बेरोजगारी के सैलाब में प्रजातंत्र का भविष्य

बहरहाल मुल्क के रहबर हमारे शासकों को समझना होगा कि जम्हूरियत में सत्ता का मकसद लोगों पर हुकूमत नहीं होता, बल्कि निजी हितों को दूर रखकर समाज को सही दिशा व सुशासन देकर अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित करके राष्ट्रवाद की भावना से काम करना होता है…

भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ को ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ के रूप में मनाने की तैयारी कर रहा है। देश की आज़ादी के पीछे कई रक्तरंजित संघर्षों व असंख्य क्रांतिवीरों की कुर्बानियों का इतिहास छिपा है। अंग्रेजों के जुल्मोसितम तथा ‘बांटो व राज करो’ जैसी शातिराना नीतियों को रुखसत करके मुल्क से गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए सैकड़ों क्रांतिकारियों ने फांसी के फंदों को चूमकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। आजादी के बाद विशिष्ट प्रकार की शासन प्रणाली लोकतांत्रिक व्यवस्था की बहाली तथा अखंड भारत के निर्माण के लिए देश के राजाओं द्वारा अपनी 562 रियासतों का भारत में विलय के साहसिक व बेमिसाल त्याग को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। देश की ज्यादातर रियासतों पर राजपूत वर्चस्व कायम था। हिमाचल प्रदेश भी 30 पहाड़ी रियासतों के एकीकरण के बाद ही अस्तित्व में आया था। मगर देशहित में अपनी सल्तनतों व राजगद्दियों का त्याग करने वाले राजाओं तथा जंग-ए-आजादी के हजारों इंकलाबी युवा परवानों ने जिस लोकतंत्र की कल्पना की थी, क्या विश्व के सबसे बडे़ लोकतंत्र भारत में वो प्रजातंत्र कायम हुआ।

 यह अपने आप में एक प्रश्न है। आजादी के बाद से ही लोकतंत्र पर वंशवाद व वीआईपी कल्चर हावी हो गया था। यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। वर्तमान में भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी निवास करती है। देश के हुक्मरानों को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने में भी युवावर्ग ही अहम भूमिका निभाते हैं, मगर मुल्क की सूरत व सीरत तब्दील करने वाला देश की बुनियाद युवावेग आज बेरोजगारी के सैलाब में फंस कर कई दुश्वारियों के दौर से गुजर रहा है। सियासतदानों को अपने वोट की ताकत से जम्हूरियत की बुलंदी पर पहुंचाने वाले लोग चाहते हैं कि जमीनी हकीकत से जुडे़ उनके मुद्दों पर संसद में सकारात्मक चर्चा हो। चूंकि लोकतंत्र में संसद ही एक ऐसा मंच है जहां देश के विकास की योजनाओं का मसौदा तैयार होता है, मगर कई विषयों पर विवाद खड़ा होने से संसद के सत्र हंगामे की भेंट चढ़ जाते हैं। देश में पर्यावरण संरक्षण, किसानों व राहगीरों के लिए संकट का सबब बन चुके हजारों बेसहारा पशु, सरकारी शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, सरकारी इदारों में फैला रिश्वतखोरी व भ्रष्टाचार का वायरस, गुरबत से जूझ रहे लाखों लोग, नशाखोरी, आतंक, चरम पर बेरोजगारी व देश की प्रतिभाओं के भविष्य को कुचलने वाली व्यवस्था आरक्षण प्रणाली तथा देश में कई समस्याओं का कारण बन चुकी बेलगाम रफ्तार से बढ़ रही आबादी जैसे देशहित के मुद्दे कभी सियासी चर्चा का केंद्र नहीं बनते।

 इन मुद्दों पर सियासत घूंघट निकाल लेती है। देश में सियासी ताकत की नुमाइश के लिए ज्यादातर मजहब ही मुद्दा बनता है। लोगों को नैतिकता व अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले कई हुक्मरान सियासी जमीन की तलाश में अपनी चुनावी रैलियों से समाज में हिकारत का माहौल पैदा करने वाली जहरीली तकरीरों का प्रयोग करते हैं, जो कि राष्ट्र की अखंडता के लिए खतरनाक है। सियासी दलों द्वारा चुनावी घोषणा पत्रों में किए गए लोकलुभावन वायदे परवान न चढ़ने पर या सरकारों की गलत नीतियों के विरोध में जब लोग आक्रोशित होकर सड़कों पर आंदोलन के लिए उतर जाते हैं, तब हमारे हुक्मरान लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से व अपने विचारों तथा जज्बातों से विरोध का इजहार करने का मशविरा पेश करते हैं। बेशक लोकतंत्र में विरोध विचारों से होना चाहिए, मगर चुनावी मंचों से तल्ख तेवर व जज्बाती अंदाज में वोट एंठने में माहिर सियासतदानों को प्रजातंत्र के भविष्य युवावर्ग को लोकतंत्र में विरोध प्रकट करने वाले उन आदर्श व उच्च विचारों के काबिल बनाने के प्रयास भी करने होंगे। इसके लिए सरकारी शैक्षिक ढांचे को दुरुस्त व सुविधाओं से लैस करने की निहायत जरूरत है। उच्च दर्जे की शिक्षा प्राप्त करके ही मेधावी कामयाबी के शिखर पर पहंुचते हैं। गुणवत्तायुक्त शिक्षा की ताकत ही नई सोच व कई सवालों तथा समाज को गतिशीलता देने वाले उच्च विचारों को जन्म देती है। यदि देश के प्रतिभाशाली युवाओं को उचित मंच मिलेगा तभी उनके उच्च विचार आकार ले पाएंगे जो कि आरक्षण व्यवस्था के चलते असंभव है। लेकिन विदेशी कंपनियां भारत की उभरती प्रतिभाओं को परख कर उन्हें मंच प्रदान कर रही हैं। आज विश्व की कई बड़ी कंपनियों के ‘सीईओ’ के पदों पर भारतीय मूल के युवा विराजमान होकर भारत को गौरवान्वित कर रहे हैं।

 आलमी सतह पर भारत के सर्वश्रेष्ठ युवाओं की सरवराही तस्दीक करती है कि भारत की युवाशक्ति की काबिलियत में कोई कमी नहीं है, मगर विडंबना यह है कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर निखर रही भारत की प्रतिभाओं का लाभ देश को नहीं मिल रहा। योग्य डॉक्टर व इंजीनियर के रूप में भारत का टेलेंट पलायन करके दूसरे देशों में आशियाना तराश रहा है। हमारी सियासी लीडरशिप देश के यौवन को सही मार्गदर्शन करने में असमर्थ साबित हो रही है। आरक्षण व बेरोजगारी के जख्मों ने युवावर्ग की ताकत व काबिलियत का तवाजुन बिगाड़ दिया है। देश की योग्यता के साथ हो रहे अन्याय से उपजे सवालों पर मंथन होना चाहिए। कई सियासतदान संसद में मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा कर गांधी जी के मुजस्समे की शरण में जाकर अपने विरोध का इजहार करते हैं, मगर बेहतर होगा यदि सियासी रहनुमा गांधी जी के सत्य, अहिंसा जैसे सिद्धांतों व जीवन मूल्यों को अपने आचरण में शामिल करके जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। यदि विपक्ष अपनी भूमिका पूरी शिद्दत से निभाए तो जनप्रतिनिधियों को चुनने वाले लोगों को सड़कों पर आंदोलनों में अपना कीमती समय बर्बाद नहीं करना पडे़गा। बहरहाल मुल्क के रहबर हमारे शासकों को समझना होगा कि जम्हूरियत में सत्ता का मकसद लोगों पर हुकूमत नहीं होता, बल्कि निजी हितों को दूर रखकर समाज को सही दिशा व सुशासन देकर अपनी नेतृत्व क्षमता को साबित करके राष्ट्रवाद की भावना से काम करना होता है। हुक्मरानों को दलगत रियासत से ऊपर उठकर भारत के भविष्य युवावर्ग की बेरोजगारी का दर्द महसूस करके बेहतर साधन जुटाकर युवा पीढ़ी को योग्यता के अनुसार पर्याप्त रोजगार की सौगात देनी होगी।

प्रताप सिंह पटियाल

लेखक बिलासपुर से हैं

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