कानून-न्याय व्यवस्था का पुलिस पर अविश्वास

सरकार को चाहिए कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर विश्वास पैदा करने के लिए विभिन्न कानूनों में संशोधन लाए ताकि पीडि़त लोगों को न्याय मिले…

पुलिस का नाम सुनते ही लोगों को एक अजीब सी घबराहट होने लग जाती है। लोग कहते हैं पुलिस की न तो दोस्ती अच्छी न ही दुश्मनी। पुलिस का नाम हर व्यक्ति व हर संस्था तो फिर चाहे राजनीतिज्ञ हों तो चाहे न्यायालय, अधिकतर नकारात्मक रूप में ही लिया जाता है। पुलिस को घूसखोर, दबंगई, हैवानियत से भरपूर, अभद्र व क्रूर व्यवहार करने वाला ही समझा जाता है। वास्तव में वक्त ने पुलिस की तस्वीर ही बदल दी है तथा हर व्यक्ति पुलिस को बुराई का पर्याय ही मानता है। मगर  शायद लोगों  ने पुलिस को पूर्ण रूप से नहीं जाना है तथा केवल सिक्के की एक ही साइड का रूप देखा है। पुलिस तो 24 घंटे ड्यूटी पर तैनात रह कर लोगों की हर क्षण सेवा व सुरक्षा में लगी रहती है। चाहे फिर दीवाली हो या होली या फिर कोई राष्ट्रीय उत्सव हो, लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं के कन्धों पर बनी रहती है। शहर या गांव में कोई भी अप्रिय घटना घट जाए, लोग बाहर नहीं निकलते, बल्कि तमाशबीन बने रहते हैं।

 जब लोग अपनी पत्नी व बच्चों को साथ किसी मेले या त्योहार में आनंद ले रहे होते हैं, तब उनकी सुरक्षा पुलिस ही कर रही होती है। मगर इस सबके बावजूद लोगों की कुछ आदत सी हो गई है पुलिस को भला-बुरा कहने की। यह ठीक है कि कुछ पुलिस वाले रिश्वतखोर अपनी मनमानी का फिर अभद्र व्यवहार करने वाले होते हैं, मगर ऐेसे में पूरे विभाग को दोषी ठहराना ठीक नहीं है। आज समय की पुकार है कि पुलिस की आलोचना करने की बजाय उसकी प्रशंसा की जाए ताकि पुलिस जवानों को इस बात का एहसास हो सके कि उनके भी कोई प्रशंसक हैं। ऐसा होने पर वे और भी सबल, सक्षम व सुयोग्य बन कर लोगों की अच्छे रूप में सेवा कर सकते हैं। मगर विडंबना यह है कि पुलिस वाले चाहे ईमानदारी व पारदर्शिता से भी काम करें तब भी उन पर आसानी से विश्वास नहीं किया जाता और यही माना जाता है कि इसके पीछे जरूर कोई विशेष कारण होंगे। इस संबंध में एक कहावत है कि जब समुद्र मंथन हो रहा तो समुद्र से कई चीज़ें निकल रही थी तथा पुलिस भी टकटकी लगाए देख रही थी कि उसे भी कुछ मिलेगा। जब अमृत निकला तो सभी ने इसे पीकर खाली लोटा पुलिस को थमा दिया। अब लोग सोच रहे थे कि क्योंकि लोटा पुलिस के पास है तथा सारा अमृत पुलिस ने पी लिया होगा।

 पुलिस को शायद इसी कारण अमर समझ कर दिन-रात ड्यूटी पर लगाया जाता है। पुलिस आज तक भी इसे सिद्ध नहीं कर पाई है कि लोटा खाली था क्योंकि पुलिस का बयान न्यायालय में मान्य नहीं है। वर्ष 1857 में स्वतंत्रता संग्राम के बाद रानी विक्टोरिया ने भारतीयों को खुश करने के लिए वर्ष 1858 में कुछ नए अधिनियम बनाने की घोषणा की तथा परिणामस्वरूप वर्ष 1861-62 में भारतीय दंड संहिता व भारतीय साक्ष्य व दंड प्रक्रिया संहिता जैसे कानून कार्यान्वित किए। उस समय भारतीयों को ही पुलिस में भर्ती किया जाता था तथा इन अधिनियमों में पुलिस की शक्तियों को इस तरह सीमित कर दिया गया ताकि अंग्रेज किसी अपराध के लिए अपराधी न बनाए जा सकें तथा वे सजा मुक्त होते रहें। इन अधिनियमों की धाराएं आज तक पुलिस की कार्यप्रणाली पर अविश्वास की भावनाओं को भटकाती आ रही हैं। उदाहरणतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 व 25 के अंतर्गत पुलिस के सामने मुलजिमों या गवाहों के दिए गए बयान कोर्ट में मान्य नहीं हैं। न्यायालय में जब कोई मुकदमा सुनवाई के लिए लगना है, तब वकील लोग गवाहों को न केवल अपना बयान मुलजिम के पक्ष में देने के लिए मजबूर व प्रेरित कर देते हैं, बल्कि उन्हें पुलिस अधिकारी को झूठा बयान लिख लेने के लिए फंसा भी देते हैं। पुलिस की हालत उस सांप की तरह कर दी जाती है जिसके मुंह में छिपकली आ जाने पर उसे न तो खा सकता है और न ही छोड़ सकता है।

 इसी तरह जब किसी गुनाह को प्रमाणित करने के लिए मौके पर कोई गवाह न मिल रहा हो तब अमुक घटना चाहे किसी पुलिस जवान के सामने ही घटी हुई हो, वो भी उसे गवाह के रूप में नहीं रखा जा सकता। कितनी बड़ी विडंबना है कि किसी भी अपराधी का कबूलनामा पुलिस में बड़े से बड़े अधिकारी के सामने भी मान्य नहीं है। यही कारण है कि आज अधिकतर अपराधों में सजा की दर 50 प्रतिशत से भी कम है। जरा सोचिए, जब संवेदनशील मामलों में भी अपराधी सजामुक्त होकर खुले दनदनाते घूमते रहेंगे तो पुलिस का बदनाम होना स्वाभाविक ही है। यहां यह बताना भी तर्कसंगत है कि पुलिस किसी भी गवाह या अपराधी के बयान पर हस्ताक्षर नहीं करवा सकती है तथा जब गवाह अपने बयानों से मुकर जाता है तो नाकामियों का ठीकरा पुलिस के सिर पर ही फोड़ दिया जाता है ताकि कहावत के अनुसार पुलिस को मिले खाली अमृत कलश पर लोगों की यही निगाहें व विश्वास होता है कि पुलिस वाले सारे अमृत को पीकर अमर हो चुके हैं तथा उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। सरकारी वकील भी अक्सर अपराधियों के वकीलों के साथ मिल कर पुलिस अन्वेषण अधिकारियों को ही असफल सिद्ध करने की कोशिश करते रहते हैं तथा कई बार तो वो अपनी चमड़ी बचाने के लिए पुलिस अधिकारियों को ही दोषी ठहरा देते हैं तथा कई बार इन अधिकारियों को विभागीय कार्रवाई का सामना भी करना पड़ता है। जरा सोचिए कि पुलिस को कितनी विडंबनाओं का सामना करना पड़ता है। पुलिस न तो किसी अपराधी की पिटाई कर सकती है और न ही 15 दिन से ज्यादा किसी को हिरासत में रख सकती है। यही कारण है कि बाहुबली सरेआम मासूम व बेगुनाह लोगों का अपना शिकार बनाते रहते हैं।

 जज साहिबान भी अपने विवेक का सही इस्तेमाल न करते हुए मुलजिमों को इस वाक्य का हवाला देते हुए कि पुलिस अपराध को किसी तर्कसंगत अविश्वास की सीमा तक प्रमाणित करने के लिए असफल रही है, अपराधियों को सजा मुक्त करते रहते हैं। अन्याय की इन कडि़यों को तोड़ने की अत्यंत आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर विश्वास पैदा करने के लिए विभिन्न कानूनों में संशोधन लाए ताकि अपराध पीडि़त लोगों को न्याय मिल सके। यह भी देखा गया है कि कई बार सरकार को वर्तमान में बढ़ते अपराध को रोकने के लिए मौजूदा एक्ट्स में संशोधन करना पड़ता है तथा ज्यादा से ज्यादा सजा का प्रावधान रखा जाता है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि पुलिस गंभीर मुश्किलों व मजबूरियों से जूझती हुई अपने कार्य को अमली-जामा पहना रही है तथा ऐसे में लोगों को पुलिस की दास्तां को समझना चाहिए तथा उसका ऐच्छिक सहयोग करना चाहिए। हां, यदि कोई पुलिस कर्मी घूसखोरी इत्यादि में संलिप्त पाया जाता है तो इसका डट कर विरोध भी करना चाहिए।

राजेंद्र मोहन शर्मा

रिटायर्ड डीआईजी

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