पीके खुराना

बस इतना ही याद रखना काफी है कि बदलाव की शुरुआत जागरूकता से होती है। जब हमें यह समझ आ जाए कि मन पहले से निर्णय बना लेता है, तो हम छोटे-छोटे कदम उठा सकते हैं। बस जरा रुककर सोचें कि क्या मैं सच में विकल्प देख रहा हूं, या सिर्फ अपने फैसले को सही ठहरा रहा हूं? इसके लिए आवश्यक है कि हम सामने वाले की बात को धीरज से सुनना सीखें, खासकर रिश्तों में। बिना अपना कोई जवाब तैयार किए सुनें। तसल्ली से सुनें। कम से कम बोलकर सुनें। बिना टोके सुनें, और फिर अपने विचारों पर सवाल करें कि क्या मेरी ये सोच सही है, क्या ये सचमुच मेरी ही सोच है या कहीं से सीखी हुई है। थोड़ा रुक कर फिर सोचें। ईमानदारी से विश्लेषण करें। अपने विचारों को परखने के लिए अपने आप को समय दें। हर निर्णय तुरंत लेना जरूरी नहीं होता। आदर्श स्थिति यह है कि हम जागरूक हों और यह समझ लें कि हमारे ज्यादातर फैसले अचानक नहीं होते, वे धीरे-धीरे बनते हैं और उनके पीछे हमारी धारणाओं, अनुभवों और समाज का प्रभाव बहुत बड़ा होता है...

जब हम यह स्वीकार करते हैं कि मैं अभी नहीं जानता, तब ही जानने की संभावना पैदा होती है। जो पहले से मान बैठा है, उसके लिए सीखने को कुछ बचता ही नहीं। इसलिए ‘मैं न मानूं’ कहना वास्तव में यह स्वीकार करना है कि मैं अभी यात्रा में हूं। यह ठहराव नहीं, यह गति है। यह वह विनम्रता है जो कहती है- हो सकता है मेरी आज की समझ अधूरी हो, और कल उसमें कुछ और जुड़ जाए। यह भाव व्यक्ति को छोटा नहीं करता, बल्कि भीतर से व्यापक बनाता है। गृहस्थ जीवन में भी यही दृष्टि संतुलन लाती है। परिवार में, समाज में, कार्यक्षेत्र में जब हम हर बात को अंतिम सत्य मानकर पकड़ लेते हैं, तब टकराव बढ़ता है और जब हम यह स्थान छोड़ते हैं कि शायद सामने वाला भी कुछ देख रहा है जो मुझे नहीं दिख रहा, तब संवाद जन्म लेता है। ‘मैं न मानूं’ संवाद का द्वार है, संघर्ष का नहीं। यह हमें कठोर नहीं, लचीला बनाता है, और लचीलापन कमजोरी नहीं, परिपक्वता का चिन्ह है...

इसके लिए पहले हमें अपने भीतर झांकना पड़ेगा क्योंकि जो माता-पिता खुद भीतर से घायल हैं, वही अनजाने में अपने बच्चों को भी घायल कर देते हैं। दुख की सबसे बड़ी खासियत यही है- वह वंशानुगत हो जाता है।

अगर हम पेड़ न काटें, जंगल न काटें, पशुओं के लिए घास के मैदानों पर नाजायज कब्जा करके उन्हें कंक्रीट के पहाड़ों में न बदलें तो इन पशु-पक्षियों को हमारी किसी और सहायता की आवश्यकता ही न हो। मजे की बात ये कि फिर हम इन्हें ‘बचाने’ और संरक्षित करने की प्रक्रिया को ‘पुण्य’ बना लेते हैं, धर्म बना लेते हैं और मंचों पर चढक़र पाप और पुण्य की दुहाई देते हैं। ये मक्कारी और नौटंकी सिर्फ हम इनसान ही करते हैं। कैसी विडंबना है कि जिस पेड़ पर चिडिय़ा रहती थी, वो पेड़ काटकर हमारे लिए फ्लैट बना, फिर हम फ्लैट में एक कटोरा पानी और थोड़ा सा दाना रखकर गौरैया की सेवा करने लगते जाते हैं। जहां गाय चरती थी उस मैदान में हमारे बच्चों को पेड़ काटकर, उस लकड़ी के कागज से बनी किताबें रटाने के लिए स्कूल बन गया और अब हम गाय को रोटी खिला कर पुण्य कमा रहे हैं। इस पृथ्वी के पशु-पक्षियों को हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं है। हमने प्राकृतिक जीवन जीना छोड़ दिया है...

जीवन का एक बहुत सरल नियम है, जो इनसान की पूरी दुनिया बदल सकता है। मन की बात कह मन में रखने के बजाय कह देनी चाहिए। उसे हम भीतर न दबाएं। चि_ी लिखें तो भेज भी दें। बहुत देर होने से पहले ही कह भी दें और याद रखें कि जीवन में मिले लोगों और ईश्वर की कृपाओं के प्रति अपना प्रेम और आभार बिना झिझक जताते रहें। हमारा हृदय आधुनिक स्मार्ट फोन की टच-स्क्रीन की तरह का है। इसे टच करते रहें, छूते रहें, मन को सहलाते रहें, दुलारते रहें तो प्रेम बना रहेगा, रिश्तों की मिठास बनी रहेगी। मां-बाप की व्यस्तता के बीच अकेलेपन से जूझ रहे बच्चे जब अपने मन की बात किसी को नहीं कह पाते तो गलत राहों

जब हम बार-बार उसी एक पर ध्यान लगाते हैं, तो हमारा मन शांत होने लगता है, क्योंकि अब वह इधर-उधर भटक नहीं रहा होता। यही एकाग्रता की शुरुआत है, यही ध्यान की पहली सीढ़ी है। बाबा बुल्ले शाह के भीतर जो परिवर्तन आया, वह किसी किताब से नहीं आया, वह अनुभव से आया। यह अनुभव तब जन्म लेता है जब हमारा अहंकार टूटता है। हमने अपने पूरे व्यक्तित्व को उसी के इर्द-गिर्द बना रखा है। हम जो भी करते हैं, उसमें हमेशा ‘मैं’ छिपा होता है- मैं जानता हूं, मैं कर सकता हूं, मैं श्रेष्ठ हूं। लेकिन आध्यात्मिक मार्ग पर यही ‘मैं’ सबसे बड़ी दीवार बन जाता है। ‘रब दा की पाणा? एधरों पुट्टणा ते ओधर लाणा।’ यह वाक्य अपने आप में पूरा अध्यात्म है। हम यदि इसे गहराई से समझें, तो पाएंगे कि इसमें कोई जटिल साधना नहीं है, कोई कठिन तपस्या नहीं है। केवल एक बात कही गई है, अपना ध्यान जहां अभी

चाहे सीमित स्तर पर ही सही, पर लिव-इन रिलेशनशिप तो पहले ही स्वीकृति पा चुका है। धीरे-धीरे वह स्थिति आ ही जाएगी जब कोई संबंध ‘अवैध’ नहीं रह जाएगा। वैध-अवैध का अंतर ही समाप्त हो जाएगा और इन पर ऐतराज करने वालों को दकियानूसी करार दे दिया जाएगा। मनोविज्ञान के नजरिये से कहूं तो ऐसे संबंधों में कई तरह की समस्याएं आती हैं। अक्सर यह ब्लैकमेलिंग पर समाप्त होता है, पैसे का नुकसान होता है, इज्जत जाती है, जेल हो सकती है और दुनिया तमाशा देखती है। कई बार लड़कियां ऐसे रिश्तों में भावनात्मक रूप से भी जुड़ जाती हैं, लेकिन रिश्ता टिकाऊ न होने के कारण ब्रेकअप हो जाता है और लडक़ी डिप्रेशन में चली जाती है...

वर्तमान को जीवंत रूप में जीना ही साधना का द्वार है, परमात्मा तक पहुंचने की शुरुआती सीढ़ी है। न अतीत में सत्य है, न भविष्य में, वह इस क्षण की पूर्णता में है। आध्यात्मिक यात्रा में परतें हटती हैं। संस्कार, भय, अपेक्षाएं, अहंकार, सब एक-एक कर सामने आते हैं। यदि हम धैर्यपूर्वक उन्हें देखते रहें, तो वे स्वयं विलीन होने लगते हैं। वही आत्मानुभव है। वहां किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं, क्योंकि अनुभव स्वयं प्रमाण है, तब जीवन स्वयं साधना बन जाता है और प्रत्येक क्षण उसी प्रकाश का विस्तार। सत्य कोई दूर की वस्तु नहीं है। वह इस श्वास में है, इस क्षण में है, इस जागरूकता में है। हम यदि साहस करें, तो बाहरी सहारे छोडक़र भीतर की ज्योति को पहचान सकते हैं, और जब भीतर दीपक जलता है तब जीवन केवल जीना नहीं, एक उत्सव बन जाता है...

बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, बूंद-बूंद से सागर भरता है। निरंतर प्रयत्न सफलता का मंत्र है। यहां एक और गहरी बात समझने योग्य है। जब हम परिणाम-केन्द्रित होते हैं, तब हम हमेशा भविष्य में जीते हैं। सोचते रहते हैं कि जब यह हो जाएगा तब सुख मिलेगा। ऐसे में हम यह भूल जाते हैं कि बहुत से काम ही ऐसे हैं जिनका भविष्य कभी आता ही नहीं। तब जीवन लगातार टलता रहता है। इसके विपरीत, जब हम अभ्यास-केन्द्रित होते हैं, तब वर्तमान में जीना शुरू करते हैं। आज का काम, आज की साधना, आज की

अभी हम सोचते हैं कि हम ही जीवित हैं और बाकी सब संसाधन हैं। यही अहंकार हमें प्रकृति से अलग करता है, पर जब हम देखेंगे कि पत्थर भी जीवित है, जल भी जीवित है, तब हम अलग कैसे रह सकते हैं? तब हम ब्रह्मांड के साथ साझेदारी में जीएंगे। तब जीवन एक संघर्ष नहीं रहेगा, एक उत्सव बन जाएगा। सच तो यह है कि यह पूरा ब्रह्मांड एक नृत्य है। इलेक्ट्रॉन नृत्य कर रहे हैं, ग्रह नृत्य कर रहे हैं, हमारी धडक़नें नृत्य कर रही हैं। और इस नृत्य में कोई मृत नहीं। मृत्यु केवल एक विराम है, एक ताल का बदलना है। संगीत चलता रहता है। हम उस संगीत को सुनना सीख जाएं तो हमें हर वस्तु में जीवन का स्पर्श मिलेगा। अंतत: हम ऐसा जानेंगे कि ‘जीवत सब संसार’ कोई सिद्धांत नहीं, एक दृष्टि है। यह दृष्टि हमें विभाजन से एकत्व की ओर ले जाती है। जब हम इस एकत्व को जीते हैं, तब हम केवल जीवित नहीं रहते, हम जीवन बन जाते हैं...