प्रताप सिंह पटियाल

विश्वभर के वैज्ञानिक हमारे आचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों का अध्ययन करके शोध करते आए हैं। मौजूदा दौर में शारीरिक व मानसिक समस्याओं का कारण भौतिक सुख-सुविधाएं व आधुनिक जीवनशैली है। अतः सकारात्मक ऊर्जा का संचार तथा फिटनेस का माध्यम केवल योग है… सृष्टि की शुरुआत से ही सांस्कृतिक धरातल व कई सभ्यताओं की जन्मस्थली रहे

प्रकृति व पर्यावरण की पैरवी करने वाले हिमालय के आंचल में बसे हिमाचल के वनों पर गर्मी के मौसम में सबसे बड़ी गर्दिश आगजनी है। चूंकि चीड़ व आग का चोली-दामन का साथ रहा है। पर्यावरण संरक्षण में वनों के साथ जंगली जानवर भी अहम किरदार निभाते हैं। चीड़ के पेड़ों को रुखसत करें… प्रकृति

यदि सरकार भारत की प्राचीन खेल विरासत कुश्ती को राष्ट्रीय खेल घोषित करे तो वैश्विक स्तर पर भारतीय कुश्ती की लोकप्रियता व सम्मान यकीनन बढे़गा। युवा पहलवानों का कुश्ती के प्रति उत्साह बढ़ने से कुश्ती की पदक तालिका में भी इजाफा होगा… पारंपरिक कुश्ती लड़ने वाले पहलवानों व कुश्ती के शौकीन लाखों दर्शकों के लिए

सुविधा सम्पन्न लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए खुद को पिछड़ा साबित करना व गरीब बनने की जहनियत से बाहर निकालना होगा। मुल्क के सियासी रहवरों को समझना होगा कि देश की युवा ताकत को लोक लुभावन सियासी वादे, प्रलोभन व मुफ्तखोरी की खैरात नहीं चाहिए… ‘यावज्जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतम्

पुस्तक दिवस पर ‘यूनेस्को’ को समझना होगा कि दुनिया का सर्वप्रथम ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ है। विश्व में सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत व श्रीमद्भगवद गीता से बड़ी कोई पुस्तक नहीं हुई तथा महर्षि वाल्मीकि, वेद व्यास, पाणिनी, अथर्वा ऋषि, महात्मा विदुर, आचार्य चाणक्य, गोस्वामी तुलसीदास व कालीदास से बड़ा कोई लेखक नहीं हुआ… यूनेस्को ने

आज सेना की कई बटालियन उन्हीं रियासतों के नाम से जानी जाती हैं, मगर हिमाचल की किसी रियासत का नाम सेना की यूनिट से नहीं जुड़ा तथा राज्य ‘हिमाचल रेजिमेंट’ के लिए भी मोहताज रह गया। राज्य अपना 75वां स्थापना दिवस मना रहा है। इस अवसर पर क्रांतिवीरों को याद किया जाना चाहिए… पांच हजार

‘वेदों की ओर लौट चलो’ का नारा देने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती तथा सन् 1893 में शिकागो की विश्व धर्म महासभा में भारत की महान् संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाले वेदांत के प्रखर प्रवक्ता व भारतीय दर्शन के अग्रदूत स्वामी विवेकानंद जैसे संन्यासी योद्धाओं के संदेश को समझना होगा… कोई भी देश अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था,

युद्धों की आहट से विश्व के सामरिक समीकरण बदल रहे हैं। लाजिमी है रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल किया जाए। सशस्त्र सेनाएं अचूक मारक क्षमता वाले आधुनिक हथियारों से लैस हों तथा देश की सियासी कयादत भी आलमी सतह पर कूटनीतिक लड़ाई में माहिर हो… ‘यदि आप शांति चाहते हैं तो युद्ध की

विडंबना है कि मतदान से देश का उज्ज्वल भविष्य तय होना चाहिए, मगर वोट की ताकत सियासी रहनुमाओं का मुकद्दर तय कर रही है। बहरहाल मौजूदा सियासत में हावी हो रही जाति, मजहब की चिल्मन को रुखसत करके देश की बुनियादी समस्याओं को राष्ट्रवाद के नजरिए से देखना होगा… ‘राजमहल की अटारियों में जनता की

सैनिकों की हिमस्खलन व एवलांच की चपेट में आकर मौत के आगोश में समाने की यह पहली घटना नहीं है, मगर देश की सीमाओं पर हजारों फुट की ऊंचाई पर मौजूद ग्लेशियरों की तरफ  ध्यान तभी आकर्षित होता है जब प्रतिवर्ष कई सैनिक बर्फीले तूफान की जद में आकर जिंदगी की जंग हार जाते हैं।