अकाली दल की दशा और दिशा

पंथ का मोटे तौर पर अभिप्राय उन लोगों से है जो दशगुरु परंपरा के गुरुओं में विश्वास करते हैं और उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं। इसलिए पंथ में विश्वास करना और अकाली दल का सदस्य होना दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि दोनों को एक ही मान लिया जाए, फिर तो गुरू घर में विश्वास रखने वाला, श्री गुरुग्रन्थ साहिब में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति अकाली दल के अतिरिक्त किसी अन्य दल में जा ही नहीं सकता। यदि कोई मज़हबी दलित अकाली दल को छोड़ कर बाबा साहिब अंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हो जाता है तो अकाली की दृष्टि में तो वह पंथ को नुक़सान पहुंचाने वाला काम ही कहा जाएगा। पंजाब में खत्री समाज के अधिकांश लोग दशगुरु परंपरा में भी विश्वास करते हैं और श्री गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु भी स्वीकार करते हैं। अकाली दल की परिभाषा के मुताबिक़ तो उन्हें अकाली दल में ही होना चाहिए। यदि वे किसी दूसरे राजनीतिक दल में जाते हैं तो उनका यह कार्य पंथ को नुक़सान पहुंचाने वाला ही माना जाएगा।  खत्री समाज के लोग अकाली दल, कांग्रेस तथा दूसरे दलों में भी हैं…

पंजाब में विधानसभा के चुनाव घोषित हो जाने के बाद वहां विभिन्न दलों से इधर-उधर जाने का सिलसिला शुरू हो गया है। यह कमोबेश उन सभी प्रदेशों में हो रहा है जहां-जहां चुनाव होने वाले हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा के कुछ विधायक पार्टी त्याग कर समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी में चले गए हैं। कुछ और भी जा सकते हैं। इसी प्रकार समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी के विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं। यह आना-जाना अब किसी को आश्चर्यचकित नहीं करता। लेकिन पंजाब में जब यही आना-जाना होता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? इसको समझने के लिए पंजाब की राजनीति में थोड़ा गहरे उतरना पड़ेगा। अकाली दल का यदि कोई जाट विधायक या नेता पार्टी छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में या  कांग्रेस, आम आदमी पार्टी में शामिल होता है तो अकाली दल की प्रतिक्रिया यह नहीं होती कि यह राजनीतिक लिहाज़ से अनैतिक है। उसका यह भी नहीं मानना होता है कि यह अकाली दल को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश है। बल्कि  उसकी प्रतिक्रिया है कि यह पंथ को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश है। इसका अर्थ यह है कि कुछ लोग मानते हैं कि अकाली दल और पंथ एक ही हैं। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि अकाल तख्त के जत्थेदार का भी यही मानना है कि कुछ राजनीतिक दल पंथ को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। अकाली दल एक राजनीतिक पार्टी है और पार्टी के संविधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति उसका सदस्य बन सकता है। पंथ का मोटे तौर पर अभिप्राय उन लोगों से है जो दशगुरु परंपरा के गुरुओं में विश्वास करते हैं और उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलने का प्रयास करते हैं। इसलिए पंथ में विश्वास करना और अकाली दल का सदस्य होना दोनों अलग-अलग बातें हैं।

 यदि दोनों को एक ही मान लिया जाए फिर तो गुरू घर में विश्वास रखने वाला, श्री गुरुग्रन्थ साहिब में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति अकाली दल के अतिरिक्त किसी अन्य दल में जा ही नहीं सकता। यदि कोई मज़हबी दलित अकाली दल को छोड़ कर बाबा साहिब अंबेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी में शामिल हो जाता है तो अकाली की दृष्टि में तो वह पंथ को नुक़सान पहुंचाने वाला काम ही कहा जाएगा। पंजाब में खत्री समाज के अधिकांश लोग दशगुरु परंपरा में भी विश्वास करते हैं और श्री गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु भी स्वीकार करते हैं। अकाली दल की परिभाषा के मुताबिक़ तो उन्हें अकाली दल में ही होना चाहिए। यदि वे किसी दूसरे राजनीतिक दल में जाते हैं तो उनका यह कार्य पंथ को नुक़सान पहुंचाने वाला ही माना जाएगा। लेकिन खत्री समाज के लोग अकाली दल में भी हैं, कांग्रेस में भी हैं और  देश के दूसरे राजनीतिक दलों में भी हैं। जब से दिल्ली के मनजिन्दर सिंह सिरसा भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं, तब से अकाली पार्टी ने ‘पंथ को नुक़सान पहुंचाने’ का प्रयास और भी ज़ोर से कहना शुरू कर दिया है। हाल ही में पंजाब में एक नए राजनीतिक दल संयुक्त समाज मोर्चा ने जन्म लिया है जिसके नेता अस्सी वर्षीय बलबीर सिंह राजेवाल हैं। अब अकाली दल के कुछ लोग दशा और दिशा को देखते हुए इस मोर्चे की ओर भी भागने लगे हैं। अकाली दल के लिहाज़ से तो इससे भी पंथ ख़तरे में पड़ जाएगा। जबकि मोर्चा के कुछ लोगों का मानना है कि अकाली दल के कारण पंथ ख़तरे में है। जैसे-जैसे यह आकलन आने लगे हैं कि आम आदमी पार्टी का प्रभाव, ख़ासकर मालवा में बढ़ रहा है, तब से अकाली दल के भीतर से यह आवाज़ें भी आना शुरू हो गई हैं कि पंथ को सबसे ज्यादा ख़तरा आम आदमी पार्टी से ही है। लेकिन पंजाब को इस ख़तरनाक रास्ते पर ले जाने के लिए अकाली दल से भी ज्यादा दोष कांग्रेस को ही दिया जा सकता है। देश में से अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद कांग्रेस का यह प्रयास रहा कि कांग्रेस से इतर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को समाप्त किया जाए या फिर उनको कांग्रेस में ही विलीन कर लिया जाए। कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर में भी यही किया और पंजाब में भी यही किया। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कान्फ्रेंस को और पंजाब में अकाली दल को कांग्रेस में शामिल होने के लिए विवश किया।

 पैप्सु में 1952 में बनी सरकार को चलने नहीं दिया क्योंकि वह कांग्रेस की सरकार नहीं थी। इसी प्रकार 1957 के चुनावों तक आते-आते अकाली दल को इतना मरोड़ा कि दल को अंत में कांग्रेस में शामिल होना ही पड़ा। इससे अकाली दल को लगा कि कांग्रेस किसी भी हालत में उन्हें राजनीतिक धरातल पर और राजनीतिक स्वरूप में जीवित नहीं रहने देना चाहती। यही कारण था कि पार्टी ने अपने आप को पंथ की ढाल में कर लिया, क्योंकि वह ऐसा क्षेत्र था जहां कांग्रेस आक्रमण करने से परहेज़ करेगी। अब कांग्रेस फिर उसी पुराने रास्ते पर चल पड़ी है। उसने अकाली दल को घेरने के लिए बेअदबी का मामला उठाया है। यह मामला हल किया जाना चाहिए और दोषियों व षड्यंत्रकारियों को किसी भी हालत में सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कांग्रेस की रुचि सज़ा दिलवाने में कम, इस मुद्दे से अकाली दल पर आघात करने पर ज्यादा है। इतना तो सभी मानते हैं कि किसी पार्टी को भी यह मुद्दा वोट का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। लेकिन कांग्रेस वही कर रही है। केवल चंद वोट हासिल करने के लिए कांग्रेस ने हाल ही में हुए किसान आंदोलन को भी एक ख़ास वर्ग का आंदोलन बताने और बनाने में ज्यादा दिलचस्पी ली। क्योंकि यह आंदोलन केन्द्र की भाजपा सरकार के खिलाफ था, इसलिए पंजाब में कांग्रेस सरकार द्वारा यह प्रचारित किया गया मानों भारतीय जनता पार्टी सिखों के खिलाफ है। वोटों के लिए कांग्रेस पंजाब में ख़तरनाक ध्रुवीकरण करना चाह रही है। इससे पहले भी कांग्रेस 1980 में यह कर चुकी है जिसका खामियाज़ा केवल पंजाब को ही नहीं, बल्कि सारे देश को भुगतना पड़ा था। कांग्रेस फिर उसी राह पर चल पड़ी है और जाने या अनजाने में अकाली दल कांग्रेस के बिछाए इस जाल में फंसता नज़र आ रहा है। पंजाब में दोबारा हिंसात्मक गतिविधियां न फैले, इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को मिलकर काम करना चाहिए। यही पंजाब तथा देश के हित में होगा।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

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