शिक्षा, जो शिक्षार्थी के आचरण में समा जाए

शिष्यों के जीवन में अपने उच्च आदर्शों व अपने ज्ञान की अमिट छाप छोड़ने वाले हमारे महान आचार्यों के ज्ञान की प्रमाणिकता आज भी हमारे ग्रंथों में कायम है। उन शिक्षकों के प्रसंगों से शिक्षक व शिक्षार्थी बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपनी संस्कृति के अनुकूल शिक्षा पद्धति के अनुसरण की जरूरत है…

‘जब तक शिक्षा, शिक्षार्थी के आचरण में न उतर जाए, तब तक शैक्षिक ज्ञान अधूरा रहता है’। शिक्षा के संदर्भ में यह प्रसंग हजारों वर्ष पूर्व भारत के महान शिक्षाविद रहे आचार्य ‘बहुश्रुति’ का है। आचार्य बहुश्रुति ने अपने आश्रम में शिष्यों की शिक्षा पूर्ण होने पर अंतिम परीक्षा के अवसर पर इस प्रसंग का जिक्र किया था। भारत में सन 1962 से 5 सितंबर को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस तथा ‘यूनेस्को’ द्वारा सन 1994 से 5 अक्तूबर को ‘विश्व शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। मगर भारत में शिक्षा, शिक्षक व शिष्य की संस्कृति का गौरवशाली इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। कई सिद्धांतों पर आधारित विश्व की सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रणाली ‘गुरुकुल’ भारतीय शिक्षा पद्धति का आधार स्तम्भ रही थी। गुरुकुलों में ज्ञान साधना छात्र जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होता था। श्रावण मास की पूर्णिमा से गुरुकुलों में शिक्षण सत्र शुरू होता था जो पौष मास की पूर्णिमा तक निरंतर चलता था। इसलिए शैक्षिक ज्ञान के मद्देनजर ‘श्रावण पूर्णिमा’ का भी बहुत महत्त्व रहा है।

 वैदिक काल से शिक्षा सशक्तिकरण का केन्द्र रहे गुरुकुलों ने भारतीय शिक्षा प्रणाली को पूरे विश्व में पल्लवित किया था। हमारे मनीषियों द्वारा संस्कृत में रचित विश्व का सबसे बड़ा साहित्य तथा विश्व के सबसे श्रेष्ठ शिक्षक, दार्शनिक, बेहतरीन विश्वविद्यालय इसी भारतवर्ष में हुए। 64 कलाओं के सर्वज्ञानी श्री कृष्ण जी ने ‘संदीपनी ऋषि’ के उज्जैन स्थित गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण की थी। प्रयागराज में महर्षि ‘भारद्वाज’ का आश्रम तथा चित्रकूट में महर्षि ‘अत्रि’ का गुरुकुल शिक्षा के विख्यात केंद्र थे। इसके अलावा महर्षि वाल्मीकि, विश्वामित्र, गौतम, उद्दालक, अष्टावक्र तथा याज्ञवल्क्य जैसे महान ऋषिगणों के गुरुकुलों से हजारों उच्चकोटि के शिष्यों ने शिक्षा ग्रहण की थी। ‘नैमिषारण्य’ में 10 हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल का संचालन करने वाले महर्षि ‘शौनक’ को विश्व के पहले कुलपति होने का गौरव हासिल था। महर्षि परशुराम व उनके शिष्य गुरु द्रोणाचार्य धर्मशास्त्र, धनुर्विद्या व शस्त्र संचालन में सबसे श्रेष्ठ आचार्यों में शुमार थे। अपने शिष्यों को शस्त्र व शास्त्र में सर्वश्रेष्ठ बनाने में हरदम प्रतिबद्ध रहने वाले उन आचार्यों के शोध पर आधारित ज्ञान की सीमा किताबी ज्ञान से कहीं अधिक थी। चंद्रगुप्त को श्रेष्ठ शासक बनाने वाले अर्थशास्त्र व कूटनीति के ज्ञाता आचार्य चाणक्य भी इसी भारत में हुए।

बेशक आज के दौर में कैम्ब्रिज, हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालयों की गिनती दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में होती है, मगर भारत में दो हजार वर्ष पूर्व नालंदा, तक्षशिला, पुष्पगिरी, वल्लभी, उदांतपुरी, जगद्दला, वाराणसी, कांचीपुरम, मणिखेत व शारदापीठ जैसे विख्यात विश्वविद्यालय थे। इन्हीं शिक्षा केन्द्रों में एक ‘सोमपुरा’ (बांग्लादेश) विश्वविद्यालय को यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल कर चुका है। भारत के उन प्रतिष्ठित शिक्षा केन्द्रों में भारतीय तथा विदेशी छात्रों के लिए शिक्षा ग्रहण करना सम्मानजनक उपलब्धि माना जाता था। शिक्षा की गुणवत्ता के पैमाने पर दुनिया में श्रेष्ठ उन शिक्षा केन्द्रों में वेद, दर्शन, योग, ज्योतिष, आयुर्वेद सहित साठ से अधिक विषयों का अध्ययन व अध्यापन संस्कृत भाषा में होता था। विभिन्न प्रकार के साहित्य की लाखों पुस्तकों से संग्रहित ‘रत्नोदधि’ पुस्तकालय नालंदा विश्वविद्यालय में ही मौजूद था। इन शिक्षा केन्द्रों में पढ़ने वाले हजारों विदेशी छात्रों ने प्राचीन भारतीय साहित्य की सैकड़ों पुस्तकों को अपने देशों में पहुंचा दिया था। इसलिए आज भी जर्मनी के ‘हीडलबर्ग’ तथा अमरीका के  ‘हार्वर्ड’ सहित दुनिया के कई अन्य विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में ‘इंडोलॉजी’ विषय शामिल है। लेकिन विडंबना है कि प्राचीनकाल से शिक्षा का गौरवमयी अतीत होने के बावजूद भारत में सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा के अधिकार के लिए कानून व शिक्षा नीतियां तथा साक्षरता अभियान चलाने पड़ते हैं। कई उम्मीदवारों की योग्यता को आरक्षण का सहारा देना पड़ रहा है। हाल ही में विश्व के उच्च शिक्षा संस्थानों की जारी ‘क्वालिटी रिसर्च’ रंैकिंग के अनुसार दुनिया के टॉप सौ शिक्षण संस्थानों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। दरअसल बर्तानवी हुकूमत ने पश्चिमी शिक्षा का वर्चस्व कायम करने के लिए अंग्रेजी भाषा को भारतीय शिक्षा प्रणाली में योजनाबद्ध तरीके से शामिल किया था। शिक्षा क्षेत्र में अंग्रेजी विषय की बडे़ पैमाने पर दखलअंदाजी से हमारे मनीषियों द्वारा रचित सम्पूर्ण ज्ञानकोश ग्रंथ पाठ्यक्रमों से दूर हुए तथा पारंपरिक शिक्षा पद्धति भी हाशिए पर चली गई।

 वर्तमान में शिक्षा एक व्यवसाय का व्यापक रूप ले चुकी है। कोचिंग व ट्यूशन कल्चर को अच्छी शिक्षा हासिल करने का जरिया माना जाता है। ज्यादातर अभिभावक निजी शिक्षण संस्थानों व कोचिंग तथा ट्यूशन की महंगी फीस देने में असमर्थ हैं। नतीजतन ग्रामीण क्षेत्रों की कई प्रतिभाएं उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं। हालांकि हिमाचल प्रदेश देश के सबसे साक्षर राज्यों में शुमार करता है। हमीरपुर जिला पूर्ण साक्षरता हासिल कर चुका है, मगर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा। अतः हमारे शासकों को समझना होगा कि छात्रों के समग्र व्यक्तित्व को विकसित करने तथा सफलता का मुकाम हासिल करने का माध्यम उच्च दर्जे की शिक्षा है। सन 1966 में शिक्षा के लिए गठित कोठारी आयोग ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा की पैरवी की थी तथा शिक्षा नीति 2020 में भी भारतीय पारंपरिक ज्ञान का विशेष उल्लेख है। स्मरण रहे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले संस्कार मातृभाषा से ही मिलते हैं। ज्ञान का सृजन कराने वाली गुणात्मक शिक्षा ही सवालों व उच्च विचारों को जन्म देती है तथा आरक्षण अयोग्यता को बढ़ावा देता है। इसलिए आरक्षण की बैसाखियां हटाकर आर्थिक तौर पर कमजोर प्रतिभाओं को शिक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर व सशक्त बनाने में सरकारी प्रयास होने चाहिए ताकि प्रतिभाएं परिश्रम करके संघर्ष के लिए प्रेरित हो सकें। बहरहाल शिष्यों के जीवन में अपने उच्च आदर्शों व अपने ज्ञान की अमिट छाप छोड़ने वाले हमारे महान आचार्यों के ज्ञान की प्रमाणिकता आज भी हमारे ग्रंथों में कायम है। उन शिक्षकों के प्रसंगों से शिक्षक व शिक्षार्थी बहुत कुछ सीख सकते हैं। मातृभाषा से परिपूर्ण अपनी संस्कृति के अनुकूल उसी शिक्षा पद्धति के सिद्धांतों का अनुसरण करने की जरूरत है जिसमें राष्ट्र धर्म का अधिमान मौजूद था।

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

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