सांप्रदायिक चेहरे में बदलती कंगना रणौत

कलाकार को उसकी प्रतिभा व निभाए जा रहे किरदारों के बलबूते दर्शक प्यार करते हैं। कलाकार की पब्लिक लाइफ से भी वे प्रभावित होते हैं…

गत वर्ष जब मुम्बई में शिव सेना सरकार के इशारे पर नगर निगम ने कंगना रणौत के स्टूडियो को तोड़ा था तो समस्त देश में इस अभिनेत्री के पक्ष में सहानुभूति की लहर देखने को मिली थी। लेकिन कुछ समय बाद बाम्बे हाइकोर्ट ने कंगना के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें यह हिदायत भी दी थी कि वे अपनी बयानबाजी और बड़बोलेपन पर अंकुश लगाएं और स्वयं को संयम में रखें। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि कंगना को न तो न्यायपालिका की टिप्पणियों का सम्मान है, न ही महात्मा गांधी जैसे विश्व के महान व युगांतरकारी जननायक का। पद्मश्री से विभूषित होने के तुरंत बाद कंगना का यह कहना कि 1947 में देश को गांधी ने ‘भीख’ मांगकर आज़ाद करवाया था, अत्यंत शर्मनाक टिप्पणी है जिसकी अपेक्षा रानी झांसी का किरदार अदा करने वाली अभिनेत्री से कतई नहीं की जा सकती। यह विचारणीय है कि क्या कंगना पद्मश्री जैसे पुरस्कार की पात्र कलाकार है अथवा नहीं? कंगना ने यह भी कहा है कि सही मायने में देश 2014 के बाद आज़ाद हुआ है। कंगना के इस बेहूदा व अति निंदनीय बयान से देश भर में बवाल मचा हुआ है। हैरत इस बात की है कि भाजपा के शीर्ष नेता महात्मा गांधी को अपना आदर्श मानते हैं। मोदी जी गांधी की प्रशंसा में बार-बार उत्साहित होकर उनके देश व समाज के प्रति बहुमूल्य योगदान का ज़िक्र करना नहीं भूलते।

 लेकिन यह कम खेदजनक नहीं है कि भाजपा या संघ के किसी भी बड़े नेता ने कंगना की महात्मा गांधी व स्वतंत्रता प्राप्ति में आजादी के दीवानों के खिलाफ टिप्पणी की भर्त्सना नहीं की है। केवल वरुण गांधी का बयान आया है जिसमें उन्होंने कहा है, ‘कभी महात्मा गांधी जी के त्याग और तपस्या का अपमान, कभी उनके हत्यारे का सम्मान और अब शहीद मंगल पांडे से लेकर रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और लाखों स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियों का तिरस्कार। इस सोच को मैं पागलपन कहूं या फिर देशद्रोह।’ आम आदमी पार्टी की मुम्बई में नेत्री प्रीति ने मुम्बई पुलिस में अर्जी देकर कंगना के विरुद्ध देशद्रोह का मामला दायर करने को कहा है, धारा 504, 505 और 124-ए के तहत। शिव सेना की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी भी कंगना के विरुद्ध मुखर हैं और उनके विरुद्ध देशद्रोह की कार्यवाही चलाने की मांग की है। अगर किसी कांग्रेसी या आप पार्टी के नेता या किसी लेखक या बुद्धिजीवी ने महात्मा गांधी या देश की आज़ादी के विरुद्ध या फिर स्वतंत्रता सेनानियों के ़िखलाफ कथित देशद्रोही टिप्पणियां की होती तो भारत सरकार, भाजपा, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद या फिर संघ के लोग उसे पलक झपकते ही गिरफ्तार करवा देते और ऐसे लोग सलाखों के पीछे होते। देश हाल ही में भोपाल में बजरंग दल द्वारा फिल्म निर्देशक प्रकाश झा को अपमानित करने की घटना को नहीं भूला है। आज हम सब असहनशीलता की पराकाष्ठा के भयावह दौर में जी रहे हैं। चूंकि कंगना पूरी तरह भगवा रंग में डूबकर भाजपा और संघ का एजेंडा प्रोमोट कर रही हैं तो ये सभी लोग चुप्पी साधे हुए हैं। कंगना एक सैलिब्रिटी हैं और उनकी लोकप्रियता का ़गलत उपयोग या प्रयोग साम्प्रदायिक पार्टियां किस निर्लज्जता से कर रही हैं, उसकी पृष्ठभूमि में कंगना की गांधी और देश की आज़ादी के विरुद्ध बयाऩबाजी ही है।

 कुछ समय पहले जब वे शिवसेना व उसके प्रमुख उद्धव ठाकरे के विरुद्ध आक्रामक हुई थीं तो भाजपा को बैठै बिठाए एक ऐसी सिने तारिका मिल गयीं जो शिव सेना के विरुद्ध आग उगल सकें। और यही हुआ भी। वे भाजपा के ‘हिडन एजेंडा’ के प्रचार-प्रसार और शिव सेना के विरोध का मोहरा बनती चली गयीं। एक महिला होने के नाते उनके घर को तोड़े जाने के बाद वे सहानुभूति बटोरती चली गयीं। हिमाचल सरकार के मुख्यमंत्री की अनुशंसा पर कंगना को जै़ड प्लस सुरक्षा प्रदान की गयी थी। यानी पहले अपने विरुद्ध विवादों, विरोध व आलोचना का माहौल पैदा करो, फिर स्वयं को असुरक्षित घोषित करो और सुरक्षा के नाम पर सरकार को लाखों-करोड़ों की चपत। भारत में ईमानदारी से टैक्स अदा करने वाले लोगों के प्रति सरकारों की कोई जवाबदेही है या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर शायद कभी नहीं मिलेगा। कंगना का यह कहना कि देश को 2014 के बाद सही आज़ादी नसीब हुई, दर्शाता है कि वे भाजपा व मोदी जी की कथित तौर पर अंधभक्त हैं और सत्ता को खुश करने के लिए आए रोज ऊल-जुलूल बयानबाजी कर रही हंै। समाज का शायद ही कोई ऐसा तबका हो जिसके विरुद्ध कंगना ने बेसिर-पैर की तर्कविहीन टिप्पणियां न की हों। चूंकि वे सफल अभिनेत्री हैं और विवादों को जन्म देना कंगना का शौक है, इसलिए वे आए रोज़ मीडिया की सुर्खियां बटोरती रहती हैं।

बेहतर होता अगर मीडिया में उनकी फिल्मों में किए गए अभिनय को लेकर चर्चा होती, न कि देश विरोधी बयानबाजी के लिए। लेकिन पब्लिसिटी में बने रहना भी एक रोग है जिसका शायद कोई इलाज नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे कई छद्म लेखक छपास रोग से ग्रस्त रहते हैं, भले ही उनके लिखे को पाठक बार-बार नकराते रहें। ‘एनिमल फार्म’ और ‘1984’ जैसे उपन्यासों के महान लेखक जार्ज ऑरवैल ने लेखकों व कलाकारों के बारे में महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी, ‘सृजनकर्मियों यानी रचनाकरों व कलाकारों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। राजनीतिक विचारधारा को अंगीकार करने वाले क्रिएटिव लोग स्वयं का सर्वनाश कर बैठते हैं।’ निश्चित रूप से कंगना रणौत एक कामयाब फिल्म स्टार हैं, लेकिन कभी किसानों के आंदोलन के ़िखलाफ तो कभी आज़ादी के परवानों के खिलाफ उनका बड़बोलापन छवि को किस कदर धूमिल कर रहा है, इसका अहसास तक शायद उन्हें नहीं है। कलाकार को उसकी प्रतिभा व निभाए जा रहे किरदारों के बलबूते दर्शक प्यार करते हैं। लेकिन वे कलाकार की पब्लिक लाइफ से भी प्रभावित होते हैं। यानी कला के प्रदर्शन और जीवन में विरोधाभास हो तो उसे दर्शक ज्यादा देर पचा नहीं पाते। प्राण ने भले ही सैकड़ों फिल्मों में खलनायक की भूमिका अदा की हो, लेकिन वे निजी ज़िंदगी में एक निहायत नेक दिल इनसान थे जिनकी फैन फालोइंग करोड़ों में थी और आज भी बरकरार है। खेद का विषय है कि हिमाचल के भाजपा या कांग्रेस नेताओं ने कंगना के ताजा बयान का खास विरोध नहीं किया है, न ही यहां के लेखक व कलाकार ऐसे देशद्रोही बयानों के विरुद्ध मुखर हंै। ऐसा प्रतीत होता है कि कंगना की ही तर्ज पर साम्प्रदायिक विचारधारा से लैस कलाकार अगर भविष्य में अपने-अपने घरों में गोडसे की मूर्तियां स्थापित कर लें तो शायद राजनेता उसका विरोध तक नहीं करेंगे?

राजेंद्र राजन

वरिष्ठ साहित्यकार

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