पीएफआई बैन, विपक्षी बेचैन

By: Sep 30th, 2022 12:05 am

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और उसके कुछ सहयोगी संगठनों पर 5 साल के लिए प्रतिबंध क्या लगा दिया कि विपक्षी बेचैन, परेशान और हैरान हो उठे। प्रतिबंध यूएपीए के तहत लगाया गया है। विपक्षी पीएफआई सरीखे संगठनों पर पाबंदी के पक्षधर भी हैं, लेकिन आरएसएस पर भी पाबंदी की मांग चिल्लाने लगे हैं। पीएफआई पर पाबंदी के सबूत सरकार से मांगे जा रहे हैं। इस कार्रवाई को मुसलमानों के दमन, शोषण, उत्पीडऩ से जोड़ कर देखा जा रहा है। यह हास्यास्पद आकलन है। ज्यादातर मुस्लिम धर्मगुरुओं और कथित स्कॉलर्स ने साफ कहा है कि पीएफआई मुस्लिम समुदाय का पर्याय नहीं है। अधिकतर मुसलमान पीएफआई की देशद्रोही सोच, आतंकी संपर्कों और साजि़शों के खिलाफ हैं। मुसलमान ‘गज़वा-ए-हिंद’ अथवा 2047 तक भारत को ‘इस्लामी देश’ बनाने के विजन और कारगुजारियों को खंडित ही नहीं करते, बल्कि इन्हें ही पाबंदी का पर्याप्त आधार मानते हैं। बेचारी कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, ओवैसी और लालू यादव सरीखों की सियासत पर तरस आता है। भारत के मुसलमान पीएफआई पर पाबंदी से चिंतित और नाखुश नहीं हैं। बेशक पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र को ‘टैग’ करता रहे, लेकिन हमारे ही देश में विपक्ष के इन चुनींदा चेहरों ने पीएफआई और आरएसएस को एक ही समान धरातल पर रखने की घटिया और कुतार्किक कोशिश की है।

सवाल है कि क्या पीएफआई की तरह आरएसएस के भी आतंकी संपर्क हैं? क्या पीएफआई की तरह आरएसएस ने भी आतंकी सरगना लादेन को ‘शहीद’ का दर्जा दिया है और उस पर आवरण कथाएं अपने मुखपत्र में छापी हैं? क्या आरएसएस का भी विजऩ यही है कि 2047 तक भारत को ‘मुस्लिम देश’ बनाया जाए? पीएफआई देश के कानून और संविधान को धता बता कर ‘शरिया राज’ कायम करना चाहता है, क्या आरएसएस ने कानून और संविधान का उल्लंघन किया है? क्या आरएसएस के मुख्यालय अथवा अन्य दफ्तरों से एके-47 राइफलें, पिस्तौलें, धारदार हथियार, बड़े चाकू, बम, मिर्ची पाउडर और पत्थर आदि हिंसात्मक उपकरण बरामद किए गए हैं। धार्मिक आस्था के पालन और प्रचार का अधिकार संविधान ने हमें दिया है। अलबत्ता आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा राष्ट्रवादी, सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संगठन है। बेशक यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर पाबंदी चस्पा की गई थी, लेकिन 18 महीनों में ही यथार्थ सामने आ गया और देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने ही, बिना शर्त, पाबंदी वापस ली थी। यह सरदार पटेल और नेहरू कैबिनेट में ही प्रथम उद्योग-वाणिज्य मंत्री रहे डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आपसी पत्र-व्यवहार से जाना जा सकता है कि पाबंदी क्यों लगानी पड़ी और उसे वापस क्यों लेना पड़ा? दूसरी पाबंदी आपातकाल के दौरान चस्पा की गई। उस दौर में विपक्ष के लगभग सभी बड़े नेताओं को जेलों में ठूंसा गया था। पाबंदी तो कम सजा थी, लेकिन उसे भी 2 साल के बाद उठाना पड़ा।

तीसरी पाबंदी पीवी नरसिंह राव सरकार के दौरान थोपी गई, जब 1992 में अयोध्या के विवादित ढांचे का विध्वंस किया गया। तब भाजपा की चुनी हुई उप्र, मप्र, राजस्थान और हिमाचल की राज्य सरकारों को भी बर्खास्त किया गया था, लेकिन 6 माह में ही पाबंदी वापस लेनी पड़ी। दरअसल संघ के बारे में विपक्ष की जानकारियां पूर्वाग्रह वाली हैं, लिहाजा हमें कुछ विस्तार से यह विषय रखना पड़ा है। पीएफआई के बारे में हम कुछ दिन पहले विश्लेषण छाप चुके हैं। आज भारत सरकार ने भी उसके आतंकी संबंधों और संपर्कों को स्वीकार किया है, लेकिन पीएफआई को ‘आतंकी संगठन’ घोषित क्यों नहीं किया गया, यह स्पष्टीकरण गृह मंत्रालय ही दे सकता है। इसके अलावा, पीएफआई के राजनीतिक संगठन ‘सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया’ (एसडीपीआई) पर भी प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया, जबकि पीएफआई के तमाम पापों और साजि़शों में यह संगठन भी साझेदार रहा है? यहां यह याद दिलाना भी हमारा धर्म है कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए और मुलायम सिंह यादव ने सांसद के तौर पर, संसद के भीतर ही, सिमी का समर्थन किया था, जिसे आतंकी संगठन के तौर पर प्रतिबंधित किया गया था। दरअसल राष्ट्रीय सुरक्षा पर सियासत करना भी ‘देशद्रोही अपराध’ है।