प्राध्यापकों को सातवें वेतन आयोग की देनदारी

प्राध्यापकों के आक्रोश तथा नाराज़गी को अविलंब दूर किया जाना ज़रूरी है। अब आवश्यकता शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को लागू कर व्यवहार में लाकर इसे सफल बनाने की है…

हिमाचल प्रदेश में सरकार के अधीनस्थ कार्य कर रहे सभी कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के सभी वित्तीय लाभ मिल चुके हैं, लेकिन प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों में कार्यरत प्राध्यापक अभी भी सरकार की ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में उच्चतर शिक्षा विभाग के अधीन सभी महाविद्यालयों तथा सभी विश्वविद्यालयों में कार्य कर रहे  प्राध्यापकों की कुल संख्या लगभग तीन हज़ार है जिन पर पूरे प्रदेश की उच्चतर शिक्षा का दायित्व है। ये सभी प्राध्यापक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की शैक्षिक कार्यप्रणाली के अंतर्गत तथा सिफारिशों के अधीन कार्य करते हैं। भारतवर्ष  में प्राध्यापकों के वेतनमान, कामकाज, शैक्षिक मानदंड तथा नियामकों का निर्धारण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग करता है जिसका पालन देशभर के सभी विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय करते हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सभी राज्यों के विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों के प्राध्यापकों का वेतनमान निर्धारित करता है तथा वेतनमान जारी करने के पश्चात यह कुल राशि का पचास प्रतिशत आगामी पांच वर्ष तक वहन करता है। पूरे देश में सातवां वेतन आयोग एक जनवरी, 2016 में जारी हो चुका है तथा इस समय भारतवर्ष के उन्नतीस राज्यों में से सत्ताईस राज्यों तथा नौ केंद्र शासित प्रदेशों के विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों के प्राध्यापकों के लिए लागू हो चुका है।

 सात वर्ष बीत जाने के बाद भी यह सातवां वेतनमान केवल दो ही प्रदेशों पंजाब तथा हिमाचल प्रदेश में दिया जाना लंबित है। हिमाचल प्रदेश का आज तक अपना कोई वेतन आयोग नहीं बन पाया है तथा वर्षों से पंजाब वेतन आयोग पर निर्भर करता है। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि पूर्ण राज्यत्व का दर्जा प्राप्त किए हुए पचास वर्ष पूर्ण किए अपनी स्वर्ण जयंती मना चुके हिमाचल प्रदेश को अब भी वेतनमान लागू करने के लिए अपने पड़ोसी राज्य पंजाब की ओर देखना पड़ता है, जबकि विश्वविद्यालय वेतन आयोग का पंजाब वेतन आयोग से कोई सरोकार नहीं है। अभी हाल ही में हिमाचल सरकार ने प्रदेश में सभी वर्गों के कर्मचारियों को वर्ष 2016 से देय सातवें वेतन आयोग को लागू कर दिया है। प्रदेश में अब केवल उच्चतर शिक्षा में कार्यरत प्राध्यापक वर्ग विगत सात वर्षों से देय सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने की प्रतीक्षा कर रहा है। यहां प्रश्न प्राध्यापकों के वर्षों से  लंबित देय वेतनमान के साथ उनकी व्यावसायिक गरिमा, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा व्यक्तिगत अधिकार का भी है। जब पूरे देश में विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों को यूजीसी वेतनमान सातवें वेतन आयोग के वित्तीय लाभ दिए जा चुके हैं तो हिमाचल प्रदेश के प्राध्यापकों के साथ भेदभाव क्यों? जब प्रदेश के सभी कर्मचारियों को सातवें वेतनमान के वित्तीय लाभ मिल चुके हैं तो विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों के प्राध्यापकों को क्यों नहीं? यूजीसी के वेतनमानों का पंजाब वेतन आयोग से कोई लेना-देना नहीं। यूजीसी का वेतन आयोग अपनी सिफारिशों के साथ पांच वर्ष तक पचास प्रतिशत वित्तीय हिस्सेदारी देता है।

 प्रदेश में कार्यरत सभी भारतीय एवं हिमाचल प्रशासनिक अधिकारियों, डॉक्टरों, इंजीनियरों व केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों से लेकर प्रदेश के उच्च से सामान्य स्तर के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के वित्तीय लाभ मिल चुके हैं तो केवल प्रदेश में उच्चतर शिक्षा के वाहकों के धैर्य की परीक्षा क्यों? हिमाचल के प्राध्यापक लंबे अंतराल से प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव, वित सचिव, शिक्षा सचिव तथा शिक्षा निदेशक से मिल कर अवगत करवाकर कई बार विनम्र अनुरोध कर चुके हैं। इस बारे प्राध्यापक  हिमाचल राजकीय महाविद्यालय प्राध्यापक संघ तथा सभी स्थानीय इकाइयों के माध्यम से अनेकों बार ज्ञापन दे चुके हैं, लेकिन हर बार मात्र आश्वासन ही मिले हैं। अब प्राध्यापकों के सब्र का बांध टूट चुका है। अपना रोष प्रकट करते हुए प्राध्यापकों ने बीए, बीएससी तथा बीकाम वार्षिक परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन कार्य वेतनमान लागू न होने तक तथा उनके हितों व व्यावसायिक हितों के मसलों के हल होने तक रोक दिया है। प्रदेश में शिक्षा का ये वाहक वर्ग महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में  उच्च शिक्षा का संचार करता है। प्राध्यापक वर्ग बहुत ही ईमानदारी, निष्ठा, परिश्रम तथा जि़म्मेदारी से अपना कार्य कर सरकार के मार्गदर्शन तथा दिशानिर्देशों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य करता है। शिक्षा में गुणवत्ता का लक्ष्य प्राप्त करने में यह वर्ग कभी भी पीछे नहीं रहा। अब उच्चतर शिक्षा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को मूर्तरूप देकर इसे सफल बनाने की जि़म्मेदारी प्राध्यापक वर्ग पर है। जहां यह वर्ग बहुत ही संजीदगी, ईमानदारी तथा जि़म्मेदारी से उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी भागीदारी निभाता है, वहीं पर सरकार को भी इस वर्ग का देय सातवें वेतन आयोग के लाभ प्रदान कर गरिमा तथा प्रतिष्ठा को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। सरकार को प्राध्यापकों में पनप रही निराशा तथा आक्रोश को दूर कर उनके मनोबल को बढ़ाना चाहिए।

 लगभग सत्तर महाविद्यालयों में प्राचार्यों की नियुक्ति, प्राध्यापकों की पदोन्नति, एमफिल, पीएचडी की अतिरिक्त वेतन वृद्धि, शिक्षा में मूलभूत सुविधाओं, भौतिक संसाधनों, शिक्षक-शिष्य अनुपात, प्राध्यापकों की कमी के बारे में सरकार, शिक्षा निदेशालय तथा विश्वविद्यालय स्तर पर प्राध्यापकों की समस्याओं का समाधान होना चाहिए ताकि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो। प्राध्यापकों द्वारा मूल्यांकन कार्य, परीक्षा कार्य, शिक्षण कार्य तथा सामान्य कार्य का बहिष्कार कर सड़कों पर उतरना शोभा नहीं देता, लेकिन इसकी जि़म्मेदारी सरकार तथा शिक्षा प्रशासन की भी है। विभागीय आकलन के अनुसार इस वेतनमान पर सरकार को पचास करोड़ वार्षिक देना होगा जो कि सरकार पर वित्तीय बोझ नहीं, बल्कि प्राध्यापकों के लिए सातवें वेतन आयोग की देनदारी है। प्रदेश के प्राध्यापक हिमाचल सरकार के मुख्य एवं महत्वपूर्ण घटक हैं। सरकार को संवेदनशील होकर वेतनमान को लागू कर तथा प्राध्यापकों की व्यावसायिक समस्याओं का हल निकाल कर सामाजिक, शैक्षिक गरिमा को प्रतिष्ठित करना चाहिए। प्राध्यापकों के आक्रोश तथा नाराज़गी को अविलंब दूर किया जाना ज़रूरी है। अब आवश्यकता शिक्षा क्षेत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को लागू कर व्यवहार में लाकर इसे सफल बनाने की है।

प्रो. सुरेश शर्मा

लेखक घुमारवीं से हैं

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