बिन मेहनत सब सून

By: Aug 7th, 2025 12:06 am

प्रतिभा के बिना लगन हमेशा सर्वश्रेष्ठ परिणाम नहीं दे सकती। सचिन तेज गेंदबाज होना चाहते थे, लेकिन डेनिस लिली ने समझ लिया कि उनमें तेज गेंदबाज बनने की काबीलियत नहीं है, इसलिए उन्होंने सचिन को अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान देने की सलाह दी, और सचिन ने अपना फोकस बदला तो फिर उन्हें कभी पीछे मुडक़र देखने की आवश्यकता नहीं पड़ी। क्रिकेट कोच रमाकांत अचरेकर ने उनकी प्रतिभा को संवारा, तराशा और उन्हें अन्य बच्चों की तरह सुबह-सवेरे मैदान के चक्कर लगाने को नहीं कहा। अचरेकर उनसे मैदान के चक्कर तब लगवाते थे जब वे बल्लेबाजी करके थककर चूर होते थे और वो भी हाथ में बल्ला उठाए और पैड पहने हुए…

हम सब ऐसे बहुत से लोगों को जानते हैं जो सफल हैं, बहुत सफल हैं, प्रसिद्ध हैं और पैसा सचमुच उनके हाथ की मैल है। हम ऐसे लोगों को भी जानते हैं जो प्रतिभाशाली थे, सफलता की राह पर थे, लेकिन फिर धीरे-धीरे पिछड़ते चले गए। अच्छे नेता, अच्छे प्रशासक, अच्छे अभिनेता, अच्छे खिलाड़ी, लिस्ट लंबी है, जो प्रतिभाशाली थे, उनकी शुरुआत बहुत अच्छी हुई, लेकिन वे अपनी गति कायम नहीं रख सके और फिर या तो पिछड़ गए या फिर भीड़ में खो ही गए। क्या फर्क होता है उनमें जो आगे बढ़ते रहते हैं और वो जो पिछड़ जाते हैं? मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे बहुत से लोगों से मिलता रहा हूं जो इन दोनों श्रेणियों में आते हैं, यानी वो जो सफल हैं और वो भी जो किसी भी कारण से सफलता का वह मुकाम नहीं छू सके, जिसके कि वे काबिल थे। आज मैं खिलाडिय़ों की एक ऐसी जोड़ी के बारे में बात करूंगा जिन्होंने अपनी प्रतिभा का सिक्का जमाया, वाहवाही लूटी, लेकिन उनमें से एक ऐसा है जिसे हम आज भी सम्मानपूर्वक याद करते हैं, जबकि दूसरा खिलाड़ी जो कि कदरन ज्यादा प्रतिभाशाली था अपनी प्रतिभा के बावजूद धीरे-धीरे चमक गंवा बैठा और अपनी उस मंजिल से वंचित रह गया जिसका कि वह हकदार हो सकता था। ये हैं दो स्टार क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली। सचिन तेंदुलकर आज भी स्वीकार करते हैं कि प्रतिभा के मामले में विनोद कांबली उनसे कहीं आगे हैं। इसके बावजूद सचिन तेंदुलकर ने जो मुकाम हासिल किया, विनोद कांबली वहां तक नहीं पहुंच सके। ऐसा नहीं है कि विनोद कांबली भीड़ में खो गए हैं। वे छोटी स्क्रीन पर दिखाई देते रहे हैं और उन्होंने फिल्मों में भी काम किया है और वे सचिन तेंदुलकर की क्रिकेट अकादमी में कोच भी हैं, लेकिन सचिन तेंदुलकर की तुलना में वे बहुत पीछे हैं।

ग्यारह साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू करके सचिन तेंदुलकर ने 16 साल की उम्र में पेशेवर क्रिकेट में कदम रखा जब वे कराची में पाकिस्तान की टीम के साथ खेलने के लिए चुने गए। टेस्ट मैच और एक दिवसीय क्रिकेट में सर्वाधिक स्कोर के रिकार्ड वाले सचिन तेंदुलकर को आज भी महानतम क्रिकेटर माना जाता है। अर्जुन पुरस्कार, खेल रत्न, पद्मश्री, पद्म विभूषण और अंतत: भारत रत्न सम्मान से नवाजे जा चुके मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर राज्यसभा में भी रहे हैं। सन् 2010 में उन्हें टाइम मैगजीन ने विश्व के सौ सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था। सन् 2013 में सचिन ने क्रिकेट से पूर्ण संन्यास लिया। सचिन अब क्रिकेटर नहीं हैं, लेकिन आज भी वे भारतीयों के लिए एक सम्मानित सांस्कृतिक राजदूत हैं। सचिन को पहली गंभीर प्रेरणा तब मिली जब सन् 1973 में कपिल देव के नेतृत्व में भारतीय टीम विश्व चैंपियन बनी। तब उन्होंने ठान लिया कि एक दिन उनके नेतृत्व में भारतीय टीम विश्व कप जीतेगी। उस कच्ची उम्र में जब वे भी पेशेवर क्रिकेट में ही नहीं आए थे, यह निश्चय उनका जुनून बन गया। पर यह सपना अकेले सचिन ने ही नहीं देखा। बहुत से उदीयमान खिलाडिय़ों ने यह सपना पाला होगा, पर सच कितनों का हुआ, और अगर सचिन तेंदुलकर का यह सपना साकार हो सका तो उसका राज क्या था? प्रतिभा के बिना लगन हमेशा सर्वश्रेष्ठ परिणाम नहीं दे सकती। सचिन तेज गेंदबाज होना चाहते थे, लेकिन डेनिस लिली ने समझ लिया कि उनमें तेज गेंदबाज बनने की काबीलियत नहीं है, इसलिए उन्होंने सचिन को अपनी बल्लेबाजी पर ध्यान देने की सलाह दी, और सचिन ने अपना फोकस बदला तो फिर उन्हें कभी पीछे मुडक़र देखने की आवश्यकता नहीं पड़ी। क्रिकेट कोच रमाकांत अचरेकर ने उनकी प्रतिभा को संवारा, तराशा और उन्हें अन्य बच्चों की तरह सुबह-सवेरे मैदान के चक्कर लगाने को नहीं कहा। अचरेकर उनसे मैदान के चक्कर तब लगवाते थे जब वे बल्लेबाजी करके थककर चूर होते थे और वो भी हाथ में बल्ला उठाए और पैड पहने हुए। इसका लाभ उन्हें तब मिला जब अपने क्रिकेट करिअर में उन्हें रन बनाने के लिए बल्लेबाजी से थकावट के बावजूद पिच के एक कोने से दूसरे कोने तक भागना होता था।

शिक्षण लेने की उम्र में कांबली जो काम आसानी से कर दिखाते थे, सचिन को वह करने के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ता था। कांबली की प्रतिभा के सामने सचिन कमजोर खिलाड़ी थे। परिश्रम और अनुशासन के बल पर सचिन ने अपनी कमजोरियों पर काबू पाया और सफलता की सीढिय़ां चढ़ते चले गए। अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय मैच में जब वे पाकिस्तान के विरुद्ध बल्लेबाजी कर रहे थे तब पाकिस्तान की टीम में दो नामचीन तेज गेंदबाज वसीम अकरम और वकार युनूस कहर ढा रहे थे। उस मैच में वकार युनूस की एक गेंद सचिन के नाक पर लगी, नाक की हड्डी टूट गई और खून बह निकला। सब उनकी ओर दौड़े और उन्हें रिटायर होने को कहा लेकिन सचिन ने रिटायर होने से इन्कार किया, पिच पर जमे रहे और खून सनी नाक सहित खेलते हुए उस महत्वपूर्ण मैच में 57 रन का बहुमूल्य योगदान दिया। प्रसिद्धि की सीढिय़ां चढ़ते हुए कांबली ने फैशनेबल जीवन पद्धति अपनाई, देर रात की पार्टियां उनका शगल हो गईं, लेकिन सचिन ने सादा जीवन नहीं छोड़ा।

सुबह-सवेरे सबसे पहले पिच पर पहुंचना, लगातार कठोर अभ्यास करना उनका जीवन बन गया। सचिन उत्तेजित नहीं होते थे, किसी से झगड़ा नहीं करते थे। एक मैच के दौरान पाकिस्तानी स्पिनर अब्दुल कादिर ने उन पर ताना कसा तो वे चुप रह गए, लेकिन अगले ही ओवर में चार छक्के लगाकर उन्होंने अब्दुल कादिर को अपना मुरीद बना लिया। सन् 1999 के विश्व कप मैच के दौरान उनके पिता का स्वर्गवास हो गया तो वे उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत आए, लेकिन अंतिम संस्कार के तुरंत बाद वे फिर मैच खेलने के लिए वापस लौट गए। भारत विश्व कप नहीं जीत सका। बाद में भी 2003 और 2007 में भी भारत विश्व कप से महरूम रहा। सन् 2011 के विश्व कप की तैयारी के समय सचिन को स्पष्ट हो गया कि वे अगर इस बार भी विश्व कप नहीं जीत पाए तो 2015 के विश्व कप मैच में वे नहीं खेल सकेंगे। तब उन्होंने अपना निश्चय फिर दोहराया, अपनी फिटनेस पर फोकस किया, खेल के लिए और मेहनत की और ज्यादा अच्छा खेलना शुरू किया। सन् 2011 विश्व कप मैच के दौरान सचिन की बेहतरीन फार्म के बावजूद शुरुआती असफलताएं मिलीं। तब सचिन ने पहली बार अपने साथी खिलाडिय़ों को झिडक़ा भी और प्रेरित भी किया। परिणाम यह रहा कि क्वार्टर फाइनल में कई बार विश्व चैंपियन रह चुके आस्ट्रेलिया को हराया, सेमीफाइनल में पाकिस्तान को हराकर वाहवाही लूटी और फाइनल मैच में श्रीलंका को हराकर विश्व कप अपनी झोली में डाला। यह उनके श्रम, निश्चय और अनुशासन के कमाल की अनूठी कहानी है जिससे हम सब कुछ न कुछ जरूर सीख सकते हैं।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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