सांप्रदायिकता का हल केवल संवैधानिक सुधार

ये ढांचागत चुनौतियां — स्थानीय स्वायत्तता, और केंद्र में शक्तियों के बंटवारे की आवश्यकता — विभाजन से पहले ही स्पष्ट थीं। 1937 में जब अंग्रेजों ने पहली बार भारतीयों को स्वयं प्रांतीय सरकारें बनाने की अनुमति दी, सांप्रदायिक एकता चकनाचूर हो गई थी। जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में चुनावों में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली, परंतु सांप्रदायिक राजनीति को समाप्त करने के प्रयास में उन्होंने मुस्लिम लीग के प्रत्याशियों को सरकारें बनाने में शामिल नहीं किया। मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने इसके जवाब में बहुमत को ही सर्वशक्तिमान बनाने वाली संसदीय प्रणाली के तहत किसी भी सरकार के खिलाफ अपने ‘‘अटल विरोध’’ की घोषणा कर दी। इस प्रकरण के दो साल के भीतर ही जिन्ना ने बंटवारे की मांग उठा डाली…

भारत एक बार फिर हिंदू-मुस्लिम हिंसा की चपेट में आ चुका है। अकेले अपै्रल माह में ही नौ राज्यों में सांप्रदायिक दंगों की खबरें सामने आईं। हमेशा की तरह दोनों संप्रदायों ने एक दूसरे पर दोष मढ़ा और राजनीतिक दलों ने अपना जाना पहचाना रवैया अपना लिया। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि हिंसा ‘बहुत ज्यादा’ नहीं हुई और होहल्ला केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बदनाम करने के लिए किया गया। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि ‘‘छद्म राष्ट्रवाद की वेदी पर शांति और विविधता की बलि चढ़ाई जा रही है।’’

भारत में सांप्रदायिक हिंसा के कारण ढांचागत और संवैधानिक हैं। देश में स्थायी हिंदू बहुमत है, जो एकतरफा हैः कुल जनसंख्या में 80 प्रतिशत हिंदू हैं और 14 फीसदी मुस्लिम। जबकि ऐसे असंतुलित जातीय मिश्रण में बहुमत और अल्पमत में शक्तियों को सावधानीपूर्वक संतुलन की आवश्यकता होती है, भारत बहुमत विजेता को ही सब शक्तियां सौंप देने वाली शासन प्रणाली का प्रयोग करता है। स्थिति इसलिए और भी खराब हो जाती है कि जिन क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या काफी है या बहुमत में है, वहां भी केंद्रीय सरकार स्थानीय सरकारों पर हावी रहती है।

ये ढांचागत चुनौतियां — स्थानीय स्वायत्तता, और केंद्र में शक्तियों के बंटवारे की आवश्यकता — विभाजन से पहले ही स्पष्ट थीं। 1937 में जब अंग्रेजों ने पहली बार भारतीयों को स्वयं प्रांतीय सरकारें बनाने की अनुमति दी, सांप्रदायिक एकता चकनाचूर हो गई थी। जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में चुनावों में कांग्रेस को बड़ी जीत मिली, परंतु सांप्रदायिक राजनीति को समाप्त करने के प्रयास में उन्होंने मुस्लिम लीग के प्रत्याशियों को सरकारें बनाने में शामिल नहीं किया। मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने इसके जवाब में बहुमत को ही सर्वशक्तिमान बनाने वाली संसदीय प्रणाली के तहत किसी भी सरकार के खिलाफ अपने ‘‘अटल विरोध’’ की घोषणा कर दी। इस प्रकरण के दो साल के भीतर ही जिन्ना ने बंटवारे की मांग उठा डाली।

पाकिस्तान बनने के बाद भारतीय नेताओं की यह गलत धारणा रही कि सांप्रदायिक समस्या समाप्त हो गई है। उन्होंने बहुमत शासन प्रणाली पर आधारित अत्यधिक हावी केंद्रीय सरकार और एकात्मक संविधान अपना लिया। उसी समय से भारतीय राजनीति सांप्रदायिक कलह पर चलती आ रही है। हिंदू राष्ट्रवादी हिंदुओं का तुष्टिकरण करते हैं, जबकि धर्मनिरपेक्ष दल मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यकों को तुष्ट करते दिखते हैं। बहुमत इसे अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकार समझकर कुढ़ता है, तो अल्पसंख्यक खुद को बहुसंख्यक लोगों की दया पर निर्भर मानते हुए नाराज होते हैं। परंतु जैसा होना ही था, 80 प्रतिशत बहुमत मजबूत स्थिति में है और एक हिंदू राष्ट्र की स्थापना को पहले की अपेक्षा अधिक दृढ़ संकल्प है।

भारत की तरह विविध राष्ट्रों के लिए सामान्यतः एक उपाय यह बताया जाता है कि वे अपनी विधायिकाओं में आनुपातिक प्रतिनिधित्व (proportional representation) और गठबंधन सरकारें (coalition governments) बनाएं। परंतु भारत में अनुपातिक प्रतिनिधित्व केवल समाज को और बांटेगा। इससे  चरमपंथ को बढ़ावा मिलेगा, कम अनुभवी और कम उत्तरदायी नेता तैयार होंगे, और सत्ता कुछ पार्टी बॉसिज के नियंत्रण में और अधिक आ जाएगी। और जैसा कि स्वयं भारत का अनुभव सिद्ध करता है, गठबंधन सरकारें अस्थिरता के लिए कुख्यात हैं।

इजरायल जो कि समान विविध (75 प्रतिशत यहूदी, 18 प्रतिशत मुस्लिम) देश है, और आनुपातिक प्रतिनिधित्व व गठबंधन सरकारों का प्रयोग करता है, लोकतंत्र के रूप में एक अच्छा प्रेरणास्रोत नहीं है।  स्वतंत्रता के 74 वर्ष बाद भी, इजरायल एक लिखित संविधान नहीं अपना पाया है। वह यह दुविधा नहीं हल कर पाया है कि वह एक यहूदी राष्ट्र एवं एक उदार लोकतंत्र, दोनों किस प्रकार बन सकता है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में यह एक पुलिस राज्य की तरह शासन करता है। स्थापना से लेकर अब तक इजरायल ने 36 गठबंधन सरकारें बनाई हैं, हर सरकार की टिकने की दर केवल लगभग दो वर्ष है।

भारत को अपनी सांप्रदायिक समस्या को हल करने के लिए proportional representation के बजाय अन्य मूलभूत सुधारों पर विचार करने की आवश्यकता है। मैंने एक सुझाव दिया था कि सभी धर्मों को समान प्रतिनिधित्व देते हुए संसद में एक ‘धार्मिक परिषद’ का गठन किया जाए। नागरिकों के धार्मिक, नस्लीय या सांस्कृतिक जीवन को प्रभावित करने वाले किसी भी विधेयक को इस परिषद द्वारा अनुमोदित करना आवश्यक हो। भारत में पहले ही वस्तु एवं सेवा कर परिषद, और न्यायपालिका का कॉलेजियम, आदि तदर्थ निकाय स्थापित करने के उदाहरण मौजूद हैं।

इससे भी अधिक प्रभावी सुधार यह होगा कि संयुक्त राज्य अमरीका का धर्मनिरपेक्ष मॉडल और इसकी शासन प्रणाली अपना ली जाए। अमरीका भी एक विविध देश है (लगभग 70 प्रतिशत क्रिश्चियन और 6 प्रतिशत गैर क्रिश्चियन, मुस्लिम, हिंदू और बौद्ध इत्यादि)। अमरीका का संविधान सरकार को किसी भी धर्म को बढ़ावा देने से रोकता है और चर्च व सरकार के बीच सख्त पृथ्थकरण की स्थापना करता है। दूसरी ओर भारतीय सरकारें धार्मिक गतिविधियों में लिप्त होने के लिए स्वतंत्र हैं। अमरीकी प्रणाली विकेंद्रीकृत है जो स्थानीय सरकारों को अधिक स्वायत्तता देती है। उसकी शासन प्रणाली कार्यकारी और विधायी शक्तियों को पृथक करती है, जो बहुसंख्यकों के लिए ऐसे कानून बनाना और उन्हें लागू करना मुश्किल बना देती है जो अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करें।

भारत के लिए यह चुनने का समय आ गया है कि क्या यह एक धर्मतंत्र बनना चाहता है या एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनकर अपनी सांप्रदायिक समस्या को हमेशा के लिए हल करना चाहता है। हिंदू राष्ट्र एक फिसलन भरी ढलान है, जिसके जरिए देश धार्मिक अतिवादियों के हाथों में जाने का जोखिम उठा रहा है। हम हिंदू, जो युगों से बुद्धिमान और धर्मनिरपेक्ष लोग माने गए हैं, निश्चित रूप से इससे बेहतर कर सकते हैं।

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

अंग्रेजी में स्क्रॉल डॉट इन (scroll.in)

में प्रकाशित (11 मई, 2022)

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