युवाओं का सार्थक जीवन चाहते थे विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद के युवाओं के लिए ये संदेश जितने प्रासंगिक उस समय थे उससे कहीं अधिक प्रासंगिक आज के समय में हैं। युवाओं को प्रेरित करने वाले इन संदेशों के कारण ही स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि को भारत में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज के दौर में युवा नई-नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं, नए लक्ष्यों को अपने सामने रख रहे हैं और एक बेहतर भविष्य की कल्पना मन में संजोए हुए हैं…

कोलकाता के एक बहुत ही संभ्रांत परिवार में भगवान में भरपूर आस्था रखने वाली भुवनेश्वरी देवी और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित विश्वनाथ दत्त के घर में मकर संक्रांति के दिन 12 जनवरी 1863 को एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम नरेंद्र नाथ दत्त रखा गया। उनके पिता उनको पश्चिमी सभ्यता पर चलाना चाहते थे। हालांकि नरेंद्र नाथ अपने पिता के तर्कपूर्ण मस्तिष्क से प्रभावित थे लेकिन उन पर उनकी माता के विचारों का बहुत अधिक प्रभाव होने के कारण उन्होंने पश्चिमी सभ्यता से दूरी बनाए रखी। नरेंद्र नाथ आध्यात्मिक विचारों वाले अद्भुत बालक थे। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के मालिक नरेंद्र नाथ की धार्मिक किताबों को पढऩे में बहुत अधिक रुचि थी। वे किसी भी पुस्तक को जल्दी से पढक़र याद करने की विलक्षण प्रतिभा के मालिक थे। वे जाति और धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव के पूरी तरह से खिलाफ थे। बचपन में ही उनका आत्म नियंत्रण आश्चर्यजनक था जिसका प्रयोग करके वे ध्यान के विशेषज्ञ बन गए और आसानी से समाधि की स्थिति में प्रवेश कर जाते थे। वे अध्ययन के अलावा खेलकूद और कुश्ती में भी काफी रुचि रखते थे। युवावस्था तक पहुंचते-पहुंचते नरेंद्र नाथ में नेतृत्व के भरपूर गुण विकसित हो चुके थे। महज पच्चीस वर्ष की उम्र में ही उन्होंने सांसारिक बंधनों को त्याग कर संन्यास धारण कर लिया। उनके दिमाग में अध्यात्म के प्रति जो प्रश्न थे उनका जवाब जानने के लिए वे पहले आर्यसमाज की शरण में गए लेकिन उसके बाद जल्द ही उनका परिचय रामकृष्ण परमहंस जी से हुआ। उन्होंने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु बना लिया और अपने गुरु से आध्यात्मिक ज्ञान हासिल किया। जीवन में कई तरह के संघर्षों से जूझने के बाद उन्होंने भारत भ्रमण किया और सनातन धर्म का प्रचार एवं प्रसार भी किया। वे सार्वभौमिक सहिष्णुता के पक्षधर थे। वर्ष 1893 में अमरीका के शिकागो में होने वाली धर्म संसद के बारे में जब उनको पता चला तो उन्होंने वहां जाने के लिए प्रयास प्रारंभ किया। आर्थिक परेशानियों के कारण उनका शिकागो पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा था तो उनकी मदद खेत्री के महाराज अजीत सिंह ने की और उन्होंने ही उनको स्वामी विवेकानंद का नाम दिया। शिकागो में 11 सितंबर 1893 को स्वामी विवेकानंद द्वारा दिए गए भाषण ने दुनिया के सामने सनातन और भारत की एक नई छवि प्रस्तुत की। उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं जिसने सभी धर्मों और देशों के सताए हुए लोगों को अपने यहां शरण दी है। उन्होंने कहा था कि मुझे अपने धर्म पर गर्व है जिसने सहिष्णुता का पाठ दुनिया को पढ़ाया है।

स्वामी विवेकानंद देश के धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वाभिमान के प्रतीक थे। वह हमेशा यह चाहते थे कि समस्त विश्व भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और धार्मिक संपदा का सम्मान करे। इसीलिए उन्होंने शिकागो की धर्म संसद में भाषण देने के बाद कई वर्षों तक अमरीका और यूरोप में रहकर भारतीय धर्म और संस्कृति का प्रचार किया। भारत की सभ्यता और संस्कृति को नष्ट करने का जो चक्र उस समय अंग्रेजों द्वारा चलाया जा रहा था उससे स्वामी विवेकानंद काफी दुखी थे। लेकिन वे आश्वस्त थे कि जब देश का युवा जागेगा तो अंग्रेजों का भारत की संस्कृति को नष्ट करने का षड्यंत्र कभी सफल नहीं हो सकेगा। इसीलिए उन्होंने देश के युवाओं को उनकी शक्ति को पहचानने के लिए कहा था। उन्होंने कहा था कि ये संसार कायरों के लिए नहीं है और ये हमेशा स्मरण रखना कि आपका संघर्ष जितना बड़ा होगा, जीत भी उतनी ही बड़ी होगी। उन्होंने कहा था कि ये हमेशा याद रखना कि जिस दिन आपके मार्ग में कोई समस्या न आए तो समझ लेना कि गलत रास्ते पर चल रहे हो। वे युवाओं के लिए अक्सर कहते थे कि उठो, जागो और चलो और तब तक चलते रहो जब तक मंजिल न मिल जाए। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि जीवन का सफल होना तो जरूरी है लेकिन इसके साथ-साथ जीवन का सार्थक होना भी उतना ही आवश्यक है। सार्थक जीवन के लिए वे युवाओं से अपील करते थे कि खुद को शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से परिपक्व करें। स्वामी विवेकानंद कहते थे कि खुद को शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाएं, खुद को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए क्योंकि किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए जितनी भी शक्ति की हमें जरूरत होती है वो हमारे अंदर ही है।

इसके अलावा वे युवाओं के सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के भी पक्षधर थे। वे कहते थे कि युवाओं के सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से न केवल उनका व्यक्तित्व निखरता है बल्कि समाज का भी उत्थान होता है। इसके अलावा वे शिक्षा के द्वारा युवाओं को अपने मानसिक और बौद्धिक विकास पर जोर देने के लिए भी प्रेरित करते थे। इस संदर्भ में उन्होंने कहा है कि शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है जो हमें दुनिया को समझने की शक्ति देती है। इसके अलावा वे युवाओं को आध्यात्मिक भाव रखने की सलाह देते थे। वे कहते थे कि आध्यात्मिक भाव आपको आपके लक्ष्य के नजदीक पहुंचाने में मदद करता है। स्वामी विवेकानंद के युवाओं के लिए ये संदेश जितने प्रासंगिक उस समय थे उससे कहीं अधिक प्रासंगिक आज के समय में हैं। युवाओं को प्रेरित करने वाले इन संदेशों के कारण ही स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि को भारत में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज के दौर में युवा नई-नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं, नए लक्ष्यों को अपने सामने रख रहे हैं और एक बेहतर भविष्य की कल्पना मन में संजोए हुए हैं। ऐसे में स्वामी विवेकानंद के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। इन विचारों से प्रेरणा पाकर आज का युवा अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। स्वामी विवेकानंद एक महान संत और कर्मयोगी थे। चालीस वर्ष से कम उम्र में 04 जुलाई 1902 को बेलूर के मठ में उन्होंने समाधि लेकर अपने शरीर को त्याग दिया था। स्वामी विवेकानंद देश और विश्व में अपने ज्ञान और व्यक्तित्व की एक गहरी छाप छोड़ कर गए हैं।

राकेश शर्मा

लेखक जसवां से हैं


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