अब ठंडा ठंडा कूल कूल

By: Jul 21st, 2021 12:05 am

कल चातक हो मरे पंखे की ओर विवश नजरों से देखते भर श्रावण मासे पसीना पसीना हुई, पंखे के बदले अपनी चुनरी से अपने को हवा करती पत्नी ने अपने मुखड़े का पसीना पोंछ मुझ पर फेंकते कहा, ‘सुनो जी! क्या जनहित में ऐसा नहीं हो सकता कि…’ उसके मुंह से पहली बार जनहित शब्द सुन मेरे कान खड़े हो गए। ‘जन हित में बोले तो…’ ‘जनहित के नाम पर विपक्ष तक के मुहों पर तो मास्क लग गए, पर एक ये कलमुंहा सूरज अभी भी मुंह पर बिन मास्क घूम रहा है। इससे कहो कि जनहित में मुंह पर मास्क लगाए जो महामारी से बचना, जग को बचाना है तो।’ ‘इससे क्या लाभ होगा?’ ‘जो उसके मुंह पर एक बार मास्क लग गया तो वह सावन में देह झुलसा देने वाली आग कहां से उगलेगा?’ ‘पर मैं तो अपने पड़ोसी के मुंह तक पर आज तक मास्क नहीं लगवा पाया और फिर ये तो…’ ‘हो सकता है पड़ोसी से समझदार ये सूरज हो’, उसने बेसिर पैर का बेदिमागी लॉजिक दिया तो मैंने डरते हुए भी उसकी आज्ञा को सनातन मानते सूरज के मुंह पर मास्क लगाने की ठान ली। …और अगली सुबह मैं जनहित में सूरज से पहले जाग गया। नहाया धोया। स्मार्ट दिमाग का न होने के चलते अपने को बाहर से स्मार्ट बनाया। अपने नाक से नीचे आकर्षक सा मास्क लगाया और हाथ में चाय का कप पकड़े सूरज का इंतजार करने लगा। ज्यों ही सूरज ने आसमान में आधा कदम भर धरा तो मैंने उससे सादर पूछा, ‘नमस्कार सूरज भाई! कैसे हो?’ ‘राम! राम! कल से आज कुछ और तेज हूं।’ ‘वैरी गुड! खुदा करे! तुम्हारा तेज दिन दुगना रात सौ गुणा यों ही बढ़े। सावन में एक बूंद भी न बरसे। तुम दिन को तो दिन को, रात को भी पत्थर तक का पसीना निकाले रहो।

 पर ये क्या!’ अचानक मैंने संवादीय करवट बदली। ‘क्या?’ पूछते पूछते सूरज चौंका। ‘पूरी दुनिया ने महामारी के डर से सावधानियों से परहेज करते हुए भी आधे पौने मुंह पर मास्क लगाया है और एक तुम बिन मास्क के।’ ‘तो क्या हो गया! मैं सूरज हूं। नेता और सूरज से सब डरते हैं। हम मास्क लगाते नहीं, मास्क लगवाते हैं।’ ‘क्या तुम्हें नित रूप बदलते वायरस से सच्ची को डर नहीं लगता?’ ‘किस वायरस से?’ ‘अरे भैया! वही वायरस जिसने दुनिया के इस छोर से लेकर उस छोर तक तहलका मचा रखा है। उस वायरस से जिससे मृत्युलोकी तो मृत्युलोकी, स्वर्गलोकी तक डर गए हैं। नरक में वायरस से मर सजा भोग रही आत्माएं उतनी नरक की यातनाओं से नहीं डर रहीं, जितनी मरने के बाद भी इस वायरस से डरी हुई हैं। …और अब सुना है कि महामारी की तीसरी लहर आ रही है, जो पिछली दोनों लहरों से भी खतरनाक होगी।’ जितना सूरज को डरा सकता था, मैंने उतना उसे अपनी ओर से डरा दिया। ‘तो?’ ‘तो क्या!’ ‘उससे क्या कोई बचाव है दोस्त?’ आखिर सूरज पूरा का पूरा मेरे चंगुल में फंसा। ‘हां! है।’ मैं पत्नी रोगी एमडी हुआ। ‘क्या?’ ‘लो अपने मुंह पर मेरा ये मास्क लगाओ और महामारी से फ्री हो जाओ।’ मैंने अपने मुंह से  मास्क खोला और उसकी ओर उछाल दिया। उसने इस अहसान के लिए मेरी ओर अपने दोनों हाथ जोड़े और अपने मुंह पर मेरा मास्क लगा लिया। अब उसका जो हो, सो हो! उसके मुंह पर मास्क लगते ही उसका उसके मुंह से आग उगलना बंद हो गया। देखते ही देखते तब मत पूछो रत्नसेन के वियोग में तड़पती नागमती की तरह सूरज की आग उगलती गर्मी में कोयला राख होती बीवी को कितनी ठंडी ठंडी कूल कूल राहत मिली।

अशोक गौतम

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