पत्थर नहीं, पुल

पीके खुराना By: Aug 19th, 2021 12:08 am

खेलों से रिटायर होने के बाद खिलाडि़यों की दशा अक्सर बहुत शोचनीय होती है और वो मकान खाली करवाने वाले, धमकी देने वाले, पैसे वसूल करवाने वाले, सैक्योरिटी गार्ड या बहुत हद तक डेयरी चलाने वाले और प्रापर्टी डीलर बनकर जीवन गुजारते हैं। डेयरी चलाना या प्रापर्टी डीलर बन जाना तो फिर अच्छी बात है, लेकिन बाकी के काम उनकी मेहनत और संघर्ष के मुकाबले में सम्मानजनक तो नहीं ही हैं। सरकार को तो इस विषय में कोई उपयोगी राष्ट्रीय खेल नीति बनानी ही चाहिए, पर अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार का ही मुंह न देखें बल्कि समाज के रूप में भी बच्चों की प्रतिभा को फलने-फूलने का मौका दें…

सफल होने से पहले हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा होता है। संघर्ष का वह समय कितना लंबा होगा, यह हर व्यक्ति के साधनों, संपर्कों, योग्यताओं और किस्मत पर निर्भर करता है। दुनिया किसी व्यक्ति को तब जानना शुरू करती है जब वह कुछ नया कर दिखाता है। तालियां तब बजती हैं, मैडल तब मिलते हैं जब कोई विजयी हो जाता है। जीत से पहले मेहनत है, अनुशासन है, संघर्ष है, उपेक्षा है, यहां तक कि अपमान भी है। सफलता और असफलता दो वयस्क शब्द हैं जो कई बार कई प्रतिभाशाली व्यक्तियों के जीवन में ज़हर घोल देते हैं। हम सबके साथ यही गड़बड़ है। असफलता को लेकर एक शिशु और एक वयस्क की प्रतिक्रियाओं में जमीन-आसमान का अंतर होता है। एक शिशु को असफलता से लज्जा नहीं आती, आत्मग्लानि नहीं होती, अपराध का बोध नहीं होता। चलना सीखने वाले बच्चे बार-बार गिरते भी हैं। साइकिल चलाना सीखते समय बच्चे कई बार लुढ़कते और चोट खाते हैं। चलते समय या साइकिल चलाना सीखते समय बच्चे सफलता या असफलता के बारे में भी नहीं सोचते, परंतु जब वयस्कों को खुश करना महत्त्वपूर्ण बन जाता है तो सफलता और असफलता के बीच गहरी रेखा खिंच जाती है। हम बच्चों को स्कूल का काम न करने पर धमकाते हैं, नाराज हो जाने की धमकी देते हैं, असफल हो जाने का भय पैदा करते हैं। मां-बाप और अध्यापक मिलकर बच्चों में इस हद तक भय पैदा कर देते हैं कि भय से ग्रस्त बच्चा अपने मस्तिष्क की शक्तियों का विकास करने के बजाय उनका विनाश करता चलता है।

भय, बुद्धि का दुश्मन है। वह हमारे दृष्टिकोण को, जीवन के प्रति उसकी सोच को प्रभावित करता है। इस सोच का दूसरा पहलू यह है कि जब तक कोई व्यक्ति सफल न हो जाए, हम उसकी लगन, मेहनत, संघर्ष आदि की कद्र नहीं करते और उसे सफल होने का वातावरण नहीं देते। खेती और बागबानी के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। यदि कोई पौधा किसी खास तरह के वातावरण में पनपता है तो हम उसे वैसा वातावरण देते हैं। बच्चों को फलने-फूलने और सफल होने के लिए जो सहिष्णु, सहयोगी और प्रेरणादायक वातावरण चाहिए वह वातावरण उपलब्ध करवाना सरकार और समाज की सामूहिक जि़म्मेदारी है। हमारे खिलाड़ी ओलंपिक से वापस आ गए हैं। आज हर भारतीय स्वर्ण पदक विजेता नीरज चोपड़ा के नाम से वाकिफ है, लेकिन क्या आज से एक माह पूर्व भी हम नीरज चोपड़ा को जानते थे? आज नीरज चोपड़ा पर करोड़ों की वर्षा हो रही है, लेकिन आज से एक माह पूर्व नीरज चोपड़ा की सामान्य आवश्यकताएं पूरी करने के लिए भी कितने लोग तैयार होते? इससे भी आगे की बात, एक राष्ट्रीय दैनिक में खबर छपी है, साथ में फोटो भी है। खबर यह है कि हमारी एक पूर्व ओलंपियन महिला एक कार पार्किंग में पर्चियां काट रही है। यह उस खिलाड़ी की दुर्दशा की तस्वीर है जिसने ओलंपिक में भाग लिया था। जो ओलंपिक जैसे स्तर पर नहीं पहुंच पाते उनका तो कहना ही क्या है? आज भी अगर हम बात करें तो जिन सात खिलाडि़यों ने टोक्यो ओलंपिक में पदक जीते उनके अलावा हम बाकी खिलाडि़यों के नाम तक नहीं जानते। एक समाज के रूप में यह हमारे खोखलेपन और पाखंड की सच्ची तस्वीर है। पदक मिल जाने के बाद खुशियां मनाते हुए नाचना और पदक न मिलने पर कोसना, यही दस्तूर बना लिया है हमने।

कभी हमने सोचा है कि हम इन खिलाडि़यों को आवश्यक सुविधाएं और प्रोत्साहन का वातावरण देने के लिए भी कुछ करते हैं क्या? खेल और खेलों से जुड़े पदक पाने वाले लोगों की पारिवारिक पृष्ठभूमि की ओर देखें तो एक और कड़ुवा सच सामने आता है। पदक पाने वाले ज्यादातर खिलाड़ी बहुत साधारण पृष्ठभूमि वाले लोग हैं। ज्यादातर खिलाड़ी अभावों, साधनहीनता और गरीबी से संघर्ष करते हुए इस ऊंचाई तक पहुंचते हैं। क्यों होता है ऐसा? आखिर क्यों है ऐसा? गरीब परिवारों के बच्चे, किसानों-मज़दूरों के बच्चे स्कूल जाते भी हैं तो घर में उन्हें प्रोत्साहन देने वाला, मार्गदर्शन देने वाला, पढ़ाई में सहायता करने वाला कोई नहीं होता। वो स्कूल जाते तो रहते हैं, पर पढ़ाई में बहुत आगे नहीं जा पाते। धीरे-धीरे उनका रुझान खेलों की तरफ हो जाता है। पढ़ाई में अरुचि और खेलों में रुचि के कारण वो छोटी-मोटी प्रतियोगिताओं में स्कूल का और बाद में कालेज का प्रतिनिधित्व करते हैं। खेल की ओर रुझान होने के कारण वे पढ़ाई की ओर ज्यादा ध्यान भी नहीं दे पाते। खेल के अभ्यास में ही उनका समय बीतने लगता है। कई बच्चे तो पढ़ाई बीच में छोड़कर मजदूरी वगैरह करते हुए भी खेलों में लगे रहते हैं। दूसरी ओर, संपन्न परिवारों और पढ़े-लिखे मां-बाप के बच्चे, सीए, डॉक्टर, इंजीनियर, सांइटिस्ट, मैनेजर, सीईओ बनने के लिए स्कूल-कालेज की पढ़ाई के अलावा कोचिंग में भी समय लगाते हैं। उनके पास खेलों की तरफ ध्यान देने के लिए समय ही नहीं होता।

मां-बाप का दबाव अलग से होता है कि सारा समय पढ़ाई में ही लगे। यही कारण है कि खेलों में जाने वाले बहुत से बच्चे गरीब घरों से होते हैं या ऐसे घरों से होते हैं जहां पढ़ाई का मतलब सिर्फ स्कूल जाना होता है। विडंबना यह है कि यदि ये बच्चे मैडल न जीत पाएं तो इनकी कोई पूछ नहीं होती और जीवन बहुत कष्टमय हो सकता है। ओलंपिक तक पहुंच जाने के बाद भी अगर कोई खिलाड़ी पार्किंग में पर्चियां काटने को विवश है तो हम सोच सकते हैं कि बाकी खिलाड़ी जिन्हें किसी भी कारण से किसी बड़े स्तर तक पहुंचने का मौका नहीं मिला, उनकी क्या दशा होती होगी। खेलों में राजनीति के कारण, भाई-भतीजावाद के कारण, लालफीताशाही के कारण भी बहुत से प्रतिभावान खिलाड़ी दम तोड़ देते हैं। कई बच्चे बहुत थोड़े अंतर से पीछे रह जाते हैं। हम उनके लिए क्या करते हैं, क्या कर सकते हैं, इन सवालों का जवाब दिए बिना यह उम्मीद करना बेकार है कि हमारे खिलाड़ी सचमुच कुछ ऐसा कर पाएं कि विकसित देशों और चीन की बराबरी कर सकें। खेलों से रिटायर होने के बाद खिलाडि़यों की दशा अक्सर बहुत शोचनीय होती है और वो मकान खाली करवाने वाले, धमकी देने वाले, पैसे वसूल करवाने वाले, सैक्योरिटी गार्ड या बहुत हद तक डेयरी चलाने वाले और प्रापर्टी डीलर बनकर जीवन गुजारते हैं। डेयरी चलाना या प्रापर्टी डीलर बन जाना तो फिर अच्छी बात है, लेकिन बाकी के काम उनकी मेहनत और संघर्ष के मुकाबले में सम्मानजनक तो नहीं ही हैं। सरकार को तो इस विषय में कोई उपयोगी राष्ट्रीय खेल नीति बनानी ही चाहिए, पर अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार का ही मुंह न देखें बल्कि समाज के रूप में भी बच्चों की प्रतिभा को फलने-फूलने का मौका दें ताकि हम हर क्षेत्र में विश्व गुरू बन सकें। पढ़ाई के अलावा खेलों, संगीत, नृत्य आदि में रुचि रखने वाले बच्चों पर हम पत्थर न फेंकें बल्कि उनके लिए पुल बनाएं ताकि वो वहां पहुंच सकें जहां उनकी प्रतिभा उनको ले जा सकती है। आमीन!

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

ईमेलः [email protected]

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