घोषणापत्रों में गोवंश आश्रय का मसला नदारद

कृषि प्रधान देश भारत में कृषि अर्थव्यवस्था की आधारशिला गोवंश पर तशद्दुद व दुर्दशा नदामत का सबब है। लावारिस गोवंश को आश्रय देने के लिए सरकारों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी तथा समाज को भी योगदान देना होगा, ताकि समस्या का समाधान हो सके…

‘कसमें वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या’। सन् 1967 की ब्लाक्बस्टर फिल्म ‘उपकार’ के लिए मशहूर गीतकार ‘इंदीवर’ द्वारा लिखा गया यह नगमा मुल्क की सियासत पर सटीक बैठता है क्योंकि इंतखाबी तश्हीर के दौरान लोगों से किए गए सियासी वादे अक्सर अंजाम तक नहीं पहुंचते। इक्तदार हासिल होने के बाद प्रजातंत्र के कई अहम मुद्दे सियासी बंदरबाट का शिकार हो जाते हैं। चिरस्थाई हो चुके देश के कुछ मुद्दों का समाधान निकालने में सियासी व्यवस्था विफल रही है तथा भविष्य में समाधान निकलने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। हमारे सियासी रहनुमां देश को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनाने के दावे करते हैं। आत्मनिर्भर भारत का नारा बुलंद किया जाता है। कर्ज के बोझ तले डूब चुके किसानों को कृषि कर्ज के विकल्प के तौर पर प्राकृतिक कृषि का मश्विरा पेश किया जाता है। स्वस्थ जीवनशैली के लिए गौ आधारित प्राकृतिक कृषि उत्पादों को अपनाने की सलाह दी जाती है। किसानों की आमदनी बढ़ाने के दावे भी किए जाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि कृषि अर्थतंत्र को गुलजार करने की सलाहियत रखने वाला गोवंश बेसहारा होकर आश्रय को मोहताज है। हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में आयोजित होने वाले ग्रीष्मोत्सव व नलवाड़ मेलों का शुभारंभ बैल पूजन से होता है। शिव मंदिरों की चौखट पर शीश नवाने के साथ लोग मनोकामना के लिए अक्सर भगवान शिव के नंदी की मूर्ति के आगे विशेष तौर से नतमस्तक होते हैं, मगर इसे आधुनिकता का खुमार कहें या विलायती तहजीब का अंदाज!

सदियों से मुल्क के कृषि क्षेत्र को आबाद करने वाले भगवान शंकर के वास्तविक नंदी तथा अनादिकाल से भारतवर्ष के हर घर-आंगन की शोभा रहा गौधन सडक़ों पर विचरण करके सितम व क्रूरता का शिकार हो रहे हैं। मगर देश में विदेशी नस्ल के कुत्ते पालने का प्रचलन जोर पकड़ चुका है। हिंदोस्तान की सियासत में दशकों पूर्व गाय, बैल व किसान चुनावी चिन्ह के रूप में कुछ सियासी दलों के परचम पर भी चस्पां थे। मगर हालात इस कदर गंभीर हैं कि किसान तथा गोवंश अपने हकूक के लिए एक मुद्दत से सडक़ों पर फरियादी बनकर जद्दोजहद कर रहे हैं। गोवंश के हक के लिए सियासी तौर भी आवाज बुलंद होती रही है। लावारिस गौवंश का मुद्दा पिछले कई चुनावों में सुर्खियों में रहा है। बेसहारा पशु समस्या के समाधान के लिए सियासी रहनुमां लोगों को कई मर्तबा मुतमईन कर चुके हैं, मगर मौजूदा चुनावों में ‘गौमाता’ गुमनाम है। चुनावी घोषणापत्रों में बेसहारा गौधन को आश्रय देने का मुद्दा नदारद है। निराश्रित गोवंश को पंचायतों द्वारा आश्रय देने के वादे भी कागजों में सिमट गए। बेसहारा पशुओं का जमावड़ा राहगीरों के लिए भी परेशानी का सबब बन चुका है। जंगली जानवरों का कहर तथा बेरुखे मौसम की मार के साथ कृषि भूमि में लावारिस पशुओं की चहलकदमी से परेशान होकर कृषक वर्ग कृषि व्यवसाय से तौबा करने को मजबूर है। सडक़ों पर कयाम बना चुका गोवंश दुर्घटनाओं को दावत दे रहा है। तेज रफ्तार वाले वाहनों की चपेट में आने से गोवंश हादसों का शिकार हो रहा है।

हादसों से बचाव के लिए बेसहारा पशुओं के गले में रेडियम के पट्टे भी बांधे गए। विशेष पंजीकरण पशुओं की टैनिंग भी की जाती है ताकि पशुओं के मालिक की शिनाख्त कायम रहे, मगर सडक़ों पर गोवंश के समूह तस्दीक करते हैं कि बेसहारा पशु समस्या के समाधान के लिए धरातल पर कोई भी हिकमत कामयाब नहीं हुई। पशुपालन व्यवसाय में विश्व में शीर्ष पर काबिज भारत गोवंश को लावारिस छोडऩे के मामले में भी विश्व में पहले पायदान पर काबिज है। वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाला देश भी भारत ही है। मगर देश की जनसंख्या के मद्देनजर दूध की खपत उत्पादन से लगभग चार गुना अधिक है। उत्पादन व खपत के बीच एक बड़ा अंतर होने से मिलावटखोरी का कारोबार जोरों पर चलता है। विश्व में सर्वोत्तम नस्ल का भारतीय स्वदेशी गौधन अपनी उत्तम दुग्ध गुणवत्ता के लिए विश्वविख्यात है। इसी कारण दुनिया के कई देशों में भारतीय स्वदेशी नस्ल के गोवंश की मांग रहती है। हैरत की बात है कि उत्तम दुग्ध गुणवत्ता वाले जिस स्वदेशी गौधन के संरक्षण के प्रयास हो रहे हैं, वो स्वदेशी नस्ल की गऊएं भी लावारिस होकर सडक़ों पर भटक रही हैं। भारतीय संस्कृति में गौपालन व्यवसाय का प्रचलन प्राचीन काल से चला आ रहा है। आस्था का प्रतीक रहे गौधन को आश्रय देना पारंपरिक रिवायत रही है। रोजमर्रा की कई बुनियादी जरूरतें सदियों से गोवंश पर ही निर्भर रही हैं। दुग्ध पदार्थों की भारी मांग होने के बावजूद भारत की आर्थिक समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाला गोवंश लाखों की तादाद में सडक़ों पर धूल फांक कर अपने भाग्य को तलाश रहा है। वहीं बेरोजगारी की मार झेल रहा प्रजातंत्र का भविष्य युवा वर्ग रोजगार की जुस्तजू में गुमगश्ता है। लिहाजा यदि लावारिस गोवंश को उपयोगी बनाने के प्रयास पूरी शिद्दत से किए जाएं तो ग्रामीण अर्थतंत्र को मजबूत करने वाला गौपालन व्यवसाय युवा वर्ग के लिए स्वरोजगार का मुफीद विकल्प हो सकता है।

कृषि क्षेत्र में रासायनिक खादों का प्रभाव कम करके प्राकृतिक कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए बेसहारा गोवंश को आश्रय देना जरूरी है। बहरहाल बेजुबान गोवंश की बेबसी तथा किसानों का पशुपालन व कृषि व्यवसाय से हो रहे मोहभंग के आलम-ए-असबाब पर देश के सियासी निजाम को पूरी तफसील से मंथन करना होगा। क्या वोट बैंक के लिए चलाई जा रही मुफ्तखोरी की योजनाओं के चलते भौतिकतावादी जीवनशैली ने गोवंश को बेसहारा करके सडक़ों पर पहुंचा दिया या महंगे पशुचारे से बढ़ते आर्थिक संकट ने किसानों को पशुपालन जैसे पुश्तैनी व्यवसाय से दूर कर दिया, यह निश्चित तौर पर मंथन का विषय है। कृषि प्रधान देश भारत में कृषि अर्थव्यवस्था की आधारशिला गोवंश पर तशद्दुद व दुर्दशा नदामत का सबब है। लावारिस गोवंश को आश्रय देने के लिए सरकारों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी तथा समाज को भी योगदान देना होगा, ताकि समस्या का समाधान हो सके। यह वक्त की मांग है।

प्रताप सिंह पटियाल

स्वतंत्र लेखक


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