व्यवस्था का अभिशाप

By: Mar 31st, 2022 12:08 am

सवाल यह है कि समाधान क्या हुआ? क्या इस घटना के बाद सरकार ने कोई कार्रवाई की? क्या इस घटना के समय जिन विधायकों ने बलजीत यादव के समर्थन की घोषणा की थी, उन्होंने आगे कुछ और किया? सवाल इतना ही नहीं है। सवाल यह है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई कि एक विधायक सदन में लगातार एक समस्या का जि़क्र करते रहे हैं और सरकार निश्चिंत बैठी रही? इस समस्या के मूल में जाएं तो मालूम होगा कि हमारा संविधान ही ऐसा है कि सरकारों को लापरवाही की असीमित छूट देता है। समझने वाली बात यह है कि जो दल सत्ता में होगा, वह सत्ता होगा ही इस कारण से क्योंकि उसके पास बहुमत है। बहुमत के अभाव में विपक्षी दल न तो कोई कानून बनवा सकते हैं, न रुकवा सकते हैं और न ही किसी कानून में कोई संशोधन करवा सकते हैं। विपक्ष की बात तो छोडि़ए, सत्तारूढ़ दल के वे सदस्य जो मंत्रिपरिषद में नहीं हैं, वे भी शक्तिहीन प्यादे ही हैं…

आज से ठीक एक सप्ताह पहले यानी गुरुवार 24 मार्च को राजस्थान में एक अद्भुत घटना घटी। अपनी मांग मनवाने के लिए एक निर्दलीय विधायक ने अनोखा तरीका निकाला। बहरोड़ के निर्दलीय विधायक बलजीत यादव भर्ती परीक्षाओं में गड़बडि़यों के विरोध में लगातार 12 घंटे तक दौड़ते रहे। बलजीत यादव ने गुरुवार 24 मार्च को विधानसभा में अपने इस संकल्प का ऐलान किया था कि सरकार बेरोजगारों को नौकरी देने के लिए ली जाने वाली भर्ती परीक्षाओं के आयोजन में कोताही बरत रही है जिससे प्रदेश में बेरोज़गारी तो बढ़ ही रही है, जनता में असंतोष भी है। उन्होंने आगे कहा कि सरकार की इस अक्षम्य लापरवाही के विरोध में वे अगले दिन यानी शुक्रवार 25 मार्च को काले कपड़े पहन कर सूरज उगने से डूबने तक दौड़ेंगे। इस पर प्रतिक्रिया करते हुए सदन में प्रतिपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया ने चिंता जताई और कहा कि यदि इस तरह लगातार दौड़ते रहने के कारण बलजीत यादव की तबियत खराब हो जाए तो पुलिस के जरिए उनको तुरंत रोका जाना चाहिए।

बहरोड़ के विधायक यादव ने अपनी दौड़ पूरी होने के बाद कहा कि यह कदम उन्होंने अपने आप को सजा देने के लिए उठाया है। उन्होंने कहा कि हम कानून को मानने वाले हैं, किसी को गोली मार नहीं सकते और कायर भी नहीं हैं कि आत्महत्या कर लें। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन विधानसभा में सुनवाई नहीं हो पाती है, इसलिए उन्होंने राज्य के युवाओं के प्रति हो रहे अन्याय पर अपना रोष जाहिर करने के लिए स्वयं को कष्ट देने का फैसला लिया। यादव ने कहा कि मैंने तमाम कोशिशें की, हर सेशन में मामले को उठाया, ज़ोर देकर विस्तार से बताया कि किस-किस तरह से बेरोजगारों के साथ अन्याय हो रहा है। खेद की बात है कि विधानसभा में बोलने के बाद भी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और सरकार आवश्यक कार्रवाई करने में विफल रही है। भारत इतना बड़ा देश है, 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेश होने के बावजूद अपने ही देश में राजस्थान के युवाओं को नौकरी नहीं मिलती।

इसके लिए केंद्र सरकार कानून बनवाया जाए ताकि राजस्थान के बेरोजगारों के हकों की रक्षा हो। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक या तो भर्तियां नहीं निकलतीं, निकलती हैं तो पेपर लीक हो जाते हैं या अफसरों की लापरवाही से परीक्षाएं हाईकोर्ट में अटक जाती हैं। विधायक बलजीत यादव शुक्रवार अपने समर्थकों के साथ सेंट्रल पार्क पहुंचे और उन्होंने सूर्योदय से सूर्यास्त तक लगातार 12 घंटे तक 25 राउंड में 108 किलोमीटर की दौड़ पूरी की। दौड़ लगा रहे बलजीत यादव को रोकने के लिए पक्ष-विपक्ष के कई विधायक सेंट्रल पार्क पहुंचे और उनके उठाए गए मुद्दों के प्रति समर्थन जताते हुए उनसे दौड़ रोकने की गुजारिश की, लेकिन बलजीत यादव नहीं माने और दौड़ जारी रखी। राजस्थान सरकार में जलदाय मंत्री महेश जोशी, रतनगढ़ से बीजेपी विधायक अभिनेष महर्षि, उप-मुख्य सचेतक महेंद्र चौधरी और प्रतिपक्ष के उप-नेता राजेंद्र राठौड़ ने बलजीत यादव को मनाने की कोशिश की। जलदाय मंत्री महेश जोशी तो उन्हें मनाने के लिए ट्रैक पर ही बैठ गए, लेकिन बलजीत यादव भी दौड़ते रहने की जिद्द पर अड़े रहे। हालांकि विधायक बलजीत यादव के समर्थकों ने महेश जोशी सहित अन्य नेताओं को विश्वास दिलाया कि यदि उनकी तबियत थोड़ी भी खराब हुई तो वह तुरंत दौड़ रुकवा देंगे। दौड़ हुई और बारह घंटे बाद समाप्त भी हो गई। एक मंत्री सहित पक्ष-विपक्ष के कई विधायक घटनास्थल पर पहुंचे।

 सदन में भी इसे लेकर प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया ने चिंता जताई, लेकिन सवाल यह है कि समाधान क्या हुआ? क्या इस घटना के बाद सरकार ने कोई कार्रवाई की? क्या इस घटना के समय जिन विधायकों ने बलजीत यादव के समर्थन की घोषणा की थी, उन्होंने आगे कुछ और किया? सवाल इतना ही नहीं है। सवाल यह है कि ऐसी नौबत ही क्यों आई कि एक विधायक सदन में लगातार एक समस्या का जि़क्र करते रहे हैं और सरकार निश्चिंत बैठी रही? इस समस्या के मूल में जाएं तो मालूम होगा कि हमारा संविधान ही ऐसा है कि सरकारों को लापरवाही की असीमित छूट देता है। समझने वाली बात यह है कि जो दल सत्ता में होगा, वह सत्ता होगा ही इस कारण से क्योंकि उसके पास बहुमत है। बहुमत के अभाव में विपक्षी दल न तो कोई कानून बनवा सकते हैं, न रुकवा सकते हैं और न ही किसी कानून में कोई संशोधन करवा सकते हैं। विपक्ष की बात तो छोडि़ए, सत्तारूढ़ दल के वे सदस्य जो मंत्रिपरिषद में नहीं हैं, वे भी शक्तिहीन प्यादे ही हैं जो सरकार की हर घोषणा पर सिर्फ मेजें थपथपाने के लिए ही हैं, क्योंकि ह्विप से बंधे होने के कारण वे अपनी मजऱ्ी से वोट तक नहीं दे सकते और यदि सत्तारूढ़ दल के ऐसे सदस्य भी जो मंत्री नहीं हैं, सदन में कोई बिल पेश करंे तो उस बिल को सरकारी बिल न मानकर निजी बिल का दर्जा दिया जाता है और किसी विधानसभा में ऐसे किसी भी बिल के पास होने का कोई इतिहास नहीं है। लोकसभा में भी पिछले 52 सालों में एक भी निजी बिल पास नहीं हो पाया है।

हमारे संविधान ने विपक्ष की भूमिका तो खत्म की ही है, मंभी पद से वंचित रहे सत्तारूढ़ दल के सदस्यों की भूमिका भी शून्य कर दी है क्योंकि एक बार विधायक या सांसद बन जाने के बावजूद किसी व्यक्ति को अगली बार पार्टी का टिकट मिलेगा या नहीं, यह उसकी काबिलीयत से भी ज्यादा इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपनी पार्टी के केंद्रीय नेताओं के गुट को खुश रख पाता है या नहीं। इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के कारण विधायकों और सांसदों की महत्ता शून्य हो गई है और वे जनप्रतिनिधि होने का जितना भी दम भरते रहें, असल में उनके पास कोई अधिकार नहीं हैं और वे शतरंज के प्यादों की तरह गिन-गिन कर एक-एक कदम चलने के लिए मजबूर हैं। शतरंज के खेल में तो फिर हाथी, ऊंट और घोड़े के पास कुछ शक्तियां होती हैं, लेकिन राजनीति की कालकोठरी में विधायकों और सांसदों के पास कुछ नहीं होता। अपने छोटे-छोटे कामों के लिए भी उन्हें कभी नौकरशाहों की चिरौरी करनी पड़ती है तो अपने ही दल के बड़े नेताओं के तलवे चाटने पड़ते हैं। हमारे देश में लागू व्यवस्था का यह अभिशाप इतना गहरा है कि इसने हमारे लोकतंत्र को पंगु कर डाला है और इस लोकतंत्र में तंत्र ही तंत्र है, लोक कहीं भी नहीं है। अब समय आ गया है कि हम खुले मन से अपने संविधान की समीक्षा करें, इसमें व्याप्त कमियों को दूर करें ताकि हमारा लोकतंत्र एक समर्थ लोकतंत्र बन सके।

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

ई-मेलः [email protected]

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