जनादेश का सम्मान करे सियासत

लोकतंत्र के पर्व में शिकस्त व जीत का सिलसिला जारी रहेगा, मगर अहम पहलू यह है कि लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कायम रहना चाहिए। देश की सियासत को जनता का जनादेश पूरी अकीदत से स्वीकार करना होगा…

मौजूदा वक्त में मुल्क की सियासत जश्न-ए-मसर्रत में मसरूर है। देश की फिजाओं में भी सियासी तरन्नुम की धुन महसूस की जा सकती है। देश के करोड़ों मतदाताओं ने अपने बेशकीमती वोट की ताकत से मैदान-ए-सियासत में किस्मत आजमा रहे सियासी रहनुमाओं को जम्हूरियत की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचा कर लोकतंत्र की मजबूती का एक और सुनहरा मजमून लिख दिया। सियासत के कई मुनाजिर सियासी बज्म में चुनावी जीत का श्रेय लेने में लगे हैं, जबकि लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोपरि है। हैरत यह भी है कि मतदाताओं ने अलगाववाद की हिमायत करने वाले कुछ सियासी रहनुमाओं को भी देश की संसद में भेज दिया है। चुनावी रैलियों से लेकर जंनसम्पर्क व रोड शो तथा सोशल मीडिया तक चुनावों का प्रचार हुआ। सियासी दलों की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुके चुनावों में सियासी विरासत को बचाने की जद्दोजहद भी जारी थी, मगर मतदाताओं के खामोश फैसले ने देश की सियासत को चौंका दिया है। एग्जिट पोल को लेकर सियासत के ज्योतिषाचार्यों के दावे धराशायी हो गए। हालांकि देश में एक बार फिर गठबंधन की सियासत का दौर शुरू हो गया है। कहर बरपाती गर्मी के बीच लोगों ने मतदान केंद्रों की कतारों में खड़े होकर मताधिकार का प्रयोग करके लोकतंत्र के प्रति अपना फर्ज अदा कर दिया। यह दीगर बात है कि अगले पांच वर्षों तक जनप्रतिनिधि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन पूरी शिद्दत से करेंगे। चुनावों के बाद आम लोगों को अपने सियासी रहनुमां के दीदार दुर्लभ हो जाते हैं। देश का हर चुनाव अपने पीछे कई यादें छोड़ जाता है।

मौजूदा लोकसभा चुनाव में लोगों में मतदान के प्रति उत्साह का माहौल कम था। कई राज्यों में मतदान का प्रतिशत कम रहा, मगर आरोप-प्रत्यारोप के भयानक दौर में शराफत व अदब की हदूद को तोडऩे वाली भाषा के चलते सियासत की दर्जा-ए-हरारत बुलंदी पर पहुंच चुकी थी। गुफ्तगू के दौरान लफ्जों का इस्तेमाल व बात करने का सलीका किसी भी इनसान की तरबियत व परवरिश का बेहतरीन सबूत होता है। जहरीले लफ्जों से उपजे गहरे जख्म दशकों तक नहीं भरते। इंतखाबी तश्हीर के दौरान सियासी रहनुमाओं की जुबान से निकले तीरनुमां लफ्जों ने मुल्क की सियासत को काफी हद तक मफलूज कर दिया है। सियासत के किरदार का अनोखा अंदाज है कि मुल्क में सियासी रहनुमाओं को ही दानिश्वर माना जाता है। देश की अफसरशाही व नौकरशाही तथा तमाम व्यवस्थाएं सियासत के आगे नतमस्तक रहती हैं। आम लोग ज्यादातर समस्याओं के समाधान के लिए जनप्रतिनिधियों से ही अपेक्षा रखते हैं। भोली-भाली विरासत के लोग सियासतदानों के आश्वासनों पर अक्सर विश्वास कर लेते हैं, जबकि सियासत की कथनी और करनी में फर्क होता है।

सियासत एक ऐसा पेशा है जिसमें अपने सियासी दुर्ग फतह करने के लिए सियासी रहनुमाओं के झूठ बोलने पर, मौके की नजाकत को भांपकर जाति-मजहब का कार्ड खेलना, वोट बैंक साधने के लिए जराफत भरे अंदाज में लोकलुभावन वादों की बिसात बिछाना तथा चुनावी प्रचार के दौरान की गई घोषणाओं से मुकरने पर कोई कानूनी पाबंदी नहीं है। इसीलिए सियासत के मिजाज से कभी सदाकत की महक नहीं आती। सियासी रहनुमाओं के किरदार में मोहिब्ब-ए-वतन का अक्स नहीं दिखाई देता। इंतखाबी तश्हीर में हिकारत भरे अल्फाज व बड़बोली भाषणबाजी के आगे निर्वाचन आयोग भी बेबस हो चुका है। लेकिन सत्ता की दहलीज पर पहुंचने की होड़ में जनसैलाब को अमर्यादित भाषा से उकसाना तथा लोगों के जज्बात आहत करने की कारकर्दगी मतदाताओं के साथ पूरे जम्हूरी निजाम की तौहीन है। चुनाव आयोग को इस विषय पर संज्ञान लेना होगा। नवगठित मरकजी हुकूमत से देश के करोड़ों लोगों को उम्मीदें रहेंगी, मगर सबसे ज्यादा उम्मीद युवा वर्ग को है। कुछ दर्द इनसान का सुख-चैन छीन कर उसे खामोशी व तन्हाई के आलम में जीने को मजबूर कर देते हैं। बेरोजगारी के सैलाब में फंस चुके युवा वर्ग का हाल कुछ ऐसा ही है। लाइलाज हो चुकी बेरोजगारी के अजाब से युवा वर्ग मानसिक तौर पर मामूर हो चुका है। हर वर्ष हजारों युवा जमीन-जायदाद गिरवी रखकर रोजगार की तलाश में डंकी रूट के जरिए विदेश जाते हैं तथा वहां की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार किए जाते हैं। विदेशों में पढ़ाई करने वाले भारतीय मूल के छात्रों व रोजगार में लगे युवाओं पर नस्लीय हमले व हत्याएं आम बात हो चुकी है। देश में नशा माफिया के राडार पर भी बेरोजगार युवा हैं। नशाखोरी के मामलों में सलाखों के पीछे भी ज्यादातर युवा वर्ग है। चुनावों में विपक्षी दलों ने बेरोजगारी व महंगाई जैसे ज्वलंत मुद्दों पर जोरदार ताकीद पेश थी। चुनावी संग्राम में नारों व जुमलों का अहम प्रभाव रहता है। लेकिन सियासत चुनावी दौर में मुफ्तखोरी की खैरात व लोकलुभावन वादों से लोगों को लुभाने का प्रयास करती है। खोखले आश्वासनों से लोगों को खुश करने की कोशिश की जाती है, जबकि युवा वर्ग के मन को पढऩे की जरूरत है।

आम लोगों की वास्तविक समस्याओं को महसूस करने की जरूरत है। विश्व में सबसे ज्यादा युवा आबादी की हैसियत रखने वाले भारत में बेरोजगारी की बढ़ती दर तथा मतदान का कम होता प्रतिशत लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक मसला बन रहा है। मतदान को लेकर लोकतंत्र की बुनियाद मतदाताओं की बेजारी व मतदान के प्रति घटती दिलचस्पी तथा लाखों मतदाताओं द्वारा ‘नोटा’ के इस्तेमाल पर निष्पक्ष तौर पर रायशुमारी होनी चाहिए। आखिर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में मतदान का प्रतिशत कम क्यों हो रहा है? चूंकि आधुनिक दौर में लोकतांत्रिक प्रणाली को ही श्रेष्ठ व्यवस्था माना जाता है। लोकतंत्र के पर्व में शिकस्त व जीत का सिलसिला जारी रहेगा, मगर अहम पहलू यह है कि लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कायम रहना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था का वजूद महफूज रहे। बहरहाल लोकतंत्र का आधार लोगों के मत पर निर्भर करता है। देश की सियासत को जनता का जनादेश पूरी अकीदत से स्वीकार करना होगा। युवा वर्ग के लिए रोजगार उपलब्ध कराने का मुद्दा सरकारों की प्राथमिकता में होना चाहिए।

प्रताप सिंह पटियाल

स्वतंत्र लेखक


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