प्रताप सिंह पटियाल

श्रीराम ने अपने पूर्वजों का आदेश मानकर संपूर्ण वैभव व राजपाट त्याग कर आदर्श चरित्र स्थापित किया था। विजयदशमी के अवसर पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के उच्च चरित्र तथा समर्पण, सत्य व त्याग जैसे गुणों को अपनाने की जरूरत है। मगर ब्रह्म के वंशज प्रकांड पंडित रावण का पुतला दहन कितना जायज है, इस

शिष्यों के जीवन में अपने उच्च आदर्शों व अपने ज्ञान की अमिट छाप छोड़ने वाले हमारे महान आचार्यों के ज्ञान की प्रमाणिकता आज भी हमारे ग्रंथों में कायम है। उन शिक्षकों के प्रसंगों से शिक्षक व शिक्षार्थी बहुत कुछ सीख सकते हैं। अपनी संस्कृति के अनुकूल शिक्षा पद्धति के अनुसरण की जरूरत है… ‘जब तक

बहरहाल युद्ध नीति के अनुसार जब जंग लाजिमी हो तो लाव-लश्कर नहीं देखे जाते। रणक्षेत्र में कामयाबी कुशल सैन्य रणनीति, अदम्य साहस तथा तकनीकी सैन्य नेतृत्व पर निर्भर करती है। पुरुष वर्चस्व माने जाने वाले सैन्य मोर्चों पर महिला सैनिक ड्यूटी निभाने की पूरी सलाहियत रखती हैं। सैनिक स्कूलों में बालिका कैडेट्स का कोटा बढ़ाना

बहरहाल आतंक का मरकज बनकर दहशतगर्दी की रहनुमाई करने वाले मुल्कों पर विश्व समुदाय में खामोशी की रजामंदी चिंता का सबब है। अफगानिस्तान के हालात से सीख मिलती है कि जम्हूरियत की बुलंदी पर बैठे हुक्मरानों के जहन में राष्ट्रहित में सख्त फैसले लेने की पूरी ताकत होनी चाहिए… वर्तमान समय में अफगानिस्तान में तालिबान

विश्व के सर्वश्रेष्ठ हॉकी खिलाडिय़ों में शुमार करने वाले मेजर ध्यान चंद के हॉकी में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस सम्मान की मांग दशकों से उठ रही है। इस विषय पर हमारे हुक्मरानों को अपनी खामोशी पर रुख स्पष्ट करना होगा… भारत के लिए

सरकारी संस्थानों में आरक्षण प्रणाली के चलते ‘डिजर्व’ उम्मीदवार पर ‘रिजर्व’ भारी पड़ जाते हैं। नतीजतन ज्यादातर कुशल युवा विदेशों या निजी क्षेत्रों में सेवाएं देने को मजबूर होते हैं। आरक्षण देश की उत्कृष्ट पात्रता के भविष्य पर कुठाराघात है जिससे योग्य प्रतिभागियों के जहन में आक्रोश की भावना बढ़ती है। प्रतिभाशाली युवा अगर उपेक्षित

पाक सेना द्वारा कैप्टन सौरभ कालिया व उसके साथियों की हत्या जेनेवा संधि 1949 के युद्ध-नियमों का सरेआम उल्लंघन था। उनकी शहादत के इंतकाम के बाद ही कारगिल विजय दिवस संपूर्ण होगा। बहरहाल कश्मीर हमारा है और हमारा ही रहेगा… इतिहास साक्षी रहा है कि कामयाबी के मजमून हमेशा कडे़ संघर्षों की बुनियाद पर ही

प्रकृति पूजन की प्रथा को धार्मिक व आध्यात्मिक मान्यताओं से जोड़ना पर्यावरण संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के वजूद को बरकरार रखने में हमारे मनीषियों की वैज्ञानिक सोच को दर्शाता है। इसलिए पौधारोपण व संवर्धन जैसे पुनित कार्य किसी विशेष अवसर के अलावा प्रतिदिन स्वेच्छा से होने चाहिए ताकि प्रकृति व पर्यावरण में संतुलन कायम रहे…

ऐसा नहीं है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत में प्रतिभाओं की कमी है या उच्च शिक्षण संस्थानों व मेडिकल कालेजों की दरकार है, लेकिन शिक्षा तंत्र व स्वास्थ्य सेवाओं पर निजी क्षेत्र का कब्जा होने से दोनों क्षेत्रों का व्यवसाय बेहद महंगा साबित हो रहा है। आम लोग दोनों क्षेत्रों

खेल संघों या अन्य खेल व्यवस्थाओं की कमान अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुभवी खिलाडि़यों को भी मिलनी चाहिए। देश का प्रतिनिधित्व कर रहे ज्यादातर खिलाडि़यों का संबंध ग्रामीण क्षेत्रों से है। यदि हमारे ग्रामीण कस्बों में स्कूलों से ही खेल प्रतिभाओं को तलाश कर उनके प्रशिक्षण पर तकनीकी खेल तंत्र विकसित किया जाए तो खेल मानचित्र