हो जाए दुनिया खुशनुमा

By: Sep 11th, 2025 12:05 am

आत्महत्या के जितने भी मामले होते हैं उनके पीछे एक मुख्य कारण यह भी है कि आत्महत्या करने वाले के पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उनकी बात सुनता, समझता, उन्हें धीरज बंधाता और उनमें जीवन की जिजीविषा को, जीवन जीने की चाह को फिर से जगाता। लब्बोलुबाब यह कि परिवार में, समाज में, व्यवसाय में, पेशेवर जीवन में रहते हुए हम बातचीत की कला सीखें या न सीखें, सुनने की कला में महारत अवश्य हासिल करें ताकि जीवन सुखमय हो जाए। हम सब में दुनिया बदलने की ताकत है, पर इसकी शुरुआत खुद से होती है। कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होता है, खुद को तैयार करना होता है, अपनी योग्यता बढ़ानी होती है, अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक रखना होता है, अपने साहस को फौलाद करना होता है, तभी हम वो बदलाव लाने के काबिल हो पाते हैं, जो हम लाना चाहते हैं…

एक प्रसिद्ध व्यक्ति ने एक बार कहा था कि जब मैं छोटा था तो मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं थी, मेरी कल्पनाओं की भी कोई सीमा नहीं थी। मैं दुनिया बदलने के बारे में सोचा करता था। जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, बुद्धि कुछ बढ़ी तो सोचने लगा कि ये दुनिया बदलना तो बहुत मुश्किल काम है, इसलिए मैंने अपना लक्ष्य थोड़ा छोटा कर लिया, सोचा दुनिया न सही, मैं अपना देश तो बदल ही सकता हूं। पर जब कुछ और समय बीता तो लगा कि ये देश बदलना भी कोई मामूली बात नहीं है, मैं बस अपने परिवार और करीबी लोगों को बदलता हूं, पर मैं वो भी नहीं कर पाया, और अब जब मैं इस दुनिया में कुछ दिनों का ही मेहमान हूं तो मुझे एहसास होता है कि अगर मैंने खुद को बदलने की राह पकड़ी होती तो मैं तो बदलता ही, मुझे देखकर मेरा परिवार भी बदल जाता, और क्या पता उनसे प्रेरणा लेकर कुछ और लोग भी बदल जाते। देश बदलता या न बदलता, पर हमारे आसपास की दुनिया जरूर बदल जाती। हम सब हर किसी से कुछ न कुछ सीखते हैं, कुछ प्रेरणा लेते हैं, हम सब का कोई न कोई रोल-मॉडल होता है, कोई हीरो होता है, कोई आदर्श व्यक्ति होता है और हम उस जैसा बनना चाहते हैं। यह एक प्राकृतिक बात है। अगर हम इस छोटी-सी बात को समझ लें तो जीवन खुशनुमा हो जाएगा। खुद हमेशा खुश रहना, मुस्कुराते रहना, खुद भी खुश रहना और दूसरों को भी खुश रखना बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं है। किसी की बात का बुरा न मानना, किसी ने कुछ गलत कह दिया तो मीठे शब्दों में जवाब देना एक ऐसा गुण है जिसका कोई सानी नहीं है। इससे हमारे आसपास के लोग हमसे प्रेम करने लगते हैं। तीन बातें ऐसी हैं जो सच हैं, सब पर लागू होती हैं और सब उससे लाभ उठा सकते हैं। पहली बात तो यह है कि हमारी महंगी चीजों से, महलनुमा घर से, बड़ी गाड़ी से, ब्रांडेड कपड़ों के कारण कोई हमसे प्रभावित नहीं होता। लोग देखते हैं, उनकी आंखें हैरानी से और प्रशंसा से फैलती हैं, पर वो उस चीज की प्रशंसा होती है, हमारी नहीं। जब हम किसी की बड़ी गाड़ी देखते हैं तो विचार यही आता है कि काश, हमारे पास भी वैसी गाड़ी होती।

गाड़ी के अंदर कौन बैठा है, हम उसकी ओर देखते भी नहीं। हम गाड़ी के मालिक को नहीं देखते, गाड़ी देखते हैं, जबकि गाड़ी वाला इस गलतफहमी में रहता है कि लोग उसे देख रहे हैं। महंगी चीजों के बजाय जब हम किसी से प्रेम करते हैं, किसी की प्रशंसा करते हैं, किसी की हिम्मत बंधाते हैं, किसी के काम आते हैं, तब हम रिश्ते बनाते हैं या रिश्ते मजबूत करते हैं। दूसरी बात यह है कि दुनिया हर रोज बदल रही है, नई तकनीक आ रही है, नए आविष्कार हो रहे हैं, काम करने के ढंग बदल रहे हैं। इसलिए हमें हर रोज कुछ न कुछ नया सीखना चाहिए। नया सीखेंगे तो ही नया कर पाएंगे और दुनिया के साथ चल पाएंगे, वरना पीछे रह जाएंगे। सच तो यह है कि सीखना बंद, तो जीतना बंद। तीसरी बात यह कि अक्सर जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब कोई हमें अपना दुख बताना चाहता है, अपनी चिंता जाहिर करना चाहता है, अपनी समस्या के बारे में बात करना चाहता है, लेकिन हम हैं कि सुनते ही नहीं, पूरी बात सुने बिना सलाह देने लग जाते हैं, या तो उसकी गलती निकालने लग जाते हैं या फिर तरह-तरह के हल सुझाने शुरू कर देते हैं। हमने पूरी स्थिति को समझा नहीं, जाना नहीं, समस्या से जुड़े बाकी तथ्यों और लोगों के बारे में कुछ भी जाने बिना सलाह देने पर उतर आते हैं। हम में सुनने का धीरज ही नहीं है। जो व्यक्ति हमें अपनी समस्या बताकर दिल की भड़ास निकालने आया था, हमारे व्यवहार से वह और भी परेशान होकर वापस चला जाता है। सच तो यह है कि बहुत से मामलों में समस्याग्रस्त व्यक्ति को हमारी सलाह की आवश्यकता ही नहीं होती, उन्हें बस धीरज से सुन पाने वाला कोई व्यक्ति चाहिए, जो सहानुभूतिपूर्वक उनकी बात सुन ले, कोई सलाह न दे, कोई सुझाव न दे, बस बात सुनता जाए और ‘हां’, ‘हूं’ करता रहे। जो व्यक्ति अपनी समस्या बता रहे हैं, समस्या बताते-बताते ही उन्हें कोई कारगर हल भी सूझ सकता है क्योंकि उनका दिमाग समस्या बताने के साथ-साथ समस्या का विश्लेषण भी करता चल रहा है। समस्या से जुड़े होने के कारण उन्हें समस्या के हर पहलू का ज्ञान है, अपनी समस्या के बारे में बताते हुए बातचीत में उन्हें कुछ ऐसे पहलू भी नजर आ गए जिन पर पहले उनकी नजर नहीं गई थी। सामने वाले की बात को सुनना, पूरी बात सुनना, धीरज से सुनना ही मानो सबसे बढिय़ा इलाज है। किसी की बात सुनना, ध्यान से सुनना, बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनना तपस्या सरीखा है क्योंकि सामने वाले को सहानुभूतिपूर्वक सुनने वाला मिल गया, उनका दिल हल्का हो गया।

यह किसी तपस्या से कम नहीं है। ‘सहज संन्यास मिशन’ के अनुयायी हम संन्यासियों की दिनचर्या का यह महत्वपूर्ण अंग ही है कि हम किसी का दुख बंटाएं, किसी की बात धीरज से सुनें, किसी का दर्द बांटें। आत्महत्या के जितने भी मामले होते हैं उनके पीछे एक मुख्य कारण यह भी है कि आत्महत्या करने वाले के पास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उनकी बात सुनता, समझता, उन्हें धीरज बंधाता और उनमें जीवन की जिजीविषा को, जीवन जीने की चाह को फिर से जगाता। लब्बोलुबाब यह कि परिवार में, समाज में, व्यवसाय में, पेशेवर जीवन में रहते हुए हम बातचीत की कला सीखें या न सीखें, सुनने की कला में महारत अवश्य हासिल करें ताकि जीवन सुखमय हो जाए। हम सब में दुनिया बदलने की ताकत है, पर इसकी शुरुआत खुद से होती है। कुछ और बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होता है, खुद को तैयार करना होता है, अपनी योग्यता बढ़ानी होती है, अपने दृष्टिकोण को सकारात्मक रखना होता है, अपने साहस को फौलाद करना होता है, तभी हम वो बदलाव लाने के काबिल हो पाते हैं, जो हम लाना चाहते हैं। इसी बात को महात्मा गांधी ने बड़े प्रभावी ढंग से कहा है, ‘बी दि चेंज, दैट यू विश टु सी इन दि वल्र्ड।’ यानी, खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं। हम सुधरेंगे तो युग सुधरेगा, और हम बदलेंगे तो युग बदलेगा। तो चलिए, आज हम यह प्रण लें कि दुनिया बदलने की चिंता छोडक़र हम खुद को बदलेंगे। जब सब लोग ऐसा करेंगे तो दुनिया खुद-ब-खुद बदल जाएगी। आज से, अभी से हम खुद वो बदलाव बनते हैं जो हम दुनिया में देखना चाहते हैं तो दुनिया बदल जाएगी, या कम से कम हमारी दुनिया तो बदल ही जाएगी।

स्पिरिचुअल हीलर

सिद्ध गुरु प्रमोद निर्वाण, गिन्नीज विश्व रिकार्ड विजेता लेखक

ई-मेल: indiatotal.features@gmail.com


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