हिमाचली हिंदी कहानी : विकास यात्रा : 62

By: Jun 30th, 2024 12:07 am

कहानी के प्रभाव क्षेत्र में उभरा हिमाचली सृजन, अब अपनी प्रासंगिकता और पुरुषार्थ के साथ परिवेश का प्रतिनिधित्व भी कर रहा है। गद्य साहित्य के गंतव्य को छूते संदर्भों में हिमाचल के घटनाक्रम, जीवन शैली, सामाजिक विडंबनाओं, चीखते पहाड़ों का दर्द, विस्थापन की पीड़ा और आर्थिक अपराधों को समेटती कहानी की कथावस्तु, चरित्र चित्रण, भाषा शैली व उद्देश्यों की समीक्षा करती यह शृंखला। कहानी का यह संसार कल्पना-परिकल्पना और यथार्थ की मिट्टी को विविध सांचों में कितना ढाल पाया। कहानी की यात्रा के मार्मिक, भावनात्मक और कलात्मक पहलुओं पर एक विस्तृत दृष्टि डाल रहे हैं वरिष्ठ समीक्षक एवं मर्मज्ञ साहित्यकार डा. हेमराज कौशिक, आरंभिक विवेचन के साथ किस्त-62

हिमाचल का कहानी संसार

विमर्श के बिंदु

1. हिमाचल की कहानी यात्रा
2. कहानीकारों का विश्लेषण
3. कहानी की जगह, जिरह और परिवेश
4. राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचली कहानी की गूंज
5. हिमाचल के आलोचना पक्ष में कहानी
6. हिमाचल के कहानीकारों का बौद्धिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक व राजनीतिक पक्ष

लेखक का परिचय

नाम : डॉ. हेमराज कौशिक, जन्म : 9 दिसम्बर 1949 को जिला सोलन के अंतर्गत अर्की तहसील के बातल गांव में। पिता का नाम : श्री जयानंद कौशिक, माता का नाम : श्रीमती चिन्तामणि कौशिक, शिक्षा : एमए, एमएड, एम. फिल, पीएचडी (हिन्दी), व्यवसाय : हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग में सैंतीस वर्षों तक हिन्दी प्राध्यापक का कार्य करते हुए प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त। कुल प्रकाशित पुस्तकें : 17, मुख्य पुस्तकें : अमृतलाल नागर के उपन्यास, मूल्य और हिंदी उपन्यास, कथा की दुनिया : एक प्रत्यवलोकन, साहित्य सेवी राजनेता शांता कुमार, साहित्य के आस्वाद, क्रांतिकारी साहित्यकार यशपाल और कथा समय की गतिशीलता। पुरस्कार एवं सम्मान : 1. वर्ष 1991 के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से भारत के राष्ट्रपति द्वारा अलंकृत, 2. हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा राष्ट्रभाषा हिन्दी की सतत उत्कृष्ट एवं समर्पित सेवा के लिए सरस्वती सम्मान से 1998 में राष्ट्रभाषा सम्मेलन में अलंकृत, 3. आथर्ज गिल्ड ऑफ हिमाचल (पंजी.) द्वारा साहित्य सृजन में योगदान के लिए 2011 का लेखक सम्मान, भुट्टी वीवर्ज कोआप्रेटिव सोसाइटी लिमिटिड द्वारा वर्ष 2018 के वेदराम राष्ट्रीय पुरस्कार से अलंकृत, कला, भाषा, संस्कृति और समाज के लिए समर्पित संस्था नवल प्रयास द्वारा धर्म प्रकाश साहित्य रतन सम्मान 2018 से अलंकृत, मानव कल्याण समिति अर्की, जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश द्वारा साहित्य के लिए अनन्य योगदान के लिए सम्मान, प्रगतिशील साहित्यिक पत्रिका इरावती के द्वितीय इरावती 2018 के सम्मान से अलंकृत, पल्लव काव्य मंच, रामपुर, उत्तर प्रदेश का वर्ष 2019 के लिए ‘डॉ. रामविलास शर्मा’ राष्ट्रीय सम्मान, दिव्य हिमाचल के प्रतिष्ठित सम्मान ‘हिमाचल एक्सीलेंस अवार्ड’ ‘सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार’ सम्मान 2019-2020 के लिए अलंकृत और हिमाचल प्रदेश सिरमौर कला संगम द्वारा डॉ. परमार पुरस्कार।

डा. हेमराज कौशिक
अतिथि संपादक
मो.-9418010646

-(पिछले अंक का शेष भाग)
‘पूछ लो मोतीराम से’ शीर्षक कहानी में दफ्तर की कार्य पद्धति, कर्मचारी संगठनों की गुटबंदियां और स्वार्थपरता, एक ही स्थान पर कार्यरत कर्मचारियों की निरंकुशता और निष्क्रियता को चित्रित किया है। ऐसे परिवेश में ईमानदार और कर्मठ कर्मचारी किस प्रकार अपना कार्य नहीं कर पाते, उन्हें किस प्रकार की परेशान किया जाता है, उसे व्यंजित किया है। ‘अनुकंपा’ शीर्षक कहानी में अरुण भारती ने विधवा नारी के प्रति समाज के दृष्टिकोण को चित्रित किया है। कंपनी में कार्य करने वाली युवतियों का शोषण ठेकेदार और बिचौलिए किस प्रकार करते हैं, उसे भी यह कहानी सामने लाती है। कठोर परिश्रम करके जीविकोपार्जन करने वाले कर्मचारियों के वेतन से कमीशन काटी जाती है, कभी आधा वेतन दिया जाता है। यदि वे कुछ कहें तो उन्हें नौकरी से हाथ धोने की धमकी दी जाती है। चोपड़ा जैसे व्यक्ति हैं जो विवश नारियों, विधवाओं को प्राइवेट सेक्रेटरी नियुक्त कर अपने जाल में फंसाते हैं। विधवा नारी की विवशता का लाभ मिस्टर वर्मा जैसे लोग भी उठाना चाहते हैं। जीवन के परिस्थितियों के संदर्भ में कहानीकार ने इसे मूर्तिमान किया है।

अरुण भारती अपनी कहानियों में सबल नारियों की सृष्टि करते हैं जो परिस्थितियों से न तो समझौता करती हैं, न टूटती हैं। वे अपने अस्तित्व और अस्मिता को स्थापित करने के लिए संघर्ष के मार्ग पर अग्रसर होती हैं और सम्मानजनक जीवनयापन करने का निर्णय लेती हैं। ‘रीता तुम आ गई’ शीर्षक कहानी में दफ्तरों की दुरावस्था और कर्मचारियों की कार्यशैली की निष्क्रियता सामने लाई है। ‘पोस्टमार्टम’ कहानी में लेखक ने दलित वर्ग के संदर्भ में पुरुष वर्चस्ववादी सोच के फलस्वरूप पिसती नारी की व्यथा का चित्रण है। गुरु मेल की लिंग भेद की दृष्टि के कारण ही बेटे की प्रतीक्षा में चार बेटियां जन्म लेती हैं। कभी प्रसन्नता के कारण तो कभी अप्रसन्नता के कारण पति शराब के नशे में डूबा रहता है, पत्नी बंतो और बच्चों पर सारे घर का उत्तरदायित्व होता है। बेटा कालू भी पिता के दुव्र्यसनों को सीखता है। घर के प्रतिकूल और निरंकुश परिवेश का प्रभाव संतति पर भी पड़ता है। बेटे कालू का हृदय उस समय परिवर्तित हो जाता है जब अपनी ही बहन के नर पिशाचों द्वारा बलात्कार से मृत बहन के शव को पोस्टमार्टम के समय पहचानता है। उस समय उसे आघात लगता है।

बाद में उसे पोस्टमार्टम के समय प्रत्येक मृत देह में अपनी ही बहन का शव दिखाई देने लगता है। ‘कलाम-ए-पाक’ में कहानीकार ने धार्मिक श्रद्धा की जड़ता और रिक्तता को निरूपित किया है। एक निर्धन और अशिक्षित मुसलमान कलामें-ए-पाक धार्मिक ग्रंथ को उठाकर रेल यात्रा करता है, उसके साथ उसकी पत्नी और बच्चे भी होते हैं और वह उस धार्मिक पुस्तक को चद्दर में लपेटकर अपने साथ लाता है। रेल की कष्टप्रद भीड़ भरी यात्रा में वह पुस्तक उठाए रखता है। उसे जमीन पर नहीं रखता। रेल यात्रा के संदर्भ में धार्मिक अंध श्रद्धा की जड़ता का चित्रण है। ‘छनार’ में एक बांझ नारी की आंतरिक पीड़ा और विद्रोह को विविध स्तरों पर चित्रित किया है। कहानी की केंद्रीय चरित्र जयतु है। उसका विद्रोह कभी पति पर तो कभी उसके भाई की पत्नी जेठानी पर फूट पड़ता है। जेठानी के बेटे को लेकर भी अनेक तरह की बातें करती है। वह अपने आंतरिक विद्रोह और दमित भावनाओं के कारण अपनी जेठानी पर अपने पति की यौन संबंध तक का निरर्थक आरोप लगाती है। संतति की प्राप्ति की अदम्य लालसा के कारण वह साधु महात्माओं बाबाओं के चक्कर में पड़ती है। पति की मृत्यु के बाद सारी जमीन गुरुजी-बाबा को बेच देती है। उसके विद्रोह की चिंगारियां जीवन के अंत तक नहीं बुझ पाती। कहानीकार ने यह स्थापित किया है कि उसके अस्थिर चित, विद्वेष और असामान्य व्यवहार की पृष्ठभूमि उसकी मां बनने की इच्छा है जो उसकी पूरी नहीं हो पाती।

अरुण भारती की कहानियों में कथा तत्व सदैव विद्यमान रहता है। यही कारण है कि कहानियां पाठक के मस्तिष्क पर बोझ नहीं बनती। उनकी कहानी में मनुष्यता की सघन और विरल अनुभूतियां विन्यस्त हैं। समाज की विद्रूपताओं में भी मनुष्यता बची रहती है। कहानीकार ने अनेक कहानियों की चरित्र सृष्टि करते हुए यह स्थापित किया है। अभावग्रस्त, पीडि़त, वृद्ध, निराश्रित, उत्पीडि़त पात्रों का संबल बनकर कोई पात्र प्रकट हो जाता है। मानवीयता के क्षरण की स्थितियों में भी वे जीवन के आधारभूत मूल्यों के प्रति दृढ़ आस्थावान बने रहते हैं। उनके पात्र परिस्थिति और परिवेश के वशीभूत होकर या मनोवैज्ञानिक कारणों से विभिन्न मनोग्रंथियों और कुंठाओं के शिकार होकर विद्रोही तेवर अपनाते हैं या विद्रोही हो जाते हैं। नफरत और विद्वेष की चिंगारियां उनके अंतर्मन में सुलगती रहती हैं, परंतु कहानी के अंत तक आते-आते कोई पात्र अपने आचरण और व्यवहार से उनके हृदय को परिवर्तित कर देता है। अरुण भारती की कहानियां आम आदमी की तकलीफ को भी व्यंजित करती हैं। आंचलिक भाषा का प्रयोग पात्रों के देशकाल के अनुरूप हुआ है जिससे परिवेश का यथार्थ स्वरूप सामने आया है। समग्र कहानियां कथ्य को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती हैं तथा कठिन परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति आस्था प्रकट करती हैं।

विवेच्य अवधि में योगेश्वर शर्मा के तीन कहानी संग्रह- ‘आ गया भराड़ीघाट’ (2012), ‘बसांव’ (2017) और ‘फोन पर महानगर’ (2019) प्रकाशित हैं। ‘आ गया भराड़ीघाट’ में योगेश्वर शर्मा की चौदह कहानियां- पानी पी लो भैया, चर्चा जारी है, आ गया भराड़ीघाट, एक टुकड़ा सत्य, फागणू वल्द स्वारू, नेम प्लेट, नरेंद्र साथी, पापा के पैर, अखबारी काका, दादू चूर्ण बेचते हैं, छेल्लू, शिमला रिज पर, अधूरी कहानी और सचिवालय के बाहर संगृहीत हैं। योगेश्वर शर्मा की कहानियों में कहन की सहजता है। इसे सादगी का शिल्पी भी कहा जा सकता है। वे अपनी कहानियों में वस्तु और शिल्प का सम्यक संतुलन बनाए रखते हैं। उनकी कहानियों में कलात्मकता है, परंतु कलाबाजी नहीं। कहानियों में वे अपने पुराने शहर और उससे जुड़े गांव की स्मृतियों की अनवरत श्रृंखला रूपायित करते हैं। वे तीव्र गति से हुए सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तन के साथ भौतिक परिवर्तनों से मानवीय संबंधों में आए परिवर्तनों को भी कहानियों में रेखांकित करते हैं। इस समग्र परिवर्तन की प्रक्रिया में हाशिए पर स्थित वंचित वर्ग को कहानियों के केंद्र में लाते हैं। ‘आ गया भराड़ीघाट’ कहानी संग्रह की शीर्ष कहानी है। कहानीकार भराड़ीघाट के एक प्रसिद्ध ढाबे के संदर्भ में भौतिक परिवर्तन की प्रक्रिया और मानव मूल्यों के परिवर्तन को जीवंत रूप में उकेरते हैं। समय की गति और विकास से संबंधित यह कहानी मानवीय संबंधों के टूटन और बाजारवाद को रेखांकित करती है। ‘पानी पी लो भैया’ में कहानीकार ने प्रोफेसर बालमुकुंद मिश्रा की शिक्षण प्रविधि की सरसता और रोचकता, एक शिक्षक के रूप में उनके व्यक्तित्व के विविध आयामों को उद्घाटित करती है। उनकी पाठन शैली में कहानियों की रचना प्रक्रिया के सूत्र अवतरित होते हैं, तो कहीं क्रांतिकारी की पीठिका की ओर संकेत करती हैं। उनकी मान्यता है, ‘क्रांति करने वाले अगर अलग-अलग विचारधाराओं के हों तो मुश्किल हो जाती है और ईमानदार क्रांति करने वाले भी कभी-कभी निरंकुश हो जाते हैं, वह बाधा है। क्रांति तो होगी लेकिन बहुत सोच समझ कर।’

कहानी में वर्ग वैषम्य के ही सूत्र नहीं हैं, अपितु जीवणु चाचा जैसे लोग भी हैं जो उच्च पायदान तक पहुंचते हैं। मंगतू का यह कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है, ‘अरे जीवणु तू बहुत बड़ा आदमी बन गया है। याद है, चौथी जमात में हम साथ-साथ पढ़ते थे। तू मेरी कॉपी की नकल करके पांचवीं में हो गया। मैं चौथी से आगे नहीं पढ़ सका।’ कारण बहुत थे। मंगतू अपने बेटे से कहता है, ‘मेरा छोटा भाई है जीवणु, अब बहुत बड़ा आदमी बन गया है। आज तो पता नहीं कितने नाम हैं इसके? जा बेटा घड़े से पानी ले आ लौटा भर कर।’ ‘चर्चा जारी है’ कहानी में कहानीकार रहस्यवाद, अलौकिकता, पराशक्ति आदि की चर्चा करते हैं। इसके साथ साहित्य में यथार्थ की व्यंजना के साथ विज्ञान, अध्यात्म, व्यावहारिक पक्षों पर भी चर्चा करते हैं। साहित्य में यथार्थ के मिश्रण के संदर्भ में उदय प्रकाश की तिरछ, ईशिता आर. गिरीश की लाले की नूह, कहानीकार की अपनी कहानी पीलिया को साहित्य में यथार्थ के संदर्भ में विश्लेषित किया है। ‘एक टुकड़ा सत्य’ कहानी में रामधन और उसकी पत्नी अपने बेटे की प्रतिभा को देखते हुए कलेक्टर बनाने के स्वप्न देखते हैं। जीवन भर संघर्ष करते हुए मुन्नी के मां-बाप उसे कलेक्टर बना देखना चाहते हैं। कठिन परिस्थितियों में पढ़ा-लिखा कर भी उसके माता-पिता के स्वप्न और आकांक्षा व्यवस्था की विसंगतियों के कारण पूर्ण नहीं हो पाते। उसे अपने एक प्रोफेसर का कथन स्मरण आता है, ‘यदि हमारे देश में कोई चीज योजनाबद्ध है तो वह भ्रष्टाचार है।’ ‘फागणु वल्द स्वारू’ कहानी फागणू की निर्धनता और जीवन भर के संघर्ष को निरूपित करती है। सारा परिवार आंत्रशोथ में समाप्त हो जाता है और फागणू किसी तरह बच जाता है। पचीस वर्ष पूर्व शहर गया था। यह कहानी शहर के परिवर्तनों और गांव के निर्धन आदमी की नियति, शहर में अपने आप को अजनबीपन, बेगानेपन और अकेलेपन का शिकार को चित्रित करती है। बीस रुपए की पूंजी लेकर शहर जाने वाला फागणू वह आदमी है जिसने शहर के लिए सडक़ निर्माण में वर्षों तक मजदूरी की। वह बस यात्रा से लेकर अस्पताल की भीड़ में पैसे के अभाव में भटकता रहता है और बड़े भवनों में स्थापित अस्पतालों में डाक्टर फागणू जैसे गरीब लोगों के उपचार के लिए दवाइयों की सूची पकड़ा देते हैं। पैसों के अभाव में बिना उपचार के खो जाते हैं। ‘शिमला रिज पर’ शीर्षक कहानी में कहानीकार ने वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी पं. हरिप्रसाद की चरित्र सृष्टि के माध्यम से औपनिवेशिक काल में शिमला रिज पर अंग्रेजों के प्रभुत्व के साथ प्रभुनाथ और पं. हरिप्रसाद जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को मूर्तिमान किया है। कहानी में पं. हरिप्रसाद शिमला रिज पर वर्षों के सुदीर्घ अंतराल के पश्चात आते हैं और अपने स्कूली जीवन और फिर स्वतंत्रता संघर्ष में अंग्रेजी शासकों की यातनाओं को स्मरण करते हुए अतीत में डूब जाते हैं। कहानीकार ने यह प्रतिपादित किया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष में स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी शासकों के साथ-साथ रियासतों की हुकूमत से भी यातनाएं सही। परंतु आजादी के बाद अंग्रेजों का साथ देने वाले भारतीय पि_ू भी पैंतरा बदलकर राजनीति में आकर आगे नए रूप में सामने आए और सारी सुविधाओं का लाभ उठाने लगे। पंडित हरिप्रसाद और प्रभुनाथ जैसे स्वतंत्रता सेनानी अनाम और उपेक्षित होकर विस्मृत हो गए।                                                                               -(शेष भाग अगले अंक में)


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