नारद जयंती और पत्रकारिता

कोई पूछ सकता है कि आज तो मीडिया मिशन न रह कर व्यवसाय बन गया है, इसलिए क्या नारद इसमें अप्रासंगिक नहीं हो गए? शायद नहीं, क्योंकि यदि मीडिया व्यवसाय भी है तब उसके भी तो कुछ मानक व आदर्श होने ही चाहिए। नारद से उस स्थिति और दशा में भी प्रेरणा ली जा सकती है। नारद जयंती के परिप्रेक्ष्य में ही आज हमें उन संकटों पर विचार करना होगा जो मीडिया के वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने आ रहे हैं। नई तकनीक ने मीडिया एवं संचार के बीच से भौगोलिक दीवारों को समाप्त कर दिया है। फेसबुक, ट्विटर, गूगल इसी प्रकार की कम्पनियां हैं जिन्होंने जनसंचार को देशों की दीवारें फांदते हुए वैश्विक बना दिया है। लेकिन जनसंचार को संचालित व नियंत्रित करने की सत्ता इन कम्पनियों के मालिकों के हाथ में आ गई है जिससे मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण करने के प्रयास हो रहे हैं…

पिछले दिनों देश भर में नारद जयंती का उत्सव मनाया गया। ऐसा हर साल होता ही है। चुने हुए पत्रकारों को नारद पत्रकारिता पुरस्कार से भी नवाजा जाता है। लेकिन पिछले दो दशकों से विभिन्न शिक्षा संस्थानों के पत्रकारिता विभाग नारद जयंती को अपने विभाग की गतिविधियों के अंतर्गत मना रहे हैं। कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय  के कुलपति बलदेव भाई शर्मा ने मुझे इस बार विश्वविद्यालय में मनाए जाने वाले नारद जयंती समारोह में निमंत्रित किया था, लेकिन मैं व्यस्तताओं के चलते जा नहीं पाया। लेकिन उन्होंने बताया कि उनका विश्वविद्यालय विचार कर रहा है कि जिस प्रकार चिकित्सकों को बढ़ई पूरी करने पर चरक शपथ दिलाई जाती है, उसी प्रकार पत्रकारों को भी काम शुरू करने से पहले नारद शपथ दिलाई जानी चाहिए। शपथ का प्रारूप सभी की सहमति से तैयार किया जाएगा।

 नारद को पत्रकारिता का आदि पुरुष माना जाता है। यह ठीक है कि पत्रकारिता का वर्तमान स्वरूप बहुत कुछ पश्चिम में ही विकसित हुआ और भारत में भी पत्रकारिता अंग्रेज़ी शासन काल में ही शुरू हुई, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि पत्रकारिता का मूल संवाद रचना या फिर जनसंचार में निहित है। एक स्थान की सूचना या घटना दूसरे स्थान तक पहुंचाना ही पत्रकारिता का मूल है। भारत में सैकड़ों साल से, अंग्रेज़ों के आने से भी सदियों पहले कुंभ के मेले पर लाखों लोग एकत्रित हो जाते थे। इस सूचना का जनसंचार कैसे होता था? देश भर के लोग तीर्थ स्थानों की यात्रा करते रहते थे और सूचनाओं का आदान-प्रदान होता रहता था। भारत की हुंडी प्रणाली पूरे जम्बूद्वीप में प्रचलित थी। सूचनाओं का इस मामले में किसी तरीके से आदान-प्रदान होता ही होगा। एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचनाएं पहुंचाने के मामले में महर्षि नारद आदि पुरुष माने जाते हैं। यही कारण है कि उन्हें आदि पत्रकार कहा जाता है। लेकिन उनका सूचनाओं के आदान-प्रदान का काम जड़ बुद्ध का नहीं था। इसका उद्देश्य जन कल्याण ही होता था। सत्य भी न छिपे और जन कल्याण को ठेस भी न पहुंचे। यह नारद का जनसंचार का सिद्धांत था। यही कारण है कि भारत में नारद आदर्श पत्रकार का प्रतीक माने जाते हैं। हर व्यवसाय में कोई न कोई आदर्श स्थापित करना आवश्यक होता है ताकि उस व्यवसाय को अपनाने वाली भावी पीढि़यां उस आदर्श से प्रेरणा लेकर उसके गढ़े मानदंडों पर चल सकें। ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत में अपने ही महापुरुषों को मानक स्थापित किया।

 अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद बनी भारत की सरकार ने भी उसी परंपरा को जारी रखा। सेवा की प्रतिपूर्ति फ़्लोरेंस नाईटंगेल बनी, भाई कन्हैया नहीं जो बिना किसी भेदभाव के युद्ध क्षेत्र में सभी घायल सैनिकों को पानी पिलाते रहे। यह दो मात्र एक उदाहरण है, अन्यथा हर शिल्प कला के लोग जानते हैं कि आदर्श विदेशी हैं, अपने देश के नहीं। नाटक के क्षेत्र में मानक शेक्सपियर हैं, कालिदास उसके कद तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं। आधुनिकता इस देश में अंग्रेज़ों के शासन से शुरू होती है। उससे पहले तो देश अवैज्ञानिकता के अंधेरे में हाथ-पैर मार रहा था। ईसा मसीह इतिहास है और महाभारत के कृष्ण कल्पना की उपज है। बाइबिल ऐतिहासिक रचना है और महाभारत व रामायण कल्पना के साहित्यिक ग्रंथ हैं। उधार ली हुई जड़ों से पेड़ ज्यादा विकास नहीं कर पाता और न ही अपने मूल स्वरूप को देर तक बचा कर रख सकता है। यदि फूल भी खिलते हैं तो वे देखने में तो सुंदर लगते हैं, परंतु सुगंध नहीं देते। भारतीय काव्य शास्त्र केवल संस्कृत भाषा पढ़ने-पढ़ाने वालों तक सीमित होकर रह गया, जबकि पाश्चात्य काव्य शास्त्र प्रत्येक भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना दिया गया। पत्रकारिता में भी जब संचार प्रणालियों पर चर्चा शुरू हुई तो भारतीय संचार प्रणालियों की चर्चा तक नहीं की गई, जबकि जनसंचार में भारत प्राचीनकाल से विश्व का अग्रणी देश रहा है। घुमक्कड़ों या यायावरों की चर्चा हुई तो कोलम्बस, वास्कोडिगामा नायक बन गए, गुरु नानक देव की चर्चा ही नहीं की गई, जो निरंतर पच्चीस साल यायावरी ही करते रहे। यही कारण था कि तंद्रा से जाग जाने के बाद धीरे-धीरे देश ने अपनी जड़ों की तलाश शुरू की।

 मीडिया ने भी भारत में ही अपनी जड़ों को खोजना शुरू किया तो खोज महर्षि नारद पर जाकर समाप्त हुई। दिल्ली के एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ने तो बाकायदा ‘नारद जी ख़बर लाए’ नाम से एक स्तम्भ ही शुरू कर दिया था। 1948 में जब दादा साहिब आपटे ने भारतीय भाषाओं की पहली संवाद समिति हिंदुस्थान समाचार स्थापित की तो उसके लिए प्रेरणा स्रोत ही महर्षि नारद को बताया था। लेकिन एक बात का ध्यान रखना होगा। आदर्श का चयन करना तो आसान होता है, उस आदर्श द्वारा स्थापित मानकों पर चल पाना बहुत मुश्किल होता है। महर्षि नारद का संवाद और सूचनाओं का आदान-प्रदान सर्वजन हिताय होता था। उसका उद्देश्य जनकल्याण था, न कि जन-जन में विद्वेष पैदा करना। समाज में विषमता को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि उसे समाप्त करना। सत्य की आड़ में विद्वेष पैदा नहीं किया जा सकता। इस पृष्ठभूमि में सत्ता निरपेक्ष नहीं बल्कि सापेक्ष होता है। गाय और कसाई वाली कथा सभी जानते हैं। कसाई के पूछने पर किसी ने उसे कह दिया कि गाय दाईं ओर गई है जबकि सत्य यह था कि गाय बाईं ओर गई थी। यानी सत्य भी परिस्थिति सापेक्ष हो गया। नारद का सत्य यही था।

 पत्रकारिता का सत्य भी यही होना चाहिए। दादा साहिब आपटे के पूछने पर एक बार सदाशिव माधवराव गोलवलकर ने कहा था मीडिया या पत्रकारिता अन्य व्यवसायों की तरह का कोई व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह एक मिशन है। महर्षि मर्द उसी मिशन के आदर्श माने जाते हैं। कोई पूछ सकता है कि आज तो मीडिया मिशन न रह कर व्यवसाय बन गया है, इसलिए क्या नारद इसमें अप्रासंगिक नहीं हो गए? शायद नहीं, क्योंकि यदि मीडिया व्यवसाय भी है तब उसके भी तो कुछ मानक व आदर्श होने ही चाहिए। नारद से उस स्थिति और दशा में भी प्रेरणा ली जा सकती है। नारद जयंती के परिप्रेक्ष्य में ही आज हमें उन संकटों पर विचार करना होगा जो मीडिया के वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने आ रहे हैं। नई तकनीक ने मीडिया एवं संचार के बीच से भौगोलिक दीवारों को समाप्त कर दिया है। फेसबुक, ट्विटर, गूगल इसी प्रकार की कम्पनियां हैं जिन्होंने जनसंचार को देशों की दीवारें फांदते हुए वैश्विक बना दिया है। लेकिन जनसंचार को संचालित व नियंत्रित करने की सत्ता इन कम्पनियों के मालिकों के हाथ में आ गई है जिससे मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण करने के प्रयास हो रहे हैं तथा छोटे देशों पर सांस्कृतिक आक्रमण हो रहे हैं। नारद का स्मरण करते हुए इन समस्याओं पर भी विचार करना होगा। उनके जनसंचार के सिद्धांत आज भी पहले की तरह प्रासंगिक हैं।

कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

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