पहाड़ की शबनम पर नशे की गर्दिश

यदि मुल्क का मुस्तकबिल युवावर्ग किशोरावस्था से ही नशेमन का दामन थामकर इसकी दलदल में फंसकर जीवन के लक्ष्य से भटक जाए तो नए भारत के भविष्य की तस्वीर कितनी भयावह होगी, इस विषय पर मंथन होना चाहिए। अत: व्यक्तिगत विकास व देश के भावी कर्णधारों के बेहतर भविष्य के लिए अपराध मुक्त व नशामुक्त समाज का निर्माण जरूरी है…

मौजूदा दौर में कई गुनाहों की कहानी बयान कर रहा ‘नशा अभिभावकों की नींद उड़ाने वाला खौफ का दूसरा नाम बन चुका है। यह तथ्य है कि युवावेग बहुत जल्द इस जानलेवा नशे के खामोश हमले का शिकार होते हैं। ड्रग्स डीलर्स का सबसे साफ्ट टारगेट भी युवावर्ग ही होता है। इसी कारण देश की युवा पीढ़ी तेजी से नशे की इस खौफनाक सुनामी की चपेट में आ रही है। दूसरा तशवीशनाक पहलू यह है कि अध्यात्म व शौर्य का धरातल रहे देवभिूम के पहाड़ों पर नशीले पदार्थों की दस्तक ने यहां की शांत फिजाओं को भी मुतासिर कर दिया है। धार्मिक स्थलों व देश-विदेश के लाखों सैलानियों के लिए पर्यटन का आर्कषण बन चुके हिमाचल प्रदेश की वादियों में पिछले कुछ सालों कई विदेशी व बाहरी राज्यों के ड्रग्स तस्कर पनाह ले चुके हैं। इन्हीं ड्रग पैडलर्स के जाल में फंस कर राज्य के कई युवा नशे की जद में आ चुके हैं। प्रदेश में शहरों से लेकर गांव-देहात तक नशीले पदार्थों का फैल रहा अवैध कारोबार सभ्य समाज व सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।

केन्द्र से जारी ‘नशा मुक्त भारत की वार्षिक एक्शन प्लान रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के कुछ जिलों में नशा खतरनाक स्तर तक पांव पसार चुका है। राज्य में एनडीपीएस (नारकोटिक्स ड्रग्स साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) एक्ट के तहत दर्ज होने वाले 50 प्रतिशत केस हैरोइन जैसे नशे से संबंधित हैं, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर नशा सामग्री इतनी आसानी से उपलब्ध कहां से हो रही है। गौर रहे कि चार बड़े युद्धों में भारतीय सेना द्वारा शर्मनाक शिकस्त के दंश झेल चुके हमशाया मुल्क पाकिस्तान के नामुराद हुक्मरानों को यह इल्म हो चुका है कि पाक सेना सीधे तौर पर भारतीय सैन्य शक्ति के सामने नहीं टिक सकती। इसलिए आतंक की परवरिस में जुटी पाक खुफिया एजेंसी ‘आईएसआई ने भारत के खिलाफ अंतराष्ट्रीय सीमाओं व नियंत्रण रेखा से सटे सीमावर्ती राज्यों से दहशतगर्दी व नशीले तथा मादक पदार्थों की बड़े पैमाने पर तस्करी जैसी साजिशों को अंजाम देना शुरू कर दिया। सरहदों पर हमारे सुरक्षा बल करोड़ों रुपए की नशा सामग्री बरामद करके कई तस्करों को ढेर कर रहे हैं। सैन्य बलों की मुस्तैदी के आगे बेबस पाक सेना अवैध हथियारों के जखीरे व नशे की खेपों की भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ के लिए ‘ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक का सहारा ले रही है।

पाक सीमा से सटे इन राज्यों की सीमाएं हिमाचल से लगती हैं जहां से पर्यटन के लिए हजारों सैलानी राज्य का रुख करते हैं। राज्य में नशे की आमद व खपत तथा नशापूर्ति के लिए चोरी-डकैती जैसी घटनाओं से प्रदेश में क्राइम रेट का ग्राफ बढ़ रहा है। सलाखों के पीछे बैठे ज्यादातर लोग गैर कानूनी नशे के धंधे में मुल्लविश हैं। नशाखोरी की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 11 अक्तूबर 2021 को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर ‘सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के अधिकार क्षेत्र का दायरा 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर तक करने का बेहद महत्त्वपूर्ण फैसला लिया है। देश की सुरक्षा व्यवस्था को दरुस्त करने वाले इस कारगर फैसले को सियासत के झरोखों से देखने का अंदाज कुछ भी हो, मगर वर्तमान में प्रांतों से लेकर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैल चुका ड्रग तस्करी का अवैध धंधा राष्ट्र की सुरक्षा व आर्थिकी के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सियासी तकरार या तन्कीदगी के अश्क बहाने का कोई औचित्य नहीं है। जिन राज्यों में नशे के सरगनाओं की सबसे अधिक सक्रियता होने के कारण सर्वाधिक युवा आबादी को नशा अपनी गर्त में लेकर बर्बादी के मुहाने पर पहुंचाकर तबाही की तम्हीद लिख चुका है, जहां नशा निवारण चुनावी मुद्दा बनता है, वहां के सियासी गलियारों में नशीले पदार्थों पर लगाम लगाने वाले फैसलों का विरोध दुर्भाग्यपूर्ण है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय को चाहिए कि देश में अपराध को दावत देने वाले नशे के करोड़ों रुपए के काले कारोबार की अवैध तिजारत पर लगाम लगाने के लिए मुस्तैद ‘नारकोटिक कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) व ‘डाइरेक्टरेट ऑफ रेवन्यु इंटेलीजेंस (डीआरआई), प्रर्वतन निदेशालय (इडी) तथा कस्टम कमीशन जैसी तमाम सुरक्षा एजेंसियों का अधिकार क्षेत्र बढ़ाकर उन्हें और मजबूती प्रदान की जाए। सन् 1953 से प्रतिवर्ष ‘राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के निर्देशन में ‘क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट जारी होती है। इस रिपोर्ट में हर वर्ष मर्डर, दुष्कर्म, घरेलु हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं व डकैती जैसे संगीन अपराधों में इजाफा दर्ज हो रहा है। युवाओं में ज्यादातर निराशा व अवसाद में तन्हाई का आलम भी नशे की अलामत है। जब देश की अदालतों में नशे के खिलाफ व्यापक अधिनियमों व कड़े कानूनों का मसौदा मौजूद है तो उसकी नुमाईश नहीं बल्कि पूरी शिद्दत से आजमाइश भी होनी चाहिए। यदि मुल्क का मुस्तकबिल युवावर्ग किशोरावस्था से ही नशेमन का दामन थामकर इसकी दलदल में फंसकर जीवन के लक्ष्य से भटक जाए तो नए भारत के भविष्य की तस्वीर कितनी भयावह होगी, इस विषय पर मंथन होना चाहिए। अत: व्यक्तिगत विकास व देश के भावी कर्णधारों के बेहतर भविष्य के लिए अपराध मुक्त व नशामुक्त समाज का निर्माण जरूरी है। इसके लिए कानून, प्रशासन या सुरक्षा एजेंसियों पर ही निर्भर रहना काफी नहीं है, समाज व देशहित के इन विषयों पर पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों को भी योगदान देकर अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय देना होगा।

स्मरण रहे नशे से उपजे दर्दनाक जख्मों पर खामोश चीखों के साथ केवल मातम का ही मरहम नसीब होता है। इससे पहले कि नशा मखलूक बनकर युवाशक्ति को अपनी आगोश में लेकर बर्बादी का अफसाना बयान करे, समाज के सभी वर्गों को नशाखोरी के खिलाफ इस मुहिम में आवाज बुलंद करके नायाब सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात पहाड़ों की शांत शबनम पर दस्तक दे रही नशे की कालिख को मिटाना होगा। मासूमों का भविष्य तबाह करके नशे की काली कमाई से बेनामी संपत्ति का साम्राज्य खड़ा करने वाले नशा माफिया व उनके तीमारदारों पर सेना की तर्ज पर ‘आपरेशन ऑल आउट  जैसे माकूल अभियान की जरूरत है, बशर्ते शासन, प्रशासन व सुरक्षा एजेंसियां इच्छाशक्ति दिखाएं।

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

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