शिक्षा की चुनौतियां और संभावनाएं

यदि कोविड-19 की महामारी लंबी भी चलती है तो समय की मांग है कि ऑनलाइन शिक्षा को और सुदृढ़ किया जाए। ऑनलाइन शिक्षण को व्यवस्थित करने की जरूरत है…

लगभग सदी के पश्चात कोरोना जैसी महामारी ने पूरे विश्व के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे को पूरी तरह उथल-पुथल कर दिया है, जिसमें शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। मार्च 2020 में ही इस महामारी के कारण सभी स्कूलों के दरवाजे बंद करने पड़े और आज लगभग सवा साल तक अध्यापकों को बच्चों की कक्षा से दूर रखा है। इस आपदा के कारण जहां शिक्षा के क्षेत्र का पूरा ढांचा अस्त-व्यस्त होकर चरमरा गया है, वहीं इस काल में व्यापक सुधार करके शिक्षा प्रदान करने की संभावनाएं देखी जा रही हैं। इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता कि हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में इस दौरान बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने में जहां कई क्षेत्रों में इंटरनेट के सिग्नल की समस्या है, लोगों के पास स्मार्टफोन नहीं हैं, कई लोग स्मार्ट फोन का उपयोग नहीं कर पाते हैं, ‘हर घर पाठशाला’ में  बच्चों को कार्य करवाने के लिए सभी अभिभावक जागरूक नहीं हैं, दिहाड़ीदार लोगों के पास बच्चों के लिए दूसरा मोबाइल नहीं है, कक्षा कक्ष की गतिविधियां रुक गई थीं, बच्चों के साथ अध्यापकों का सीधा संवाद नहीं हो सका, ऑनलाइन पठन-पाठन  के शिक्षण के लिए विद्यार्थियों व अध्यापकों की अधूरी तैयारी, विद्यार्थियों को दोपहर का पौष्टिक भोजन न मिल पाना जैसे कारणों से शिक्षा का क्षेत्र प्रभावित हुआ है। हाल ही में एक सोशल मीडिया में तस्वीर आई जिसमें शिमला जिला की हिमरी पंचायत व आसपास के क्षेत्रों में  नेट सिग्नल नहीं होने कारण सभी बच्चे एक पहाड़ी पर जहां सिग्नल था, वहां अधिक संख्या में बच्चे अपनी ऑनलाइन पढ़ाई करते हुए देखे गए। इस काल में हिमाचल प्रदेश में कई गरीब परिवारों ने अपना पेट बांधकर बच्चों की पढ़ाई करवाने के लिए स्मार्टफोन खरीदे। कोरोना की इस महामारी ने पूरे विश्व के दैनिक क्रियाकलाप से लेकर लंबे समय तक पूरी न होने वाली योजनाओं को तहस-नहस कर दिया है।

 संपूर्ण विश्व के साथ-साथ भारत में भी संपूर्ण लॉकडाउन से सभी शिक्षण संस्थान बंद करने पड़े, जिसके कारण करोड़ों बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा, लेकिन अगर यह महामारी 10 साल पहले फैलती तो नुकसान वर्ष 2020 की अपेक्षा कई गुना अधिक बढ़ जाता। 18 मार्च 2020 को पूरे भारत में संपूर्ण शैक्षणिक संस्थान बंद कर दिए गए। 29 जून 2020 को छठा लॉकडाउन लगा, जिसकी अवधि 1 जुलाई से 30 जुलाई 2020 तक थी। कुछ क्षेत्रों में थोड़ी राहत दी गई लेकिन शिक्षण संस्थान फिर भी नहीं खुले। इस दौरान मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ऑनलाइन पोर्टल के साथ डायरेक्ट टू होम टीवी सेवा, सतत अधिगम के लिए रेडियो प्रोग्राम चलाए। इसके साथ सोशल मीडिया जैसे व्हाट्सएप, जूम, टेलीग्राम, यूट्यूब लाइव, फेसबुक लाइव, गूगल मीट आदि माध्यमों के तहत बच्चों तक अपनी पहुंच बनाई। इसके अतिरिक्त एमएचआरडी के विभाग ने माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के लिए दीक्षा पोर्टल शुरू किया, जिसमें बच्चों, अध्यापकों, अभिभावकों के लिए पाठ्य सामग्री व वीडियो तैयार कर डाले। एनसीईआरटी ने कक्षा पहली से जमा दो के लिए ऑनलाइन लर्निंग के तहत ई-पाठशाला ऐप शुरू किया जिसमें सभी पुस्तकें, दृश्य-श्रव्य सामग्री, जो सभी विषयों पर कई भाषाओं में पढ़ने और पढ़ाने के लिए अपलोड की। इस समय के दौरान हिमाचल प्रदेश पूरे भारत में पहला राज्य बना जिसने कोरोना के लंबे समय तक चलने के खतरे को शुरू में ही भांप लिया।

 हिमाचल सरकार ने लॉकडाउन के एक सप्ताह के अंदर ही सभी स्तर के बच्चों के लिए ऑनलाइन औपचारिक शिक्षा ‘हर घर पाठशाला’ कार्यक्रम शुरू करके प्रदेश की सभी पाठशालाओं को ऑनलाइन शिक्षा से जोड़ दिया। शिक्षा विभाग ने इस कार्यक्रम  को बहुत ही साधारण तकनीक द्वारा शिक्षा जगत के क्षेत्र से जुड़े सभी अध्यापकों, विद्यार्थियों और अभिभावकों तक पहुंचाया है। कोरोना काल के शुरुआत के  पहले सप्ताह के अंत में ही प्रदेश के 95 फीसदी (लगभग 15000) स्कूलों को व्हाट्सएप से जोड़ा, जिसमें 70 फीसदी (लगभग 800000) विद्यार्थियों को उनके अध्यापकों से जोड़ दिया। यही नहीं, सौ से अधिक अध्यापकों का सहयोग लेकर कक्षा प्रथम से कक्षा बारहवीं तक के सभी छात्रों के लिए विषयवार ऑनलाइन शिक्षण सामग्री तैयार की। ‘हर घर पाठशाला’ कार्यक्रम में प्रतिदिन सुबह 8.30 से 9.30 के बीच बच्चों को दैनिक शिक्षण सामग्री व्हाट्सएप के माध्यम से भेजी जाती है। दिन के समय अध्यापकों ने उस शिक्षण सामग्री को पढ़ाया व बच्चों की समस्याओं का समाधान ऑनलाइन ही किया। इस कार्य को ऑनलाइन ही मॉनिटर भी किया गया और प्रारंभ के दूसरे सप्ताह तक राज्य के 60 फीसदी से अधिक सरकारी छात्रों ने प्रतिदिन वेबसाइट खोली।

 बच्चों के साथ किए कार्य की प्रतिदिन बयालीस हजार के करीब अध्यापकों ने अपनी रिपोर्ट भी जमा करवाई। इस कार्यकाल में न केवल छात्रों के लिए, बल्कि अध्यापकों के पढ़ाने के कौशल में सुधार, बच्चों के साथ संवाद स्तर की गुणवत्ता में सुधारने के लिए ऑनलाइन अध्यापकों को प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की गई। इसमें 5300 अध्यापकों ने प्रशिक्षण सत्र में भाग लिया और 28000 कोर्स पूर्ण कर लिए। प्रारंभिक इन सब प्रयासों के बावजूद जो प्रारंभिक स्तर के सरकारी स्कूलों के छात्र जो अधिकतर गरीब व अनपढ़ परिवार पृष्ठभूमि से हैं, जिनमें कुछ परिवार इस पेंडेमिक काल में अपने कार्य स्थल पर कार्य छूट जाने के कारण स्थान बदला है, उन्हें घर पर पढ़ाने की सुविधा नहीं मिल पाई। उनमें से कई परिवारों के पास स्मार्टफोन नहीं था। इंटरनेट में रिचार्ज नहीं करवा पाए या नेट का सिग्नल नहीं होने के कारण अपनी पहले की पढ़ाई को भी भूल रहे हैं। लिखने का अभ्यास कार्य, जो अध्यापकों द्वारा लगातार करवाया जाता था, उसमें गिरावट आई है।

 पेंडेमिक के इस काल के गुजर जाने के बाद भी  इस तरह से हुई खाली परिपाटी को पूरा करने के लिए लंबे समय तक प्रयास करने होंगे। जहां कोविड-19 महामारी ने देश की शिक्षा व्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है, वहीं इस दौरान शिक्षा के क्षेत्र में ऑनलाइन शिक्षण प्रशिक्षण की बहुत सी संभावनाओं को जन्म भी दिया है। इस दौरान विभिन्न डिजिटल तकनीक के उपयोग ने सरकार और शिक्षा के क्षेत्र के हिस्सेदारों को मुक्त और दूरस्थ शिक्षा के दरवाजे खोले हैं। यदि कोविड-19 की महामारी लंबी भी चलती है तो समय की मांग है कि ऑनलाइन शिक्षा को और सुदृढ़ किया जाए, ऑनलाइन शिक्षण  को प्रभावशाली ढंग से व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। सभी बच्चों तक  शिक्षण के साधन संपन्न संसाधनों से सुलभ पहुंच बनानी होगी, जिससे बच्चे न केवल अपनी डिग्री ही हासिल कर सकें, अपितु उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, ऐसे प्रबंधन की आवश्यकता है।

जोगिंद्र सिंह

लेखक धर्मशाला से हैं

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