नियमों के सरलीकरण की तरफ बढ़ता प्रदेश

भारत में नियामक भार कम करने की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरणों में है, परंतु संतोष की बात यह है कि आखिरकार प्रक्रिया शुरू तो हुई। हिमाचल में इस विषय को सरकार द्वारा गंभीरता से लिया जा रहा है। लगभग 44 विभाग इस कार्य में लगे हैं। शीर्ष स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक ‘‘टास्ट फोर्स कमेटी’’ का गठन किया गया है जो विभागों द्वारा की गई प्रगति का अनुश्रवण समय-समय पर करती रहती है। वर्तमान में प्रदेश पूरे देश भर में इस प्रक्रिया में चौथे स्थान पर चल रहा है। यदि देश को प्रगति करनी है तो वर्तमान नियमों का सरलीकरण इस प्रकार होना चाहिए कि निर्णय करने के स्तर पर मानव का दखल इसमें कम से कम हो…

आज के संदर्भ में ‘‘व्यापार में सुगमता’’ शब्द उद्यमियों के लिए बहुत अपरिचित नहीं है। वर्ष 2014-15 से चल रहे इन सुधारों की प्रक्रिया अभी भी जारी है, जिसके फलस्वरूप प्रदेश  पूरे देश में व्यापार में सुगमता के क्षेत्र में ‘‘17वीं पायदान’’ से ‘‘7वें’’ स्थान पर खड़ा है। इसे पहाड़ी राज्यों में बहुत तीव्र गति से आगे बढ़ने वाले प्रदेश के रूप में चिन्ह्ति किया गया है। कमोबेेश आज उद्यमी इस बात को स्वीकार करता है कि ‘‘सिंगल विण्डो पोर्टल’’ के माध्यम से व्यापार से संबंधित सभी विभागों द्वारा दी जाने वाली सेवाएं ‘‘ऑनलाईन’’ हो गई हैं व एक तय समय में दी जा रही हैं। इससे उद्यमी की परियोजना लागत व परियोजना स्थापित करने के समय में काफी कमी आई है। ‘‘व्यापार में सुगमता’’ के साथ-साथ ‘‘जीवन में भी सुगमता’’ एक अहम पहलू है। ‘‘एक देश-एक राशन कार्ड’’, का ही उदाहरण लें तो आज 75 करोड़ लाभार्थी देश के किसी भी कोने में रहते हुए राशन प्राप्त कर सकते हैं। यह कुल राशन कार्ड धारकों का लगभग 94.3 प्रतिशत बनता है। ऐसे ही ड्रार्विंग लाइसेंस, मोटर व्हीकल लाइसंेस व उनका नवीनीकरण भी अब ऑनलाईन हो गया है। एक आम व्यक्ति को अब बार-बार दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।

 उसका समय और पैसा बच रहा है। परंतु केन्द्रीय व राज्य स्तर पर अभी भी ऐसे हज़ारों नियम, कानून व प्रक्रियाएं हैं, जो आज के परिप्रेक्ष्य में या तो बहुत पेचीदा हैं या उनकी उपादेयता समाप्त हो गई है। फिर भी नियम व कानून के नाम पर उद्यमी अथवा एक आम नागरिक इन्हें ढोए जा रहा है। ‘व्यापार में सुगमता’ व ‘जीवन में सुगमता’ तभी आ सकती है, यदि इन नियम, कानून व प्रक्रियाओं को या तो कम किया जाए, समाप्त किया जाए या इनका सरलीकरण किया जाए। इसे ही नियामक अनुपालन भार (मिनिमाइजि़ंग रेगुलेटरी कम्पलाइंस बर्डन) को कम करना कहते हैं। जुलाई 2021 से केन्द्र सरकार के कैबिनेट सचिव की देख-रेख में ‘‘औद्योगिक संवर्धन व आंतरिक व्यापार विभाग’’ भारत सरकार की ओर से यह राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया चल रही है। हाल ही में 22 दिसंबर को दिल्ली  के ‘‘अंबेडकर  अंतरराष्ट्रीय केन्द्र’’ में वाणिज्य मंत्री की अध्यक्षता व कैबिनेट सचिव की उपस्थिति में सभी राज्यों के लिए नियामक अनुपालन भार कम करने संबंधी एक राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें सभी हितधारकों के साथ गहन विचार-विमर्श किया गया कि कैसे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए। आज लगभग 26,300 से अधिक नियम, कानून व प्रक्रियाओं को कम किया जा चुका है। यदि हिमाचल की बात की जाए तो 1600 से अधिक प्रक्रियाएं कम कर दी गई हैं। ‘‘नियामक अनुपाल भार’’ कम करने के अंतर्गत बहुत सी प्रक्रियाएं आती हैं जैसेः निरीक्षण प्रणाली का युक्तिकरण, लाइसंेस/ प्रमाण पत्र/अनुमतियों का स्वतः पुनः नवीनीकरण और नवीनीकरण की अवधि को बढ़ाना, अनावश्यक पाक्षिक/ मासिक/ त्रैमासिक/ अर्धवार्षिक व सालाना रिटर्नों को या तो समाप्त करना या उनका सरलीकरण कर उन्हें एक पेज का बनाना, अनावश्यक रजिस्टर व रिकॉर्ड रखने की बाध्यता समाप्त करना, सभी हस्तलिखित रिकॉर्ड, रजिस्टर व रिटर्नों का सरलीकरण कर उन्हें डिजिटाइज करना, बाबा आदम के ज़माने के नियम व कानूनों की पहचान कर उन्हें समाप्त करना तथा नवीनतम तकनीक का प्रयोग कर ‘‘सिंगल साइन ऑन’’ और ऑनलाईन प्रक्रियाओं को अपनाना इत्यादि।

 इसके अतिरिक्त ऐसे नियम व कानूनों की पहचान कर उन्हें समाप्त करना, जिनकी अवहेलना करने पर जेल की सज़ा तक का प्रावधान हो जैसेः चैक बाउंस होने पर जेल जाने तक की नौबत आ जाती है। जब हम नियामक अनुपालन भार कम करने की बात करते हैं तो इससे पूर्व इस बात का आकलन  अवश्य किया जाना चाहिए कि यह सब करके क्या-क्या गुणवत्ता में सुधार होगा? अथवा समय व धन की बचत होगी? अब तक हो क्या रहा है कि हम नियम, कानून बनाते जा रहे हैं, पर उनके समाप्त होने की निश्चित अवधि तय नहीं की जाती। फलस्वरूप पुराने नियम व कानूून बने रहते हैं और नए लागू होते रहते हैं, जिससे उद्यमी व नागरिक पर अनावश्यक बोझ पड़ता है व उसका जीवन कठिन हो जाता है। अतः नियम व कानून बनाते समय ‘वन इन- वन आउट’’ की नीति को ध्यान में रखना चाहिए व हर नियम व कानून के लागू होने व समाप्त होने (सन सैट पीरियड) की एक निश्चित समय सीमा होनी चाहिए। विश्व स्तर पर ऐसे देश, जो कि ‘‘व्यापार में सुगमता व जीवन में सुगमता’’ के क्षेत्र में अग्रणी हैं, इन उपरोक्त नियमों का पालन करते हैं। भारत में नियामक भार कम करने की प्रक्रिया अभी प्रारंभिक चरणों में है, परंतु संतोष की बात यह है कि आखिरकार प्रक्रिया शुरू तो हुई। हिमाचल में इस विषय को सरकार द्वारा गंभीरता से लिया जा रहा है। लगभग 44 विभाग इस कार्य में लगे हैं। शीर्ष स्तर पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक ‘‘टास्ट फोर्स कमेटी’’ का गठन किया गया है जो विभागों द्वारा की गई प्रगति का अनुश्रवण समय-समय पर करती रहती है। वर्तमान में प्रदेश पूरे देश भर में इस प्रक्रिया में चौथे स्थान पर चल रहा है। धीरे-धीरे यह बात सबकी समझ में आ रही है कि यदि देश को प्रगति करनी है तथा व्यवस्था को पारदर्शी बनाना है तो वर्तमान नियमों का सरलीकरण इस प्रकार होना चाहिए कि निर्णय करने के स्तर पर मानव का दखल इसमें कम से कम हो, सारी प्रणालियां कम्प्यूटरीकृत हांे जिसमें उद्यमी व आम नागरिक को वांछित सेवाएं निश्चित समय में प्रदान करने की गारंटी हो।

संजय शर्मा

लेखक शिमला से हैं

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