिक मजबूरन किसी कारण से आत्महत्या कर लेते हैं।

 इस स्टडी के अनुसार दिल्ली में लगभग 92.5 प्रतिशत प्रवासी श्रमिकों, महाराष्ट्र में 90.5 प्रतिशत, गुजरात में 87 प्रतिशत और हरियाणा में 86 प्रतिशत मजदूरों के साथ स्थानीय लोग बाहरी राज्य का होने की वजह से भेदभाव करते हैं। यहां तक कि स्थानीय श्रमिकों को प्रवासी श्रमिकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाता है। इस स्टडी के सभी पहलू काबिले गौर हैं। निचोड़ में अब हमारे सामने दो अहम कारण उभर रहे हैं जिनके चलते प्रवासी मजदूर पलायन की तरफ  अग्रसर हैं। पहला यह है कि तथ्यों के अनुसार कोरोना वायरस का संक्रमण अनियंत्रित तरीके से बढ़ रहा है। आने वाले समय में अगर हालात और ज्यादा खराब हुए तो लॉकडाउन की सीमा बढ़ाई जा सकती है। और एक बार प्रवासी मजदूर फिर यहां फंस गए तो परिवार चलाना मुश्किल साबित हो सकता है। दूसरा, भीड़ की वजह से कोरोना संक्रमण बढ़ने को लेकर प्रवासी मजदूरों का कहना है कि उन्हें किसी पर अब भरोसा नहीं है। अगर संक्रमित भी हो जाते हैं तो अपने घर पहुंच जाएंगे, क्योंकि यहां काम बंद हो गया है और इलाज के लिए तो लोकल आदमियों को भी भटकना पड़ रहा है। लॉकडाउन के डर से सहमे प्रवासी मजदूर बतियाते हैं कि ‘धक्का खाए के गांव पहुंच जावो और वहां पहुंचकर कम से कम दोनों टाइम सुकून की दुई रोटी तो खाई कै मिली।’ कुल मिला कर प्रवासी मजदूरों की हालत चिंताजनक है। ये लोग रोजगार की खोज में अपने गांवों को छोड़ कर शहर जाने को मजबूर हुए थे और फिर अब लॉकडाउन की आशंका के कारण घर वापस जा रहे हैं। वैसे भी प्रवासी मजदूरों का यह संकट अब उनके जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा बन चुका है। हालांकि, अभी  हमें सिर्फ  लौटने वाले प्रवासियों की ही चिंता नहीं करनी है, बल्कि यह भी सोचना है कि न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में रोजगार  एवं  उत्पादन के भविष्य पर इसका क्या असर होगा। तुच्छ एवं सस्ता श्रम समझे जाने वाले इन मजदूरों के काम की असली कीमत समझाने की जरूरत है।

 ये मजदूर निहायत ही खराब परिस्थितियों में अपना जीवन व्यतीत करते हैं। ये फैक्टरियों में ही सोते एवं खाते हैं। कारखानों का काम है उत्पादन करना और मजदूरों का काम है इन कठिन परिस्थितियों में जीवित रहना। राज्यों को इनके घरों के पास कामकाज के इंतजाम करने होंगे। यह ग्रामीण व्यवस्था को सुदृढ़ करने से मुमकिन हो सकेगा। वर्तमान प्रवासी मजदूर पलायन ने उनके लिए रोजगार की परिकल्पना नए सिरे से किए जाने की जरूरत की ओर इशारा किया है। जिन इलाकों में प्रवासी मजदूर लौटते हैं, वहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नवीनीकृत करने और उन्हें लचीला  बनाने का शानदार अवसर है। याद करें जब 1970 के दशक में महाराष्ट्र में बड़ा अकाल पड़ा था और ग्रामीण पलायन के कारण शहरों में बड़े पैमाने पर अशांति की आशंका थी, तब वीएस पगे, जोकि एक गांधीवादी रहे हैं, ने लोगों को उनके निवास स्थान के पास ही रोजगार प्रदान करने की योजना बनाई थी। प्रवासी मजदूरों के लिए राज्यों में सामाजिक सुरक्षा के उपाय और मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए उनके गृह राज्य ही जिम्मेवार हैं जिन्होंने उनके रोटी-पानी के लिए लोकल अर्थव्यवस्था को विकसित करने में लापरवाही दिखाई है। अभी भी हमारे आसपास और दूर-दूर ऐसा कुछ काबिले-तारीफ नहीं हो रहा है। प्रवासी मजदूरों के लिए नई और परिपक्व दिशा में  नतीजा युक्त धारदार नेतृत्व की जरूरत है।

संपर्क : 

डा. वरिंदर भाटिया, कालेज प्रिंसीपल

ईमेल : [email protected]

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