भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति संकट में

कई भारतीय विचारकों का मानना है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता तभी बची रह सकती है, जब सरकारें सभी धर्मों से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखें, या उन्हें समान रूप से बढ़ावा दें। परंतु वे राजनेताओं से कुछ ज्यादा ही उम्मीद कर रहे हैं। जैसा कि हाल ही में, असम के मुख्यमंत्री (और हिंदुत्व अनुयायी) ने पूछा : ‘‘हिमंत बिस्वा सरमा धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकते हैं? मैं एक कट्टर हिंदू हूं। इसी तरह, एक मुसलमान व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकता है? वह एक कट्टर मुसलमान है।’’ आज, एक और स्वतंत्रता दिवस के बाद, आइए हम विचार करें क्या वास्तव में हम अपनी धर्मनिरपेक्ष विरासत को समाप्त करना चाहते हैं….

आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे यादगार पल… आजादी, जो इसी माह 78 साल पहले मिली थी .. हमारे सबसे दर्दनाक पलों में से एक भी था। इतिहास में पहली बार भारत, एक ऐसा देश जहां सहस्र शताब्दियों तक बहुलवाद फलता-फूलता रहा, धार्मिक आधार पर विभाजित हो गया। विभाजन ने हमारे बहुलवादी, बहुसांस्कृतिक समाज पर एक बुरा साया डाल दिया। आज, दुख की बात है कि कई भारतीय धर्मनिरपेक्षता को एक बुरा शब्द मानते हैं, और देश एक हिंदू राष्ट्र बनने पर तुला हुआ है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, आइए इस स्थिति पर पुनर्विचार करें और धार्मिक सहिष्णुता, समानता और विविध मान्यताओं के सम्मान की अपनी विश्व-प्रसिद्ध विरासत को पुन: प्राप्त करें।

कल्पना कीजिए कि यदि धर्मनिरपेक्षता खत्म हो जाए तो भारत को क्या नुकसान होगा।

लगभग 4000 वर्ष पूर्व, हमारे वैदिक ऋषियों ने यह विचार गढ़ा कि ‘सत्य एक है, और ज्ञानी इसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।’ इस सरल विचार ने हमारे पूर्वजों को हजारों वर्षों तक अद्वितीय प्रगति और समृद्धि दिलाई। इसने सभी प्रकार के विश्वासों वाले लोगों को…सर्वेश्वरवादी (हिंदू), नास्तिक (चार्वाक), भौतिकवादी (आजीविका), अनास्तिक (बौद्ध) और अध्यात्मवादी (जैन)…एक साथ रहने और बढऩे का अवसर दिया। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में, हमारी समृद्धि के चरम पर, सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया, लेकिन एक फरमान सुनाया : ‘‘व्यक्ति को दूसरे के धर्म का सम्मान करना चाहिए…ऐसा करने से व्यक्ति अपने धर्म को बढऩे में मदद करता है और साथ ही दूसरे के धर्म की सेवा भी करता है।’’ बौद्ध धर्म इस भारतीय दर्शन को लगभग पूरे एशिया और अंतत: पृथ्वी के हर महाद्वीप तक ले गया। 1937 में, एक चीनी राजनेता, हू शी ने दुख व्यक्त किया कि ‘‘चीन को सांस्कृतिक रूप से जीतने के लिए भारत ने सैनिक भेजने के बजाय केवल कुछ धर्म प्रचारक भेजे।’’

आठवीं शताब्दी के आसपास मुस्लिम शासकों के हिंसा के आधार पर विजय के बावजूद, ये बहुलवादी परंपराएं जीवित रहीं। औरंगजेब जैसे कुछ मुस्लिम बादशाहों ने अन्य धर्मों पर क्रूरतापूर्वक अत्याचार किए, लेकिन अकबर जैसे अन्य शासकों ने उनका सम्मान किया। अकबर ने अपने मंत्रिमंडल में विभिन्न धर्मों के लोगों को नियुक्त किया और एक समन्वयवादी धर्म (दीन-ए-इलाही) को बढ़ावा दिया।

जब 18वीं शताब्दी में अंग्रेज भारत आए, तब भी हिंदुओं और मुसलमानों के बीच गहरा भाईचारा था। 1857 में उन्होंने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया और भारत के अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में प्रतीकात्मक रूप से एकजुट हुए। रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हजरत महल जैसे हिंदू और मुस्लिम दोनों शासकों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी कायम रही। मोतीलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना, जो क्रमश: कांग्रेस और मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व करते थे, के बीच 1916 में हुए समझौते को हिंदू-मुस्लिम सहयोग के प्रतीक के रूप में सराहा गया। एक ब्राह्मण और कांग्रेसी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने जिन्ना को ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का सर्वश्रेष्ठ दूत’ कहा था। जब महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया, तो उन्होंने धार्मिक एकजुटता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने कहा, ‘‘मेरा हिंदू धर्म सांप्रदायिक नहीं है। इसमें इस्लाम, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म और पारसी धर्म सब धर्मों की अच्छाइयां शामिल हैं जो मुझे सबसे अच्छा लगता है।’’

परंतु भारत की आजादी के बाद यह प्राचीन रिश्ता गहरे तनाव में आ गया। निर्णायक मोड़ तो एक दशक पहले ही आ गया था, जब जवाहर लाल नेहरू ने 1937 में कांग्रेस पार्टी द्वारा गठित प्रांतीय सरकारों में किसी भी मुस्लिम लीग नेता को जगह देने से इनकार कर दिया था। ऐसा नहीं था कि नेहरू मुसलमानों के खिलाफ थे, वे बस सांप्रदायिक पार्टियों के प्रतिनिधियों को सरकार में नहीं चाहते थे। लेकिन इस कठोर, एकतरफा फैसले ने जिन्ना को क्रोधित और बदले की भावना से भर दिया, और उसके बाद उन्हें राष्ट्रवादी विचारधारा की ओर वापस लाने की हर कोशिश नाकाम रही। जिन्ना ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा बुलंद किया और मुसलमानों को पाकिस्तान नामक एक अलग राष्ट्र के लिए एकजुट किया।

विभाजन ने स्वतंत्र भारत के दो सबसे बड़े समुदायों के बीच सद्भावना को गहरा आघात पहुंचाया। 1990 के दशक में हिंदुत्व मुख्यधारा में आया और अब भारत का प्रमुख राजनीतिक आंदोलन है। आज, कई हिंदू हिंदुत्व के पक्ष में एकजुट हो रहे हैं, जिसका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र के रूप में हिंदू आधिपत्य स्थापित करना है।

हिंदुत्व के अनुयायियों को लगता है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक भारत के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं। यह भावना दिन-प्रतिदिन कठोर होती जा रही है और घृणा में बदल रही है। और जैसा कि शत्रुता की भावना में स्वाभाविक है, यह पारस्परिक रूप से फैल रही है। आज, यह अस्वीकार करना कठिन है कि भारत के कई मुसलमान और हिंदू एक-दूसरे से डरते हैं और यहां तक कि एक-दूसरे से नफरत भी करते हैं।

अगर भारत बहुसंस्कृतिवाद के अपने सदियों पुराने मूल्यों को बनाए रखना चाहता है, तो धर्म के आधार पर नफरत का यह नकारात्मक चक्र खत्म होना ही चाहिए। चूंकि हिंदुत्व अब राजनीतिक रूप से प्रबल है, इसलिए जरूरी है कि किसी भी प्रकार के धार्मिक तुष्टिकरण या उत्पीडऩ पर संवैधानिक रूप से प्रतिबंध लगाया जाए। मैं लंबे समय से यह तर्क देता रहा हूं कि भारत को धर्म और सरकार के बीच सख्त अलगाव (Separation of church and State) अपनाना चाहिए।

कई भारतीय विचारकों का मानना है कि भारत की धर्मनिरपेक्षता तभी बची रह सकती है, जब सरकारें सभी धर्मों से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखें, या उन्हें समान रूप से बढ़ावा दें। परंतु वे राजनेताओं से कुछ ज्यादा ही उम्मीद कर रहे हैं। जैसा कि हाल ही में, असम के मुख्यमंत्री (और हिंदुत्व अनुयायी) ने पूछा : ‘‘हिमंत बिस्वा सरमा धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकते हैं? मैं एक कट्टर हिंदू हूं। इसी तरह, एक मुसलमान व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष कैसे हो सकता है? वह एक कट्टर मुसलमान है।’’

आज, एक और स्वतंत्रता दिवस के बाद, आइए हम विचार करें क्या वास्तव में हम अपनी धर्मनिरपेक्ष विरासत को समाप्त करना चाहते हैं?

भानु धमीजा

सीएमडी, दिव्य हिमाचल

-अंग्रेजी में ‘द वायर’ में प्रकाशित

(15 अगस्त, 2025)


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