परिसीमन : छोटे राज्यों के लिए संसद सुधारने और संघवाद मजबूत करने का बहुमूल्य अवसर

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बड़े राज्य जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व चाहते थे, जिससे उन्हें विधानमंडल में अधिक शक्ति मिलेगी, जबकि छोटे राज्यों को डर था कि वे पीछे छूट जाएंगे और प्रभाव खो देंगे। अमेरिकी संस्थापकों ने एक ऐसा मध्य मार्ग खोजा जो दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करे और किसी भी समूह को विधायी प्रक्रिया पर हावी होने से रोके…

भारत की एकता के सामने एक नई चुनौती है। छोटे राज्य, खास तौर पर दक्षिण के, सरकार की परिसीमन योजना का विरोध करने के लिए एकजुट हो रहे हैं। परिसीमन जनसंख्या के आधार पर संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों को फिर से परिभाषित करने की संवैधानिक रूप से आवश्यक प्रक्रिया है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना और अन्य छोटे राज्यों को डर है कि आगामी जनगणना के परिणामस्वरूप उनकी संसदीय सीटें कम हो जाएंगी और उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे बड़े उत्तरी राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी। उनको शिकायत है कि उन्हें अपनी जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित करने के लिए दंडित किया जा रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन को ‘‘हमारे प्रतिनिधित्व को कम करने और हमारी आवाज को दबाने के उद्देश्य से एक खतरा’’ कहा है। हालांकि, परिसीमन छोटे राज्यों के लिए एक अवसर प्रस्तुत करता है। यदि वे वास्तव में एकजुट होते हैं, तो वे संसद में अधिक प्रतिनिधित्व और मजबूत आवाज प्राप्त कर सकते हैं। वे संसद में सुधार करने में मदद कर सकते हैं, जहां कई समूहों का प्रतिनिधित्व कम है, और संघवाद में भी सुधार कर सकते हैं, जहां सभी राज्य अत्यधिक प्रभावशाली केंद्र द्वारा पीडि़त रहते हैं।

अधिक प्रतिनिधि संसद की आवश्यकता

हमारी संसद भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती है, जिससे यह सार्थक राष्ट्रीय चर्चाओं के लिए अनुपयुक्त हो जाती है। अन्य लोकतंत्रों की तुलना में, यह जनसंख्या का काफी कम प्रतिनिधित्व करती है। औसतन, एक भारतीय सांसद 2.4 मिलियन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि अमेरिका में यह संख्या 748,000, पाकिस्तान में 576,000 और जापान में केवल 273,000 है। राजनीतिक वैज्ञानिक मिलन वैष्णव और जेमी हिंटसन ने अनुमान लगाया कि 2011 की जनगणना के आधार पर, लोकसभा में वर्तमान 545 से बढक़र 848 सांसद होने चाहिए। इस वास्तविक प्रतिनिधि मॉडल के तहत, उत्तर प्रदेश में 143 सीटें होंगी, जबकि केरल में सिर्फ 20 होंगी। हालांकि, छोटे राज्यों के विरोध के कारण, 1973 के बाद से लोकसभा सीटों की संख्या में संशोधन नहीं किया गया है। अगर छोटे राज्य परिसीमन को अपनाते हैं और लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि की अनुमति देते हैं, तो संसद लोगों की भावनाओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करेगी। लेकिन छोटे राज्य भारत के शासन में अधिक प्रभाव कैसे प्राप्त कर सकते हैं?

इसका उत्तर राज्यसभा में सुधार करके उसे एक ऐसे सदन में बदलना है जहां सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व मिले, अमेरिकी सीनेट की तरह। छोटे राज्य एकजुट होकर और संविधान संशोधन की वकालत करके इस सुधार के लिए दबाव डाल सकते हैं। आखिरकार, राज्यसभा (राज्यों की परिषद) को राज्यों की आवाज बनने, और जल्दबाजी में गलत तरीके से बनाए गए कानूनों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया था। दुर्भाग्य से, यह वर्तमान में किसी भी भूमिका को पूरा करने में विफल है।

आज, राज्यसभा मुख्य रूप से राजनीतिक दलों के नेताओं का प्रतिनिधित्व करती है और पार्टीबाजी के लिए एक उपकरण के रूप में काम करती है। यह बात 2003 के संविधान संशोधन के बाद से विशेष रूप से सच है, जिसने राज्यसभा के सदस्यों के लिए उस राज्य से निर्वाचित होने, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं, की आवश्यकता को हटा दिया था। 2016 में, राज्यसभा सदस्य और राजनीतिक टिप्पणीकार कुलदीप नैयर ने कहा था, ‘‘अब पूरा सदन राजनीतिक आकाओं द्वारा नामित किया जाता है।’’ राज्यसभा में परिवर्तन से न केवल हमारी संसद अधिक प्रभावी बनेगी, बल्कि भारत की संघवाद को भी मजबूती मिलेगी।

एक मजबूत संघीय ढांचे की ओर

भारत में जिस ‘‘सहकारी (कोआपरेटिव) संघवाद’’ का प्रचार किया जाता है, वह व्यवहार में नाममात्र के लिए ही है। राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे केंद्र की मांगों का अनुपालन करें अन्यथा उन्हें परिणाम भुगतने होंगे। असहयोगी राज्य सरकारों को उनके कानूनों को अवरुद्ध करके, नए कार्यक्रमों या संस्थानों से बाहर करके, उनके वैध धन को रोककर, या राष्ट्रपति शासन के तहत रखकर दंडित किया जाता है। सरकारिया आयोग द्वारा 1980 के दशक में राष्ट्रपति शासन के 57 मामलों के अध्ययन के अनुसार, लगभग 50 प्रतिशत मामले केंद्र सरकार की मात्र इच्छा के कारण थे। आज भी, विपक्षी नेतृत्व वाली राज्य सरकारों द्वारा पारित कई कानून केंद्र द्वारा रोके गए हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु के लगभग 20 विधेयक लंबित हैं, पश्चिम बंगाल के 22 और केरल के 7 विधेयक लंबित हैं। जैसा कि भारत के संविधान के इतिहासकार ग्रैनविले ऑस्टिन ने लिखा है, ‘‘राज्य के खरगोश…कभी भी केंद्रीय भेडिय़े के खिलाफ एकजुट नहीं हुए।’’ भारत ने महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों को संबोधित करने में राज्य सरकारों के लिए समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को पहले ही सफलतापूर्वक लागू कर दिया है। उदाहरण के लिए, जीएसटी परिषद में प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से एक प्रतिनिधि शामिल है … राज्य के वित्त मंत्री।

संयुक्त राज्य अमेरिका में, उनकी संसद (कांग्रेस) के एक सदन में राज्य सरकारों का समान प्रतिनिधित्व एक ऐसा एकीकृत विचार था जिसने उन्हें 1787 में बिखरने से बचाया था। यह महान समझौता (जिसे ‘कनेक्टीकट समझौता’ के रूप में भी जाना जाता है) उनके संविधान के प्रारूपण के दौरान बड़े और छोटे राज्यों के बीच हुआ एक समझौता था। बड़े राज्य जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व चाहते थे, जिससे उन्हें विधानमंडल में अधिक शक्ति मिलेगी, जबकि छोटे राज्यों को डर था कि वे पीछे छूट जाएंगे और प्रभाव खो देंगे। अमेरिकी संस्थापकों ने एक ऐसा मध्य मार्ग खोजा जो दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करे और किसी भी समूह को विधायी प्रक्रिया पर हावी होने से रोके। जैसा कि कनेक्टीकट के छोटे राज्य के एक प्रमुख समर्थक विलियम सैमुअल जॉनसन ने कहा, ‘‘एक-दूसरे के विरोधी होने के बजाय, (राज्यों) को एकजुट होना चाहिए : एक शाखा में लोगों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए, और दूसरी में राज्यों का।’’ भारत के सभी दलों और बड़े-छोटे राज्यों के नेताओं को भी इसी तरह की समझदारी दिखानी चाहिए। पिछले 50 सालों से हो रही परिसीमन में देरी फिर से करना समझदारी नहीं है। यह भारत की एकता को नुकसान पहुंचा रहा है और लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है।

भानु धमीजा

सीएमडी, दिव्य हिमाचल

-अंग्रेजी में ‘द क्विंट’ में प्रकाशित

(19 मार्च, 2025)


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