‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ भारत के लिए सही नहीं
एक साथ चुनावों के बारे में एक सामान्य गलतफहमी यह है कि वे अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली के समान हैं। यह बात सच्चाई से बहुत दूर है। समिति ने केवल छह देशों (दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, फिलीपींस आदि) की चुनाव प्रणाली का अध्ययन किया, लेकिन ब्रिटेन या संयुक्त राज्य अमेरिका का नहीं…
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ एक ऐसा विचार है जो सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन भारत के लोगों के लिए कारगर नहीं होगा। इसके प्रचारित लाभ नकली हैं, और हमारा इतिहास बताता है कि लोकप्रिय प्रधानमंत्री एक साथ या अलग-अलग चुनाव अपने स्वयं के राजनीतिक गणित के आधार पर चुनते हैं, न कि लोगों के लाभ के लिए। मोदी कैबिनेट ने हाल ही में भारत की राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय प्रतिनिधि सभाओं को एक साथ चुनने के लिए कोविंद समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। वन नेशन वन इलेक्शन (ओएनओई) का विचार पहली बार 2016 में पीएम मोदी द्वारा प्रस्तावित किया गया था, और पिछले साल उन्होंने इसकी जांच के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति की स्थापना की थी। अब वह इस प्रस्ताव को अगली संसद के माध्यम से आगे बढ़ाना चाहते हैं।
वर्ष 1951 से 1962 तक, प्रधानमंत्री नेहरू ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए भारत के पहले तीन चुनाव एक साथ आयोजित किए, क्योंकि वह और उनकी कांग्रेस पार्टी देश भर में बेहद लोकप्रिय थी। पार्टी ने लगभग सभी राज्यों में बहुमत हासिल किया, नेहरू ने अपने पसंदीदा मुख्यमंत्री चुने, और नई दिल्ली से पूरे देश को चलाते रहे। भारत के संविधान के प्रसिद्ध इतिहासकार ग्रैनविले ऑस्टिन ने लिखा है, ‘केंद्र और अधिकांश राज्य सरकारों में, पार्टी और सरकार सियामी जुड़वां की तरह थे, जो सिर, कूल्हे और पैर की अंगुली तक जुड़े हुए थे।’
परंतु जब 1967 के चुनाव में लोकसभा में कांग्रेस का बहुमत घटकर 25 रह गया और पार्टी आठ राज्यों में हार गई, तो प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय और राज्य चुनावों को अलग-अलग करने का फैसला किया। उन्होंने अपने ‘गरीबी हटाओ’ अभियान के तहत एक बड़ा कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किया, लोकसभा एक साल पहले भंग कर दी, और 1971 में चुनाव कराने की घोषणा की। उनकी कांग्रेस (आर) ने 520 में से 350 सीटें जीतीं और दो-तिहाई बहुमत हासिल किया।
परंतु श्रीमती गांधी ने तमिलनाडु को अलग नहीं किया। उस राज्य में, सीएम करुणानिधि ने भी विधानसभा को जल्दी भंग कर दिया और श्रीमती गांधी के साथ गठबंधन कर लिया ताकि उनके एक प्रतिद्वंद्वी, के. कामराज, को हराया जा सके।
प्रधानमंत्री की मर्जी से एक साथ या अलग-अलग चुनाव कराने की यह परंपरा देश के लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। उदाहरण के लिए, भारत के संघीय ढांचे पर इसके हानिकारक प्रभावों पर विचार करें। हमारे देश के आकार और विविधता को देखते हुए, यह हमारे लोकतंत्र के लिए अच्छा है कि राज्य के मुद्दे, नेता और दल प्रमुखता से उभरें। राज्य के चुनावों के मूल्य को कम करना…जो राष्ट्रीय दलों, नेताओं और मुद्दों के साथ जुडऩे से निश्चित रूप से होगा… केवल स्थानीय जवाबदेही को नुकसान पहुंचाएगा।
‘ओएनओई’ एक बुनियादी संसदीय सिद्धांत का भी मजाक बनाता है, कि सरकारों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है और किसी भी समय वे गिर सकती हैं। यह वह मुख्य लाभ है जिसे हमारे संस्थापकों, विशेषकर बीआर अंबेडकर ने संसदीय प्रणाली के चयन के लिए प्रमुखता से गिनवाया था। अगर कोई सरकार गिरती है और ‘ओएनओई’ के तहत नया चुनाव होता है, तो नई सरकार का कार्यकाल छोटा करना होगा और कोविंद कमेटी यही सिफारिश करती है। यह न केवल उन लोगों के लिए अनुचित है जो चुनाव लड़ते हैं, और जो जीतते हैं, बल्कि यह अलोकतांत्रिक भी है। जनता चुनावी वादों को पूरा करने के लिए सरकारें चुनती हैं, लेकिन कुछ ही महीनों के लिए चुनी गई सरकार न इन्हें पूरा कर सकती है और न ही जवाबदेह ठहराई जा सकती है।
मोदी के विरोधियों ने आरोप लगाया है कि कोविंद कमेटी की रिपोर्ट को पूर्व निश्चित किया गया था। यह आरोप न्यायोचित है, यदि आप रिपोर्ट को इसके मुख्य तर्क से आंकते हैं, कि कई चुनाव कराने से ‘सरकार, व्यवसायों, श्रमिकों, अदालतों, राजनीतिक दलों, चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों, और बड़े पैमाने पर नागरिक समाज पर भारी बोझ पड़ता है।’ भारत दुनिया का सबसे बड़ा फलता-फूलता लोकतंत्र होने की डींग नहीं हांक सकता यदि यह चनावों को एक बोझ के रूप में देखे। क्या हमारे लोकतंत्र से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कुछ है, और क्या लोगों द्वारा स्वयं अपने नेताओं को चुनने से ज्यादा मौलिक कुछ है?
समिति की सिफारिशें इस बोझ को कम करने के लिए वास्तव में कुछ ज्यादा करती नहीं हैं। यह वर्तमान तीन चुनावों (लोकसभा, राज्य और पंचायतों) की संख्या को घटाकर दो (लोकसभा प्लस राज्य और पंचायत 100 दिन बाद) करने का सुझाव देती है। यदि लोकसभा और राज्य चुनावों को जोड़ भी दिया जाए, तो उम्मीदवार, कार्यकर्ता, पार्टियां और नागरिक समाज संगठन प्रत्येक चुनाव के लिए अलग-अलग प्रचार तो फिर भी करेंगे। सरकारों और व्यवसायों पर बोझ भी बहुत नहीं बदलेगा, क्योंकि यह एक मिथक है कि चुनाव के दौरान नैतिक आचार संहिता सभी सरकारी काम रोक देती है। संहिता केवल सरकारों को नई योजनाएं शुरू करने या कर्मचारी स्थानांतरण करने से रोकती है।
इसमें कोई शक नहीं कि खुद मोदी और उनकी पार्टी के सहयोगियों पर बहुत सारे चुनावों का बोझ है। लेकिन केंद्र या प्रधानमंत्री का हर राज्य के चुनाव में शामिल होने का क्या मतलब है? यह केवल स्थानीय जवाबदेही को नुकसान पहुंचाता है। यदि भारत की राज्य सरकारें और अधिक स्वतंत्र हों … वे स्थानीय मुद्दों के आधार पर अलग से निर्वाचित हों, स्थानीय नेताओं द्वारा चलाई जाएं, और उनका अपने वित्त पर अधिक नियंत्रण हो … तो देश में जमीन पर शासन बेहतर होगा। और एक राज्य के चुनाव से दूसरे राज्यों या केंद्र पर बोझ नहीं पड़ेगा।
कोविंद समिति का यह भी तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने से देश की आर्थिक वृद्धि को गति मिलेगी और उसके चुनावी खर्च में कमी आएगी। यह मुख्य रूप से इस पर आधारित है कि सिंक्रनाइज चुनाव ‘निश्चितता’ लाएंगे। परंतु कोई भी इस बारे में कैसे निश्चित हो सकता है कि केंद्र या राज्य में संसदीय सरकार कब गिर जाएगी? सरकारों को गिराने में भारत की कुख्यात राजनीति और खरीद-फरोख्त का समिति कोई उपाय नहीं सुझाती है।
चुनावी खर्च के सम्बन्ध में समिति की रिपोर्ट है कि वर्तमान में राष्ट्रीय और राज्य चुनावों के संचालन में सरकार लगभग 4500 करोड़ रुपए खर्च करती हैं। यह प्रति मतदाता 50 रुपए से भी कम है और इसे हमारे लोकतंत्र में एक योग्य निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। व्यर्थ पैसा तो वास्तव में पार्टियों और अभियानों द्वारा खर्च किया जाता है … समिति का अनुमान है कि यह 4 से 7 लाख करोड़ रुपए हैं। लेकिन यह काफी हद तक काला धन है, और यह सोचना भोलापन है कि इसे एक साथ चुनावों में मतदाताओं को लुभाने पर खर्च नहीं किया जाएगा।
एक साथ चुनावों के बारे में एक सामान्य गलतफहमी यह है कि वे अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली के समान हैं। यह बात सच्चाई से बहुत दूर है। समिति ने केवल छह देशों (दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, फिलीपींस आदि) की चुनाव प्रणाली का अध्ययन किया, लेकिन ब्रिटेन या संयुक्त राज्य अमेरिका का नहीं। अमेरिका में, उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय सभाओं को न केवल अलग-अलग चुना जाता है, बल्कि उनके अधिकारियों की अवधि भी अलग होती है। उनकी राष्ट्रीय प्रतिनिधिसभा (लोकसभा) हर दो साल में चुनी जाती है, लेकिन राष्ट्रपति चार और सेनेट छह के लिए कार्य करती है।
सच्चाई यह है कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ प्रस्ताव भारतीय जनता की सेवा के लिए नहीं बनाया गया है। जनता इसके लिए आवाज नहीं उठा रही, और न ही मतदाता, चुनावों में भागीदारी के बढ़ते स्तर को देखते हुए, चुनावी थकान से पीडि़त हैं। हमारे भारतीय लोकतंत्र को अधिक विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है, अधिक केंद्रीकरण की नहीं।
भानु धमीजा
सीएमडी, दिव्य हिमाचल
-अंग्रेजी में ‘द क्विंट’ में प्रकाशित
(12 अक्तूबर, 2024)
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