शिक्षकों का सामाजिक मूल्यांकन

इस व्यवस्था को चलाने के लिए अनेकों परिश्रमी, ईमानदार, समर्पित तथा कर्मठ अध्यापक निरंतर समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं जिन्हें ढूंढने की आवश्यकता है। शिक्षक के गौरव तथा आत्मसम्मान से विपरीत ऐसे असंवेदनशील वक्तव्य उसकी आत्मा को चीर कर छलनी कर देते हैं। साथ ही शिक्षक भी आत्मचिंतन व आत्म-विश्लेषण करें…

यह सत्य है कि राष्ट्र निर्माण में बहुत से व्यक्तियों तथा समाजों का योगदान होता है। शिक्षक राष्ट्र के निर्माणकर्ताओं का निर्माता कहा जाता है। चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री के जीवन निर्माण में शिक्षक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। जहां प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरुओं का मान-सम्मान होता रहा है, वहीं पर कभी-कभी उनका अपमान भी होता रहा है। एक बात निश्चित है कि जिस समाज में गुरु का अपमान या निरादर होता है उस समाज का पतन हो जाता है। प्राचीन परंपरा के आचार्य, गुरु, शिक्षक, अध्यापक के रास्ते होते हुए अब वर्तमान में ‘मास्टर’ हो चुके हैं जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। पूर्व से ही शिक्षकों को प्रतिष्ठित व्यक्तियों, नेताओं तथा समाज के लोगों के तीखे शब्दों या व्यंग्य बाणों का शिकार होना पड़ा है। यह सब सभ्य, शिक्षित तथा विकसित  समाज के स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। कभी ‘अध्यापकों पर शिकंजा कसने’, ‘अध्यापक नपेंगे’, ‘मास्टरों के मजे’ तथा कभी उनके वेतन, बचत या आयकर पर एक आम आदमी से लेकर शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा टिप्पणी होती है। आखिर हम अपने घर में पढ़ रहे बच्चे को उसके शिक्षक के बारे में संदेश देना चाहते हैं। अध्यापक कोई चुनौती देने, डराने, धमकाने, खिल्ली उड़ाने, व्यंग्य  तथा मस्खरी करने का पात्र नहीं है। इस तरह के व्यंग्य बाणों तथा असंवेदनशील टिप्पणियों से उसे भी पीड़ा होती है। वर्तमान भौतिकवादी समाज, धन-सम्पन्न तथा राजनीतिक प्रभाव ने

उसके कद तथा छवि को बौना कर दिया है। समाज में सभी व्यक्ति तथा व्यवसाय सम्मानीय होते हैं। इस तरह के ग़ैर जि़म्मेदार, अनादर के भाव, अशिष्ट भाषा एवं व्यवहार, असंवेदनशील मानसिकता का समाज में संचार करते हैं। दुनिया में कोई व्यक्ति किसी भी पद पर बैठा है यह उसके अध्यापक की कृपा से ही संभव है। गुरु की कृपा, आशीर्वाद या शाप का भविष्य की पीढि़यों तक प्रभाव होता है। सामाजिक व्यवस्था में सभी का  सहयोग एवं योगदान रहता है। अध्यापक ज्ञान-दान के साथ समाज को नेतृत्व प्रदान करता है। अध्यापक को कम आंकने से किसी का भला नहीं हो सकता। समाज को शिक्षक की भूमिका का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए। कोरोना संक्रमण की वैश्विक महामारी ने सभी को हिला कर रख दिया। इससे कोई भी व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।

 देश में कोई युद्ध हो, बाहरी चुनौती हो या सीमा पर खतरा हो, देश का जवान सबसे आगे रहकर चुनौती को स्वीकार करता है। ज्ञान-विज्ञान तथा आविष्कार में वैज्ञानिक झंडा बुलंद करता है। राजनीतिज्ञ देश को दिशा प्रदान करते हैं। अन्न संकट में किसान अपना पसीना बहाता है। कला तथा खेल में कलाकार तथा खिलाड़ी देश का मस्तक ऊंचा करते हैं। रोग तथा महामारी की स्थिति में चिकित्सक योद्धा बन जाते हैं। ज्ञान, शिक्षा तथा सामाजिक सरोकारों के लिए अध्यापक समाज निर्माण कार्य करता है। कोरोना काल में जहां डाक्टर, नर्स, स्वास्थ्य कर्मचारी तथा सफाई कर्मचारी अग्रणी थे, वहीं पर कारोबारियों, व्यापारियों, किसानों, राजनेताओं, अध्यापकों तथा सभी समाजों ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संकट के समय में अध्यापकों ने अपनी अग्रणी एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस काल में अध्यापक सरकार द्वारा अनिवार्य घोषित छुट्टी में भी  मोर्चों पर दिन-रात डटा रहा है। इस संकट के समय में अध्यापकों ने पाठशाला के स्थान पर अपने घर को ही पाठशाला बना दिया। घर में शिक्षण सामग्री तैयार करना, विद्यार्थियों के लिए प्रेषित करना, पाठ्य सामग्री को घर-घर भेजना, बच्चों के किए गए गृह कार्य का अवलोकन करना, दूरभाष, वीडियो, व्हाट्सएप तथा सूचना प्रौद्योगिकी के संसाधनों गूगल मीट, ज़ूम के माध्यम से विद्यार्थियों तथा विभाग के संपर्क में रहना, हर घर पाठशाला के कार्यक्रमों तथा साप्ताहिक प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम से शिक्षण कार्यक्रम का संचालन करना, क्वारंटाइन सेंटर में ड्यूटी, मिड डे मील का राशन वितरण, बच्चों को पुस्तकों तथा वर्दी का वितरण, अस्पतालों तथा टीकाकरण अभियान में नियुक्तियां, सरकार, सचिवालय, शिक्षा निदेशालय, प्रारंभिक शिक्षा, जिला प्रारंभिक तथा उच्च निदेशालय, एनसीईआरटी, एससीईआरटी, समग्र शिक्षा अभियान के कार्यक्रम, राष्ट्रीय सेवा योजना, स्काउट एवं गाइड, एनसीसी के माध्यम से समाज सेवाएं प्रदान करना, अभिभावकों के पास मोबाइल एवं कनैक्टिविटी सिग्नल की सूचनाएं संकलित करना, ई-पीटीएम का आयोजन, दृष्टि अभियान, फिट इंडिया कार्यक्रम, पंचायत तथा नगर संकाय चुनाव में  ड्यूटी, स्वैच्छिक सेवाएं देना, बैरियर पर चैकिंग ड्यूटी, महामारी से निपटने के लिए सरकार के आदेशों से वेतन कटौती करवाना तथा स्वैच्छिक दान देकर अध्यापक भी संकटकाल में समाज, प्रदेश तथा देश के लोगों के साथ तन, मन तथा धन से खड़ा रहा है। इस परिस्थिति में अध्यापक  नियमित ऑनलाइन शिक्षण कार्य करने के साथ-साथ प्रशासनिक तथा शिक्षा अधिकारियों की अनेकों वांछित जानकारियां प्रेषित करने के साथ निरंतर तथा दिन-रात संपर्क में रहा है।

 शिक्षकों की भूमिका का मूल्यांकन, विश्लेषण तथा अवलोकन करने के लिए एक स्वच्छ तथा पारदर्शी चश्मे की आवश्यकता है। इस व्यवस्था को चलाने के लिए अनेकों परिश्रमी, ईमानदार, समर्पित तथा कर्मठ अध्यापक निरंतर समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं जिन्हें ढूंढने की आवश्यकता है। शिक्षक के गौरव तथा आत्मसम्मान से विपरीत ऐसे असंवेदनशील वक्तव्य उसकी आत्मा को चीर कर छलनी कर देते हैं। शिक्षकों को भी समाज से संवेदनशील व्यवहार, आदर तथा सम्मान की आशा रहती है। व्यवस्था में सभी लोग बेईमान, ग़ैर-जि़म्मेदार तथा भ्रष्टाचारी नहीं होते। वर्तमान उत्पन्न चुनौतियों तथा चर्चाओं की पृष्ठभूमि में कुछ कारण भी अवश्य होते हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। शिक्षकों को इन कारणों पर चिंतन कर अपने आपको पूर्ण रूप से व्यवसायिक, चरित्रवान, अनुकरणीय तथा उदाहरणीय रूप से समाज के सम्मुख प्रस्तुत करना चाहिए। उन्हें भी अपने आचरण, कार्य शैली में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। शिक्षा के दृष्टिकोण से वर्तमान स्थिति सुखद नहीं है। शिक्षक भी आत्म-अवलोकन, आत्ममंथन, आत्मचिंतन तथा आत्मविश्लेषण करें।

प्रो. सुरेश शर्मा

लेखक नगरोटा बगवां से हैं

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