मन की दौड़
उन्नीसवीं सदी के महान रूसी लेखक लियो टॉलस्टाय ने तो यहां तक कह डाला कि किसी मूर्ख को भी कोई नई बात समझाई जा सकती है, बशर्ते कि उसने उस विषय पर पहले से ही अपना कोई मत न बना रखा हो, लेकिन किसी मूर्धन्य विद्वान को वही बात समझाना लगभग असंभव है जिसने उस विषय पर अपना मत दृढ़ कर रखा हो। सच, झूठ, विचार और विश्वास की यह कहानी मन की सीमाओं को रेखांकित करती है और हमें यह सबक देती है कि रिश्तों में विश्वास को बहुत महत्व है। यदि सामने वाले व्यक्ति को हम पर विश्वास न हो तो हम चाहे जो कर लें, अपनी बात उसे न समझा सकते हैं, न मनवा सकते हैं। पति-पत्नी के रिश्तों में दुराव अक्सर इसीलिए आता है जो शुरू में कलह का और अंतत: तलाक का कारण बनता है। स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध ने आज से अढ़ाई हजार साल पहले ही वह कह डाला जिसे आधुनिक मनोविज्ञान स्वीकार कर रहा है…
गौतम बुद्ध से जुड़ी एक कथा बहुत शिक्षाप्रद है। उनके सभी शिष्य उनके आसपास बैठे थे, तभी गांव का एक व्यक्ति आया और महात्मा बुद्ध को प्रणाम करने के बाद बोला कि हे भंते, मेरा विश्वास है कि भगवान हैं, भगवान ही इस दुनिया को चलाते हैं और उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। कृपया बताइये कि इस बारे में आपका क्या ख्याल है? महात्मा बुद्ध अपनी चिर-परिचित शैली में मुस्कुराए और बहुत ही शांत स्वर में बोले कि तुम ठीक कहते हो। भगवान तो हैं ही, वे ही पालनहार हैं, सर्वशक्तिमान हैं, सर्वव्यापी हैं और वे ही दुनिया को चला रहे हैं। उस व्यक्ति ने प्रणाम किया और खुश होकर चला गया। कुछ देर बाद एक और व्यक्ति आया और उसने कहा कि मेरा पक्का विश्वास है भगवान-वगवान सब झूठी बातें हैं, दिखावा है, भ्रम है और लोगों को बेवकूफ बनाने का एक जरिया है। यह सिर्फ अंधविश्वास है और मनुष्य के पतन का कारण है। आप क्या कहते हैं। बुद्ध फिर मुस्कुराए और उतनी ही शांति से बोले कि मित्र तुम ठीक कहते हो। लोग भ्रम में पड़े हैं, अंधविश्वास का शिकार हैं और यूं ही मंदिरों-तीर्थों के चक्कर काट रहे हैं। उस व्यक्ति ने भी बुद्ध को प्रणाम किया और खुश होकर चला गया। कुछ और देर बीती तो एक और व्यक्ति आया। उसने बुद्ध को प्रणाम किया और चुपचाप उनके चरणों में बैठ गया। वह लगातार वैसे ही बैठा रहा। कुछ देर बाद महात्मा बुद्ध ने अपनी मीठी मुस्कान के साथ बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। वह व्यक्ति बड़ी श्रद्धा से उनके चरणों में झुका और बोला कि मैं धन्य हुआ, मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया। इतना कहकर वह भी खुशी-खुशी चला गया। गौतम बुद्ध के इस अनोखे व्यवहार से उनके शिष्य असमंजस में पड़ गए। महात्मा बुद्ध का व्यवहार उनकी समझ में नहीं आ रहा था। दो व्यक्तियों का सवाल एक ही था, पर उत्तर बिल्कुल अलग-अलग थे, और सिर्फ अलग ही नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के विपरीत थे।
यही नहीं, तीसरे व्यक्ति ने न कुछ पूछा न बुद्ध ने कुछ बताया, फिर भी वह यह कहकर गया कि उसे उसके सवाल का जवाब मिल गया। उनके प्रधान शिष्य आनंद से आखिर रहा नहीं गया और उसने बुद्ध के सामने अपनी जिज्ञासा प्रकट कर ही दी। तब बुद्ध ने अपने शिष्यों की शंका का समाधान करते हुए कहा कि पहले दो व्यक्ति खुद को बुद्धिमान मानते थे, वे अपने ही पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थे और वे कुछ जानने के लिए नहीं आए थे, बल्कि अपने विचारों की पुष्टि चाहते थे। यह स्पष्ट है कि अभी वे सीखने के लिए तैयार ही नहीं थे, वे सीखने के योग्य पात्र ही नहीं थे, इसलिए मैंने उन्हें कुछ सिखाने या बताने की कोशिश नहीं की। मैंने उनके विचारों का समर्थन सिर्फ इसलिए किया ताकि वे जब कभी सीखने के योग्य बनें तो अपनी इसी गलती को दोबारा न दोहराएं। जो तीसरा व्यक्ति आया, वह शांति से बैठा रहा, यहां व्याप्त शांत तरंगों से अपने विचारों को शुद्ध करता रहा, और अंतत: समझ गया कि सत्संग और मौन भक्ति के दो महत्वपूर्ण शुरुआती चरण हैं। आज वह मौन का पाठ पढ़ कर गया है। मौन की साधना ने उसके मन को स्थिर किया है। वह अपनी खोज जारी रखने में समर्थ हो गया है। यह सच है कि अभी उसकी खोज पूरी नहीं हुई, पर वह दृढ़ कदमों से खोज की राह पर निकल चुका है। इसके बाद महात्मा बुद्ध ने जो आगे कहा, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। महात्मा बुद्ध ने कहा कि हमारा मन जब अहंकार से ग्रसित होता है तो वह सत्य नहीं चाहता, वह सत्य की खोज का जिज्ञासू नहीं होता, वह अपने ही विचारों का समर्थन चाहता है। हम अपने अहंकार को पोषित करते रहना चाहते हैं। मन की दौड़ बस यहीं तक है। यहां तक कि यदि कोई व्यक्ति हमें पसंद हो और वह हमसे बार-बार, लगातार असहमत होता रहे तो धीरे-धीरे हम उसे नापसंद करना शुरू कर देते हैं। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति बुद्धिहीन हो, या हमें नापसंद हो लेकिन वह लगातार हमारी बातों से सहमति जताता रहे तो धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ ही जाती है कि हमारी नापसंदगी दूर हो जाती है और हम उसकी सारी खामियों के बावजूद उसे पसंद करना शुरू कर देते हैं। मन की दौड़ का आलम यह है कि यदि किसी भी विषय पर हमारी कोई एक निश्चित विचारधारा हो तो हमारे सामने कोई ऐसे नए तथ्य आएं जो हमारी स्थापित विचारधारा के विपरीत हों तो हम इस कोशिश में जुट जाते हैं कि अपने स्थापित विचारों के समर्थन में हम क्या कर सकते हैं।
यानी, हम तथ्य होने के बावजूद नए तथ्यों को स्वीकार करने के बजाय हमारी पहली कोशिश यही होती है कि हम अपनी स्थापित विचारधारा को ही सही सिद्ध कर सकें। इस पर भी तुर्रा यह कि यदि नए विचार किसी ऐसे व्यक्ति के माध्यम से आए हों जो व्यक्ति हमें नापसंद हो तो हम नए विचारों को बिना जांचे-परखे ही अस्वीकार कर देते हैं, फिर तो हम अक्सर उन्हें समझने, जानने या जांचने की कोशिश तक भी नहीं करते। मजे की बात यह है कि वही नए तथ्य, जो हमारे स्थापित विश्वास के अनुरूप नहीं थे, यदि हमें कोई ऐसा व्यक्ति बताए जिसे हम बहुत पसंद करते हैं तो अक्सर हम अपने विचार बदल लेते हैं। यानी, विचारधारा बदलने में या विचारों को बदलने में जो भूमिका दरअसल तथ्यों की होनी चाहिए थी, वह पसंदगी और नापसंदगी को हासिल है, विश्वास और अविश्वास को हासिल है। हम तथ्यों के कारण विचार नहीं बदलते, अपनी पसंद वाले व्यक्ति के कारण विचार बदलते हैं, किसी ऐसे व्यक्ति के कारण विचार बदल लेते हैं जिस पर हमें विश्वास हो।
उन्नीसवीं सदी के महान रूसी लेखक लियो टॉलस्टाय ने तो यहां तक कह डाला कि किसी मूर्ख को भी कोई नई बात समझाई जा सकती है, बशर्ते कि उसने उस विषय पर पहले से ही अपना कोई मत न बना रखा हो, लेकिन किसी मूर्धन्य विद्वान को वही बात समझाना लगभग असंभव है जिसने उस विषय पर अपना मत दृढ़ कर रखा हो। सच, झूठ, विचार और विश्वास की यह कहानी मन की सीमाओं को रेखांकित करती है और हमें यह सबक देती है कि रिश्तों में विश्वास को बहुत महत्व है। यदि सामने वाले व्यक्ति को हम पर विश्वास न हो तो हम चाहे जो कर लें, अपनी बात उसे न समझा सकते हैं, न मनवा सकते हैं। पति-पत्नी के रिश्तों में दुराव अक्सर इसीलिए आता है जो शुरू में कलह का और अंतत: तलाक का कारण बनता है। स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध ने आज से अढ़ाई हजार साल पहले ही वह कह डाला जिसे आज का आधुनिक मनोविज्ञान स्वीकार कर रहा है। हम इस साधारण से दिखने वाले महत्वपूर्ण तथ्य को समझ लें तो हमारा सारा जीवन ही बदल सकता है।
स्पिरिचुअल हीलर
सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक
ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com
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