आज के समय में शिक्षकों की प्रासंगिकता

आज के युग में जब औपचारिक शिक्षा जीवन का मुख्य कार्य बन चुकी है, गुरु की महत्ता और बढ़ गई है। जीवन की जटिलता बढऩे के साथ-साथ गुरु की भूमिका भी नए आयाम प्राप्त कर रही है। उसके लिए जरूरी कुशलताओं की सूची भी व्यापक हो रही है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप 21वीं सदी के उपयुक्त कौशलों के विकास के लिए एक सशक्त, कर्मठ, समर्पित अध्यापक श्रृंखला तैयार करने की महती आवश्यकता है…

भारतीय सभ्यता में गुरुओं को ईश्वर से भी ऊपर का दर्जा दिया गया है। हमारे धर्म शास्त्र वेद पुराणों में गुरु की महिमा का बखान किया गया है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान बहुत ही आदरणीय है। गुरु ज्ञान और शिष्य को जोडऩे का एक पुल है। गुरु अपने ज्ञान रूपी अमृत से शिष्य के जीवन में साक्षरता से लेकर उसके सर्वांगीण विकास को हर स्तर पर दिशा ही नहीं देता, बल्कि शिष्य के जीवन में धर्म और चरित्र जैसे बहुमूल्य गुणों को भी सिंचित करता है। उसके जीवन को सही दिशा व अर्थ प्रदान करता है। पौराणिक काल से ही गुरु ज्ञान के प्रसार के साथ समाज के विकास का बीड़ा उठा रहे हैं। गुरु अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला सशक्त माध्यम होता है। शिक्षा ही एक ऐसा दीपक है, जिसकी लौ में न केवल व्यक्ति के अंदर निहित शक्तियों का विकास होता है, बल्कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण व विकास होता है। विश्व के अन्य देशों से शिक्षार्थी हमारे गुरुकुलों, नालंदा, विक्रमशिला आदि में, विद्यार्जन करने आते थे। भारत को विश्व स्तर की इस ख्याति तक ले जाने का कार्य गुरुओं ने किया है। इसी कारण भारतीय समाज में शिक्षकों को सम्मान का विशेष दर्जा सदियों से रहा है। शिक्षाविद और देश के दूसरे राष्ट्रपति श्री सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि यदि उनका जन्मदिन मनाना ही है तो वह शिक्षकों के सम्मान दिवस के रूप में मनाया जाए। वे स्वयं एक शिक्षक थे और और बेहतर राष्ट्र के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने विश्व मानचित्र पर भारतीय दर्शन को सम्मान का दर्जा दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई। शिष्य के मन में सीखने की इच्छा को जो जागृत कर पाते हैं, वही शिक्षक कहलाते हैं। शिक्षक के द्वारा व्यक्ति के भविष्य को बनाया जाता है एवं शिक्षक ही वह सुधार लाने वाला व्यक्ति होता है।

प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार शिक्षक का स्थान भगवान से भी ऊंचा माना जाता है, क्योंकि शिक्षक ही हमें सही या गलत के मार्ग का चयन करना सिखाता है। शिक्षक आमतौर से समाज को बुराई से बचाता है और लोगों को एक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति बनाने का प्रयास करता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि शिक्षक अपने शिष्य का सच्चा पथ प्रदर्शक है। आज के इस तकनीकी से लैस युग में शिक्षक का कार्य क्षेत्र बहुत व्यापक हो चुका है। देश व समाज को नई पीढ़ी से बहुत ज्यादा अपेक्षाएं हैं। सामान्य रूप से गुरु और शिक्षक में यह अंतर है कि गुरु कोई भी हो सकता है। आध्यात्मिक गुरु, किसी कला विशेष का, किसी तकनीकी या किसी और क्षेत्र का। यह भी आवश्यक नहीं कि वह किताबी ज्ञान से संपन्न हो। जो अंत: ज्ञान के प्रकाश से आलोकिक कर दे, बस वही गुरु है या जिस संदर्भ में शिष्य को ग्रहण किया है, उसको भली-भांति शिक्षा दे। लेकिन आधुनिक अर्थों में शिक्षक का अर्थ केवल वह है जो विद्यार्थी को पढ़ा दे, अच्छे अंकों में सफलता दिलवा दे। आज लगभग शिक्षक के इसी स्वरूप को देखा जा रहा है जो कतई भी सही नहीं है। समय के साथ-साथ व्यवस्था बदली। हम कभी मनन करते हैं और पाते हैं कि समाज में शिक्षकों की गरिमा का ह्रास हुआ है। वैसे तो दूसरे व्यवसाय में लगे लोगों की गरिमा में भी ह्रास दिखाई देता है, लेकिन शिक्षकों के संदर्भ में यह अधिक चिंता का विषय है।

क्योंकि शिक्षक हमारे संविधान की आत्मा की प्राप्ति में समता, समानता, न्याय पर आधारित समाज के निर्माण और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। स्कूल यदि वंचित बच्चों को शत-प्रतिशत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं, तो क्या इसके लिए मुख्य रूप से दोषी शिक्षक ही हैं या पूरा शिक्षा तंत्र? सिखाने वाले गुरु के प्रति सम्मान प्राकृतिक है। जब एलकेजी या यूकेजी के स्तर के बच्चे को उसका शिक्षक गलती से 2 जमा 2 पांच सिखा दे तो घर में उस बच्चे के मां-बाप 2 जमा 2 चार नहीं कर पाते, क्योंकि बच्चे को अपने अध्यापक पर ज्यादा विश्वास होता है। माता-पिता अपने बच्चे के साथ घर में कहते हैं कि वे अध्यापकों के साथ उसकी शिकायत कर देंगे, ऐसा कह कर कई चीजें सिखाते हैं, कई गलत आदतों को अध्यापकों के साथ कह देंगे, ऐसा कहकर सुधार करते हैं। इसके मूल में डर या भय नहीं है, बल्कि बच्चा अध्यापक के सम्मान के साथ-साथ, अध्यापक की नजर में अपने आप को भी अच्छा रखना चाहता है। यह बहुत आवश्यक है कि गुरु-शिष्य के पवित्र रिश्ते की समझ की गरिमा को कम न होने दिया जाए। अभिभावक यदि अध्यापक का उपहास करेंगे तो बच्चा भी अध्यापक को कुछ नहीं समझेगा और न ही उससे कुछ सीख पाएगा। बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, उसे अध्यापक के व्यवहार में कथनी व करनी के अंतर को समझने के लिए कोई समय नहीं लगता।

वह उस अमुक अध्यापक के प्रति अपनी धारणा भी बना लेता है। सही आदर्शवादी अध्यापक का, किसी बच्चे के सिर पर रखा हाथ उसे जीवन में कहीं से कहीं पहुंचा देता है। गुरु के स्मरण और वंदन की परंपरा भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। आषाढ़ महीने की पूर्णिमा तिथि गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। गुरु को सृष्टा ब्रह्मा, पालक विष्णु और संहारकर्ता महेश्वर ही नहीं, बल्कि ‘परम ब्रह्म परमेश्वरÓ भी स्वीकार किया गया है। इस तरह गुरु को स्मरण करते हुए गुरु की उस व्यापक भूमिका को रेखांकित किया गया है जो एक अबोध मनुष्य को रूपांतरित करते हुए सक्षम और योग्य आकार देता है। आज के युग में जब औपचारिक शिक्षा जीवन का मुख्य कार्य बन चुकी है, गुरु की महत्ता और बढ़ गई है। जीवन की जटिलता बढऩे के साथ-साथ गुरु की भूमिका भी नए आयाम प्राप्त कर रही है। उसके लिए जरूरी कुशलताओं की सूची भी व्यापक हो रही है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप भारतीय भाषा, ज्ञान, कला और स्थानीयता पर बल देते हुए 21वीं सदी के उपयुक्त कौशलों के विकास के लिए एक सशक्त, कर्मठ, समर्पित अध्यापक श्रृंखला तैयार करने की आवश्यकता है। उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखना देश के विकास व उन्नति के लिए आवश्यक है।

जोगिंद्र सिंह

लेखक धर्मशाला से हैं

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