विकास, सुख और खुशी

By: Apr 14th, 2022 12:08 am

बहुत से लोग जीवन भर धन के पीछे भागते रहते हैं और जीवन का असली आनंद लेने की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता। वे सुख को खुशी समझ लेते हैं। एक मुलायम-गद्देदार सोफे पर बैठा व्यक्ति या मखमली बिस्तर पर लेटा व्यक्ति भी दुखी हो सकता है, अकेलेपन से त्रस्त हो सकता है। सुख, सिर्फ सुख है, खुशी नहीं। खुशी बिल्कुल अलग चीज़ है और एक गरीब व्यक्ति भी खुश हो सकता है और अपने आसपास के लोगों को खुशियां बांट सकता है, जबकि एक अमीर व्यक्ति भी चिंतित, दुखी या तनावग्रस्त हो सकता है…

भारतवर्ष एक विकासशील देश है और जन-जन की इच्छा है कि हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में आ जाए। हर व्यक्ति विकास चाहता है और यह सही भी है, लेकिन विकास-विकास रटने के साथ हमें यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि विकास ऐसा हो जो स्थायी हो और लाभदायक हो। विकास के साथ ‘सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्’ की अवधारणा का सामंजस्य अत्यंत आवश्यक है। आइए, इस पर जरा विस्तार से बात करें। आठ वर्ष पूर्व जब उत्तराखंड बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहा था तो वहां बाढ़ खत्म हो जाने के काफी समय बाद तक  मलबे से लाशें निकलती रही। उस समय उत्तराखंड में जगह-जगह बड़े-बड़े भवन उग आए थे जिनमें हर तरह का व्यवसाय चलता था और जनजीवन अपेक्षाकृत सुविधाजनक था, पर्यटकों को अपनी आवश्यकता की वस्तुएं आसानी से मिल जाती थीं और स्थानीय निवासियों के लिए रोज़गार के साधन उपलब्ध थे। वह भी विकास का एक रूप था, लेकिन विनाशकारी बाढ़ ने हम सबको सोचने पर विवश किया कि हम एकांगी विकास के बजाय संतुलित विकास का नज़रिया अपनाएं। विकास धनात्मक हो, मंगलकारी हो और स्थायी हो।

 विकास में सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की अवधारणा के सामंजस्य का यही अर्थ है। पहाड़ में कंक्रीट के जंगल भूकंप, भूस्खलन, बादल फटने जैसी दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। अतः यह आवश्यक है कि पहाड़ों में विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगलों पर रोक लगे। यहां सवाल पर्यावरण का नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन का है। वह विकास किस काम का जो जीवन को ही लील जाए? जिस तरह से सरकार ने गंगा की सफाई को अपनी प्राथमिकताओं में से एक माना, वैसे ही शेष नदियों और झीलों को भी साफ किया जाना और साफ रखना आवश्यक है। यह खेद का विषय है कि हमारे देश की बहुत सी नदियां तिल-तिल करके खत्म हो रही हैं। इनके किनारे बसे शहर इनका पानी ले रहे हैं और गंदा पानी इसमें छोड़ रहे हैं जिनमें औद्योगिक कचरा भी शामिल है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाकर नदियों को साफ रखने की नीति असफल सिद्ध हो चुकी है। ऐसे में यह आवश्यक है कि नदियों की सफाई के साथ-साथ नदियों में प्रदूषित पदार्थों और गंदे पानी के विसर्जन पर रोक लगे। इसके लिए एक समग्र नीति की आवश्यकता है जिसमें कचरा अलग करके उसकी उपयोगिता ढूंढना, लघु उद्योगों के लिए उचित तकनीक विकसित करना और एक राष्ट्रीय स्वच्छता नीति बनाना अनिवार्य है।

 इसके साथ ही यह समझना आवश्यक है कि पर्यावरण और विकास को एक-दूसरे के दुश्मन के रूप में पेश किया जाता है। यूपीए के दूसरे कार्यकाल में जयराम रमेश को पर्यावरण मंत्रालय छोड़ना पड़ा था क्योंकि उन पर आरोप था कि पर्यावरण स्वीकृतियों के चक्कर में ढेरों परियोजनाएं लंबित पड़ी रहीं। हमारे सामने विकास के दो मॉडल हैं। पहला मॉडल चीन का है जहां नीति यह है कि पहले गरीबी दूर करो, पर्यावरण की चिंता बाद में होती रहेगी। दूसरा मॉडल यूरोपीय देशों का है जहां ग्रीन हाउस प्रदूषण कम करने का प्रयास होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में भी 40 फीसदी तक का इजाफा हुआ है। ऐसे सभी मामलों में सरकार का तर्कसंगत और संतुलित नज़रिया ही देश को भविष्य में होने वाले नुकसान से बचा सकता है। सौर ऊर्जा एवं वायु ऊर्जा को प्रोत्साहन, घरेलू कचरे तथा औद्योगिक अपशिष्ट का रचनात्मक उपयोग यानी रीसाइकलिंग, कोयले के प्रयोग में कमी, कार्बन के उत्सर्जन पर रोकथाम के तरीके हमारी अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। इन पर ध्यान  दिए बिना किया गया विकास अंततः विनाशकारी साबित होगा और उत्तराखंड जैसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति के लिए शापित होते रहेंगे। पर्यावरण बचाने के लिए छोटे-बड़े हर स्तर पर संतुलन होना चाहिए।

 अभी जब हम पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं तो सरकार और कंपनियां विरोधियों का सा व्यवहार करते हैं। संतुलित फ्रेमवर्क में किया गया विकास न केवल मंगलकारी होगा, बल्कि स्थायी भी होगा। कई मामलों में सरकारी नीतियां और प्रशासनिक अधिकारियों का नज़रिया जनहितकारी नहीं होता। एक गरीब की झोंपड़ी गैरकानूनी हो तो हट जाती है, लेकिन जहां कारपोरेट कंपनियां पर्यावरण की अनदेखी कर बड़ी-बड़ी इमारतें या यहां तक कि शहर बना देते हैं, वहां कार्रवाई नहीं होती। पैसे के दम पर, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिज्ञों की मिलीभगत के कारण ऐसी कंपनियां अदालतों में भी जीत जाती हैं। यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि विकसित देश पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते, जबकि शोर सबसे ज्यादा वहीं से होता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हरित अर्थव्यवस्था पर ध्यान दिया जाना चाहिए, पर इसके लिए पहले कोई अंतरराष्ट्रीय एवं स्वीकार्य पैमाना भी बनना जरूरी है। विकासशील देशों को तकनीकी सहायता की आवश्यकता होगी ताकि उनका कार्बन उत्सर्जन कम हो सके। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, विकास के लिए कुछ हद तक समझौता करना ही पड़ेगा। इसके लिए जागरूकता की आवश्यकता है क्योंकि निचले स्तर पर भी जागरूकता आने से विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकेंगे। अभी बहुत बड़ी मात्रा में खेती योग्य जमीन उद्योगों को, विशेषकर विदेशी कंपनियों को दी जा रही है। इससे देश में अन्न के उत्पादन में कमी आएगी और अंततः हम भोजन के लिए भी विदेशों पर निर्भर हो जाएंगे। देश में बहुत सी बंजर ज़मीन है, जहां आवश्यक हो उसे उद्योगों को दिया जाना चाहिए ताकि खेती योग्य जमीन बची रह सके। आरंभिक शिक्षा में ही पैदल चलने और साइकिल पर चलने की आदत का विकास होना चाहिए ताकि स्थानीय परिवहन में गाडि़यों के अत्यधिक प्रयोग पर रोक लगे। कुशल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था इसमें बहुत लाभदायक हो सकती है। सिर्फ नए कानून बनाना ही काफी नहीं है, तर्कसंगत एवं जनहितकारी कानून बनाना, उन्हें पूरी तरह से लागू करना और प्रशासनिक अधिकारियों तथा राजनेताओं में जनसंवेदी दृष्टिकोण का विकास इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है।

 यह स्वयंसिद्ध तथ्य है कि विकास और पर्यावरण में कोई विरोध नहीं है। समस्या तब आती है जब हम समग्रता में नहीं देखते और एकांगी दृष्टिकोण अपनाते हैं। सच तो यह है कि पर्यावरण और विकास साथ-साथ चल सकते हैं, सिर्फ हमें अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है। मानव जीवन पर भी अगर दृष्टिपात करें तो हमें समझ में आएगा कि हम गलती कहां कर रहे हैं। बहुत से लोग जीवन भर धन के पीछे भागते रहते हैं और जीवन का असली आनंद लेने की ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता। वे सुख को खुशी समझ लेते हैं। एक मुलायम-गद्देदार सोफे पर बैठा व्यक्ति या मखमली बिस्तर पर लेटा व्यक्ति भी दुखी हो सकता है, अकेलेपन से त्रस्त हो सकता है। सुख, सिर्फ सुख है, खुशी नहीं। खुशी बिल्कुल अलग चीज़ है और एक गरीब व्यक्ति भी खुश हो सकता है और अपने आसपास के लोगों को खुशियां बांट सकता है जबकि एक अमीर व्यक्ति भी चिंतित, दुखी या तनावग्रस्त हो सकता है। जैसे जीवन में सुख और खुशी का संतुलन जीवन का भरपूर आनंद देता है, वैसे ही विकास और पर्यावरण का संतुलन हमें शुद्ध वायु, शुद्ध जल और मंगलकारी जलवायु देकर हमारे जीवन को समृद्ध बना सकता है। हमें अब यही पाठ पढ़ने की सख्त जरूरत है।

पी. के. खुराना

राजनीतिक रणनीतिकार

 ई-मेलः [email protected]

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